भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 194 में से

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५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः॥४४॥

अन्वय- शाणोल्लीढः मणिः, हेति निहतः समरविजयी, मदक्षीणः नागः, शरदि श्यान-पुलिनाः सरितः, कलाशेषः चन्द्रः, सुरतमृदिता बालवनिता, अर्थिषु गलितविभवाः जनाः च तनिम्नाः शोभन्ते।

अनुवाद- शाण पर चढ़ाया हुआ मणि, शस्त्रों से घायल युद्ध-विजयी, मद से दुर्बल हाथी, शरद् (ऋतु) में सूखे तटों वाली नदियाँ, एक कलामात्रे अवशिष्ट चन्द्रमा, सम्भोग द्वारा मर्दन की गई बाला स्त्री और याचकों में नष्ट हो गया है ऐश्वर्य जिनका, ऐसे लोग (ये सब) कृशता में ही शोभित होते हैं।

व्याख्या- चमक एवं सुन्दरता बढ़ाने के लिए शाण पर चढ़ाया हुआ हीरा आदि मणि यद्यपि खरादने से पतला (दुर्बल) हो जाता है, किन्तु फिर भी वह अच्छा लगता है। इसी प्रकार युद्ध में शत्रु के शस्त्रों से घायल, किन्तु विजय को प्राप्त हुआ वीर अत्यन्त कमजोर अवस्था में भी सुन्दर प्रतीत होता है।

इसके अतिरिक्त निरन्तर मद के स्राव से दुर्बल हुए हाथी की सुन्दरता देखते ही बनती है, क्योंकि यह मद-पंक्ति इस बात का प्रमाण है कि भले ही अब यह हाथी कमजोर हो गया हो, किन्तु एक समय यह अत्यन्त शक्तिशाली और उच्चकोटि का रहा है।

इसीप्रकार यद्यपि शरद् ऋतु में नदियों के तटों पर दूर-दूर तक रेत दिखाई देता है और जलप्रवाह सीमित विस्तार में रह जाता है, किन्तु फिर भी अपनी पूर्व समृद्धि की स्मृति के साथ इस दशा में भी वे दर्शनीय लगते हैं।

ऐसे ही दूज का चन्द्रमा जिसकी एक कला मात्र ही शेष है, निर्बल दशा में पतला सा भी सुन्दर लगता है। ठीक इसी प्रकार सम्भोग के बाद दुर्बल एवं शिथिल हुई भी बाल स्त्री, कम आयु वाली बाला स्त्री, आकर्षक एवं मनमोहक प्रतीत होती है।

ठीक इसी प्रकार ऐसे लोग जिनका ऐश्वर्य याचकों को देने से समाप्त हो गया है, निर्धन अवस्था में भी (अर्थात् दुर्बल भी) सुन्दर प्रतीत होते हैं। इस प्रकार ये सब निम्न अवस्था में भी सुन्दर लगते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में वस्तुतः उन सबको गिनाया गया है, जो दुर्बल अवस्था में भी आकर्षक प्रतीत होते हैं। २. यदि दान देने से व्यक्ति धनहीन भी हो जाता है तो उसके आंकर्षण व सम्मान में कमी नहीं आती है, अपितु वृद्धि ही होती है। ३. दाने देना धन का सर्वाधिक उत्तम उपयोग है। ४. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।