नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
प्राप्त करता है या फिर वन में ही नष्ट हो जाता है। ठीक उसी प्रकार या तो वह सम्पूर्ण समाज अथवा राष्ट्र में सर्वोपरि पद पर रहकर शासन करते हुए सम्मान प्राप्त करता है अथवा फिर वह वैराग्य भावना से युक्त होकर वन में ही तपस्या करता हुआ प्राण त्याग देता है और संसार के लोग उसे जान भी नहीं पाते हैं।
विशेष- १. मनस्वी व्यक्ति की उपमा मालती पुष्प के साथ दी गई है। अतः उपमालंकार-लक्षण-
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
२. मनस्वी लोगों की विशेषता है कि वे निकृष्ट जीवन की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेष्ठ समझते हैं। ३. स्वाभिमानी व्यक्ति के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया गया है। ४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है-
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं, सर्वत्रलघुपञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मनस् + विनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) मनस्विनः २. सर्वेषाम् लोकः सर्वलोकः तस्य सर्वलोकस्य ३. $\sqrt{\text{शृ}}$ + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शीर्यते
एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्।
क्रियते भास्करेणेव परिस्फुरिततेजसा१॥३८॥
अन्वय- परिस्फुरिततेजसा भास्करेण इव एकेन अपि शूरेण हि महीतलम् पादाक्रान्तम् क्रियते।
अनुवाद- प्रखर तेज से युक्त सूर्य के समान अकेले शूर के द्वारा भी निश्चय ही (सम्पूर्ण) पृथ्वी तल पादाक्रान्त कर लिया जाता है।
व्याख्या- जिस प्रकार देदीप्यमान तेज से युक्त सूर्य अपनी किरणों से सम्पूर्ण संसार को आक्रान्त कर लेता है, ठीक उसी प्रकार एक अकेला शूरवीर भी अपनी शक्ति, तेज एवं यश के द्वारा सम्पूर्ण पृथिवीतल को आक्रान्त कर लेता है अर्थात उसका प्रभाव सम्पूर्ण संसार में सूर्य के समान प्रसारित होता है।
विशेष- १. शूरवीर की उपमा सूर्य के साथ दी गई है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'पाद' पद में श्लेष है, सूर्य के पक्ष में इसका अर्थ 'किरण' होगा तथा शूर के पक्ष में इसका 'चरण' अर्थ होगा। अतः श्लेष अलंकार है। लक्षण है-
१. स्फारस्फुरित