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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 194 में से

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पृष्ठ 76

५४ || श्रीभर्तृहरिविरचितम्

स एव वक्ता स च दर्शनीयः,
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ते॥४१॥

अन्वय- यस्य वित्तम्, सः नरः कुलीनः अस्ति, सः पण्डितः, सः श्रुतवान्, (सः) गुणज्ञः, सः एव वक्ता, सः च दर्शनीयः (अस्ति)। सर्वे गुणाः काञ्चनम् आश्रयन्ते।

अनुवाद- जिसके पास धन (है), वह व्यक्ति कुलीन (है), वह पण्डित (है), वह शास्त्रज्ञ (है), (वह) गुणों को जानने वाला है, वही वक्ता (है) और वह दर्शन के योग्य है। सभी गुण सोने के आश्रित होते हैं।

व्याख्या- इस संसार में जिस व्यक्ति के पास धन है उसके कुलादि को कोई भी व्यक्ति नहीं देखता अथवा यों कहें कि धन के कारण वह उच्चकुल वाले के समान देखा जाता है, भले ही निम्न कुल में उत्पन्न क्यों न हुआ हो। लोगों की दृष्टि में वह सबसे बड़ा पण्डित और शास्त्रों को जानने वाला विद्वान् होता है।

इसी धन के कारण वह सबसे बड़ा गुणों का पारखी होता है, वक्तृत्व कला का ज्ञाता और दर्शन को योग्य अर्थात् सुन्दर भी वही है जो ऐश्वर्य सम्पन्न है। वास्तव में लोक में यही देखा जाता है कि यदि व्यक्ति के पास धन है तो उपरोक्त सभी गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं, भले ही इनमें से एक भी उसके पास नहीं हो।

अतः संक्षेप में यही कहना उचित प्रतीत होता है कि सभी गुण एकमात्र सोने में ही निवास करते हैं।

विशेष- १. मनुष्य को इन गुणों की परवाह न करके अपने जीवन का लक्ष्य केवल धन के अर्जन को ही बनाना चाहिए।
२. धन के सामने उक्त सभी गुण पूर्णतया निरर्थक हैं।
३. धन के अभाव में उपर्युक्त गुणों का होते हुए भी कोई महत्त्व नहीं है।
४. प्रस्तुत श्लोक में असम्बन्ध में भी सम्बन्ध का कथन किया गया है। अतः अतिशयोक्ति अलंकार है। लक्षण इस प्रकार है—

सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।

५. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है। इस छन्द में उपेन्द्रवज्रा एवं इन्द्रवज्रा दोनों संयुक्त रूप से रहते हैं।

यत्र द्वयोरप्यनयोस्तु पादा भवन्ति मेघाजितवादि बुद्धे।
विद्वद्भिराद्यैः परिकीर्तिता सा प्रयुज्जतामित्युपजातिरेषा॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. कुल + ख (ईन) (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = कुलीनः
२. पण्डा + इतच् (पुंलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = पण्डितः
३. श्रुत + मतुप् (पुंलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = श्रुतवान्