भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ५९

५. यहाँ अप्रस्तुत मणि आदि का प्रस्तुत मनुष्यों के साथ एक धर्मरूप सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— ‘‘अप्रस्तुतप्रस्तुतयोर्दीपकन्तु निगद्यते।।’’

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. उत् + √लिह् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. हेतिभिः निहतः = हेतिनिहतः (तृतीया तत्पुरुष) √हन् + क्तिन् ३. नि + √हन् + क्त = निहतः ४. वि + √जि + अच् = विजय + इनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √क्षि + क्त = क्षीणः ६. श्यानानि पुलिनानि यासां ता, श्यानपुलिनाः (बहुव्रीहि) ७. √श्यै + क्त = श्यानः ८. कला एव शेषः यस्यः सः = कलाशेषः (बहुव्रीहि) ९. गलिताः विभवाः येषां ते, गलितविभवाः (बहुव्रीहि) १०. तनु + इमनिच् = तनिमन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) तनिम्ना ११. सुरते मृदिता सुरतमृदिता (सप्तमी तत्पुरुष) १२. मदेन क्षीणः मदक्षीणः (तृतीया तत्पुरुष)

परिक्षीणः कश्चित् स्पृहयति यवानां प्रसृतये, स पश्चात् सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसमाम्। अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्थेषु धनिनां, अवस्था वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च॥४५॥

अन्वय- (कदापि) कश्चित् परिक्षीणः यवानाम् प्रसृतये स्पृहयति। पश्चात् सम्पूर्णः सः (एव) धरित्रीम् तृणसमाम् गणयति। अतः अनैकान्त्यात् धनिनाम् अवस्था अर्थेषु गुरुलघुतया वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च।

अनुवाद- (कभी) कोई दरिद्र धान की अंजलि के लिए लालायित होता है, बाद में (धन से) परिपूर्ण वही (सम्पूर्ण) पृथिवी को तिनके के समान मानता है। अतः धनों में अनेक अवस्था वाला होने के कारण धनवानों की अवस्था छोटी बड़ी होने का कारण, वस्तुओं को घटाती और बढ़ाती रहती है।

व्याख्या- व्यक्ति गरीबी की अवस्था में यह विचार करता है कि काश मुझे आज पेट भरने के लिए कोई मुट्ठी भर धान दे दे। इस स्थिति में उसके लिए मुट्ठी भर चावल का अत्यधिक महत्त्व होता है, किन्तु वही व्यक्ति, समय के परिवर्तन के साथ यदि धनाढ्य अथवा राजा बन जाता है तो सारी धरती को तिनके के समान तुच्छ मानने लगता है। इसी आकस्मिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है कि—