नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ५३
व्याख्या- इस संसार में जाति, गुण, शील, उच्चकुल, शौर्य, आदि सभी गुण पूर्णतया निरर्थक है, यदि व्यक्ति के पास धन नहीं है, इसी का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में करते हुए कवि कहता है कि—
मैं नहीं चाहता कि मैं उच्च जाति में उत्पन्न होऊँ, जाति जाए भाड़ में (पाताल में) ठीक इसी प्रकार तुम गुणों की बात करते हो, एक गुण ही नहीं, अपितु इस संसार में जितने भी गुणों का समूह है वह सारा ही, पाताल से भी नीचे यदि कोई लोक है तो वहाँ चला जाए मुझे उनसे भी कुछ लेना देना नहीं है।
शील की बात करते हो, वह भी पर्वत की चोटी से गिरकर नष्ट हो जाए, मेरा उसके प्रति भी कोई मोह नहीं है। उच्चकुल, नहीं चाहिए मुझे, जल जाए आग में वह भी, वीरता भी मुझे नहीं चाहिए मैं तो कहता हूँ कि वीरता नामक तत्त्व पर वज्र ही क्यों न गिर जाए, उसका अस्तित्व ही नष्ट क्यों न हो जाए।
तब प्रश्न उठता है कि तुम्हें ये सब यदि नहीं चाहिएँ तो फिर चाहते क्या हो ? कवि कहता है कि मुझे तो केवल धन चाहिए। जिस एक के बिना ऊपर बताए गए सारे गुण तिनके के समान तुच्छ हैं। अतः इस संसार में एकमात्र धन की ही महिमा है, अन्य गुणों की नहीं।
विशेष- १. एकमात्र धन को ही सर्वोच्च प्रतिपादित किया गया है। २. जाति, कुल, गुण, शील एवं शौर्य आदि गुणों के प्रति उपेक्षा प्रतिपादित की गई है! ३. वैरिणि पद का प्रयोग शूरता के लिए गाली के रूप में किया गया है। ४. विना के योग में एकेन में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। ५. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ६. काव्यलिंग एवं उपमालंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. गुणानाम् गणः (षष्ठी तत्पुरुष) गुणगणः २. वैर + इनि = वैरिन्, तस्मिन् वैरिणि ३. शूर + ष्यञ् = शौर्य तस्मिन् शौर्ये (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ४. √गम् + तिप् (लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गच्छतु ५. शैलस्य तटात् (षष्ठी तत्पुरुष) शैलतटात् ६. सम् + √दह् + णिच्, संदह्यताम्
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः।
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।