नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ५१
श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते।
३. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विः चतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. पादैः आक्रान्तम् (तृतीया तत्पुरुष) पादाक्रान्तम्
२. आ + √क्रम् + क्त = आक्रान्तम्
३. परि + √स्फुर् + क्त = परिस्फुरितम्
४. परिस्फुरितं तेजो यस्य सः, तेन परिस्फुरित तेजसा (बहुव्रीहि)
५. √कृ + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) क्रियते
६. भास्करेण + इव (आद् गुणः) (अ + इ = ए)
७. एकेन + अपि (अकः सवर्णे दीर्घः, अ + अ = आ)
लज्जागुणौघजननीं जननीमिव स्वां,
अत्यन्तशुद्धहृदयामनुवर्तमानम्।
तेजस्विनः सुखमसूनपि सन्त्यजन्ति,
सत्यव्रतव्यसनिनो च पुनः प्रतिज्ञाम्॥३९॥
अन्वय— सत्यव्रतव्यसनिनः, तेजस्विनः असून् अपि सुखम् सन्त्यजन्ति, पुनः अत्यन्त-शुद्धहृदयम् अनुवर्तमानम् जननीम् इव लज्जागुणौघजननीम् स्वाम् प्रतिज्ञाम् न त्यजन्ति।
अनुवाद— सत्यव्रत में रुचि रखने वाले, तेजस्वी (लोग) प्राणों को भी सुखपूर्वक छोड़ देते हैं, किन्तु (वे) अत्यन्त शुद्ध हृदय वाली, अनुकूल आचरण करने वाली, माता के समान लज्जा आदि गुणों के समूह को उत्पन्न करने वाली, अपनी प्रतिज्ञा को नहीं छोड़ते हैं।
व्याख्या— इस संसार में जो लोग सदा सत्यभाषण का व्रत लिए हुए हैं तथा तेजस्वी और स्वाभिमानी हैं, दृढ़प्रतिज्ञ वे, भले ही प्राण क्यों न चले जाएँ, कितना भी कष्ट क्यों न हो स्वयं द्वारा की गयी प्रतिज्ञा का अत्यन्त शुद्ध हृदय वाली, अनुकूल आचरण करने वाली माता के समान, कभी भी त्याग नहीं करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि दृढ़प्रतिज्ञ लोग अपने वचन का पालन करते के लिए प्राणों की भी परवाह नहीं करते और लज्जा आदि गुणों की समूह अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा हृदय से प्रेम करने वाली, अनुकूल आचरण करने वाली माँ के समान पूरे मनोयोग से करते हैं।