नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
कार्य करने में तनिक भी शर्म अनुभव नहीं करेगा और इसी प्रकार खेती की देखभाल यदि नियमित रूप से न की जाए तो वह खेती भी नष्ट हो जाती है।
इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति विदेश में रहने लगता है तो दूर रहने का कारण उसके अपने प्रियजनों का प्रेम धीरे-धीरे उसके साथ कम होकर अन्त में समाप्त ही हो जाएगा और यदि एक मित्र दूसरे मित्र से अत्यधिक प्रेम करता हो और दूसरा मित्र उसके साथ बराबर प्रेम प्रदर्शित नहीं करे तो वह मित्रता भी नष्ट हो जाती है।
इसी प्रकार यदि व्यक्ति अनीतिपूर्वक आचरण करता है तो उसका ऐश्वर्य, समृद्धि सब कुछ नष्ट हो जाता है और अन्त में कवि कहता है कि यदि धन का निरन्तर व्यर्थ में त्याग किया जाए अर्थात् उसे खर्च किया जाए और कमाने में आलस्य भी करें तो कितना भी बड़ा खजाना क्यों न हो, वह भी नष्ट हो जाता है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्ति को सावधान रहने के लिए कहा गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में प्रतिपादित बातें अत्यन्त व्यावहारिक एवं सत्य हैं।
३. प्रस्तुत श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण-
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. काव्यलिंग एवं दीपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नृणाम् पतिः, नृपतिः (षष्ठी तत्पुरुष)
२. √सञ्ज् + घञ् = सङ्गः तस्मात् सङ्गात् (पंचमी विभक्ति, एकवचन)
३. अधि + √इ + ल्युट् = अध्ययनं, न अध्ययनं इति, अनध्ययनं, तस्मात् = अनध्ययनात् (नञ् समास)
४. कुत्सितः तनयः इति कुतनयः तस्मात् कुतनयात् (अव्ययीभाव)
५. खलस्य उपासनम्, खलोपासनम्, तस्मात् खलोपासनात् (षष्ठी तत्पुरुष)
६. उप + √आस् + ल्युट् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) उपासनात्
७. न अवेक्षणात् इति (नञ् समास) अनवेक्षणात्
८. अव + √ईक्ष् + ल्युट् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन) अवेक्षणात्
९. प्रवासस्य आश्रयात्, प्रवासाश्रयात् (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. प्र + √वस् + घञ् = प्रवासः, तस्मात् प्रवासात् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन)
११. आ + √श्रि + अच् = आश्रयः, तस्मात् आश्रयात् (पञ्चमी विभक्ति, एकवचन)
१२. √स्नेह् + घञ् = स्नेहः
१३. न प्रणयः इति अप्रणयः, तस्मात् अप्रणयात् (नञ् समास)
१४. √नी + अच् = नयः। प्र + √मद् + घञ् = प्रमादः