नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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विशेष- १. श्रेष्ठ पुरुषों के लिए अपने वचनों का पालन किया जाना अत्यन्त प्रशंसनीय है।
२. अन्यत्र भी कहा गया है— अंगीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति।
३. प्रतिज्ञा को माता के समान सदैव प्राणों की बलि देकर भी रक्षा के योग्य बताया गया है।
४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।
६. अन्यत्र भी कहा गया है— रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाएँ पर वचन न जाई।
७. 'असु' प्राणवाची शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है।
८. उपमालंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सत्यव्रत व्यसन + इनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सत्यव्रतव्यसनिनः २. तेजस् + वनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) तेजस्विनः ३. अत्यन्तं शुद्धं हृदयं यस्याः सा, ताम् (बहुव्रीहि) अत्यन्तशुद्धहृदयाम् ४. अनु + √वृत् + शानच् + टाप् = अनुवर्तमाना ताम् ५. लज्जा च गुणाश्च, लज्जागुणाः, तेषाम् लज्जागुणानाम् ओघः, लज्जागुणौघः तस्य जननी, लज्जागुणौघजननी ताम् लज्जागुणौघजननीम्।
अर्थ पद्धतिः
जातिर्यातु रसातलं गुणगणैस्तस्याप्यधो गच्छतु,
शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां वह्निना।
शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्तु नः केवलं,
येनैकेन विना गुणास्तृणलवप्रायाः समस्ता इमे॥४०॥
अन्वय- जातिः रसातलं यातु, गुणगणः तस्य अपि अधः गच्छतु, शीलम् शैलतटात् पततु, अभिजनः वह्निना संदह्यताम्, वैरिणि शौर्ये आशु वज्रम् निपततु, नः तु केवलम् अर्थः अस्तु, येन एकेन विना इमे समस्ताः गुणाः तृणलवप्रायाः सन्ति।
अनुवाद- (भले ही) जाति पाताल में चली जाए, गुणों का समूह उससे भी नीचे चला जाए, श्रेष्ठ स्वभाव पर्वत की चोटी से गिर पड़े, उच्चकुल अग्नि से जल जाए, शत्रु शूरता पर शीघ्र ही वज्र गिर जाए, किन्तु हमारे पास तो केवल धन हो, जिस एक के बिना ये सारे गुण तिनके के एक अंश मात्र के बराबर हैं।