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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 194 में से

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पृष्ठ 79

नीतिशतकम् ५७

दानं भोगो नाशः तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥

अन्वय- वित्तस्य तिस्रः गतयः भवन्ति, दानम्, भोगः, नाशः च। यः न ददाति, न भुङ्क्ते, तस्य (धनस्य) तृतीया गतिः भवति।

अनुवाद- धन की तीन स्थितियाँ होती है— दान, भोग (और) नाश। जो (व्यक्ति) न देता है, न भोगता है, उस (धन) की तीसरी गति होती है।

व्याख्या- धन की तीन स्थितियाँ होती है— प्रथम दान देना, द्वितीय उसका भोग करना और तृतीय विनाश। यदि व्यक्ति के पास धन है तो उसे उसका यथाशक्ति जरूरतमंदों को, निर्धनों को दान अवश्य करना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के साथ उसका स्वयं के लिए एवं अपने परिवार के लिए अधिक से अधिक भोग भी करना चाहिए।

किन्तु यदि व्यक्ति के पास धन है और वह उसे न तो याचकों को दान देता है और न ही उसका स्वयं भोग ही करता है, तो फिर उस धन की तीसरी गति अर्थात् विनाश ही होता है। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में धन की तीन गतियों का उल्लेख किया गया है।
२. व्यक्ति को यदि उसके पास धन है तो खुले मन से उसका दान और उपभोग करना चाहिए। अन्यथा उसका विनाश सुनिश्चित है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

यस्या पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √गम् + क्तिन् = गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) गतयः
२. √दा + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = दानम्
३. √भुज् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भोगः
४. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = नाशः
५. √भू + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = भवन्ति
६. √दा + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = ददाति


मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेति निहतो,
मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः।
कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता, ¹


¹ बालललना— अर्थ वही होगा।