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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 194 में से

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पृष्ठ 82

६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

वास्तव में इस संसार की कोई भी वस्तु न तो महत्त्वपूर्ण है और न ही महत्त्वहीन, अपितु यदि उससे मनुष्य की आवश्यकता पूरी होती है तो उसके लिए महत्त्व की है और यदि उससे उसकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तो वह उसके लिए महत्त्वहीन होती है।

अतः धन की कोई स्थिति अथवा मूल्य नहीं, अपितु उसके प्रति व्यक्ति की कितनी चाह है वही उसके महत्त्व को घटाती बढ़ाती रहती है। इसलिए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि व्यक्ति की अपनी अवस्था ही जो दुर्बल और सबल अनेक रूपों वाली होती है, छोटी या बड़ी होने का कारण वस्तुओं के महत्त्व को घटाती या बढ़ाती रहती है। वस्तु का स्वयं में कोई महत्त्व नहीं होता।

विशेष– १. यह बात पूर्णतः सत्य है कि भूखे के लिए रोटी का जो महत्त्व है, वह पेट भरे हुए व्यक्ति के लिए नहीं।

२. मनुष्य की दृष्टि धनों के प्रति सदैव एक जैसी नहीं होती, बदलती रहती है, इसी का कथन प्रस्तुत श्लोक में हुआ है।

३. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।

४. संसार की वस्तुओं का अपना कोई मूल्य नहीं, उसका मूल्य मनुष्य की दृष्टि पर निर्भर है।

५. दीपक एवं काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–

१. परि + √क्षि + क्त = परिक्षीणः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
२. प्र + √सृ + क्तिन् = प्रसृतिः (स्त्रीलिंग, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन) प्रसृतये
३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति
४. एकान्तस्य भावः एकान्त्यम्, न एकान्त्यम्, अनैकान्त्यम् तस्मात्— अनैकान्त्यात् (नञ् तत्पुरुष)
५. गुरु च लघु च तयोः भावः गुरुलघुता, तया गुरुलघुतया
६. गुरुलघु + तल् = गुरुलघुता
७. सम् + √कुच् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) संकोचयति
८. सम्पूर्णः + गणयति (विसर्ग, हशि च)
९. गुरुलघुतया + अर्थेषु (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
१०. √पृथु (विस्तरणे) + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रथयति
११. तृणेन समाम् तृणसमाम् (तृतीया तत्पुरुष)

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