नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
नीतिशतकम् ५७
दानं भोगो नाशः तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥४३॥
अन्वय- वित्तस्य तिस्रः गतयः भवन्ति, दानम्, भोगः, नाशः च। यः न ददाति, न भुङ्क्ते, तस्य (धनस्य) तृतीया गतिः भवति।
अनुवाद- धन की तीन स्थितियाँ होती है— दान, भोग (और) नाश। जो (व्यक्ति) न देता है, न भोगता है, उस (धन) की तीसरी गति होती है।
व्याख्या- धन की तीन स्थितियाँ होती है— प्रथम दान देना, द्वितीय उसका भोग करना और तृतीय विनाश। यदि व्यक्ति के पास धन है तो उसे उसका यथाशक्ति जरूरतमंदों को, निर्धनों को दान अवश्य करना चाहिए और अपनी सामर्थ्य के साथ उसका स्वयं के लिए एवं अपने परिवार के लिए अधिक से अधिक भोग भी करना चाहिए।
किन्तु यदि व्यक्ति के पास धन है और वह उसे न तो याचकों को दान देता है और न ही उसका स्वयं भोग ही करता है, तो फिर उस धन की तीसरी गति अर्थात् विनाश ही होता है। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है।
विशेष-
१. प्रस्तुत श्लोक में धन की तीन गतियों का उल्लेख किया गया है।
२. व्यक्ति को यदि उसके पास धन है तो खुले मन से उसका दान और उपभोग करना चाहिए। अन्यथा उसका विनाश सुनिश्चित है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
यस्या पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये, चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √गम् + क्तिन् = गतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) गतयः
२. √दा + ल्युट् (नपु., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = दानम्
३. √भुज् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भोगः
४. √नश् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = नाशः
५. √भू + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = भवन्ति
६. √दा + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = ददाति
मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेति निहतो,
मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः।
कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालवनिता, ¹
¹ बालललना— अर्थ वही होगा।
५८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः॥४४॥
अन्वय- शाणोल्लीढः मणिः, हेति निहतः समरविजयी, मदक्षीणः नागः, शरदि श्यान-पुलिनाः सरितः, कलाशेषः चन्द्रः, सुरतमृदिता बालवनिता, अर्थिषु गलितविभवाः जनाः च तनिम्नाः शोभन्ते।
अनुवाद- शाण पर चढ़ाया हुआ मणि, शस्त्रों से घायल युद्ध-विजयी, मद से दुर्बल हाथी, शरद् (ऋतु) में सूखे तटों वाली नदियाँ, एक कलामात्रे अवशिष्ट चन्द्रमा, सम्भोग द्वारा मर्दन की गई बाला स्त्री और याचकों में नष्ट हो गया है ऐश्वर्य जिनका, ऐसे लोग (ये सब) कृशता में ही शोभित होते हैं।
व्याख्या- चमक एवं सुन्दरता बढ़ाने के लिए शाण पर चढ़ाया हुआ हीरा आदि मणि यद्यपि खरादने से पतला (दुर्बल) हो जाता है, किन्तु फिर भी वह अच्छा लगता है। इसी प्रकार युद्ध में शत्रु के शस्त्रों से घायल, किन्तु विजय को प्राप्त हुआ वीर अत्यन्त कमजोर अवस्था में भी सुन्दर प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त निरन्तर मद के स्राव से दुर्बल हुए हाथी की सुन्दरता देखते ही बनती है, क्योंकि यह मद-पंक्ति इस बात का प्रमाण है कि भले ही अब यह हाथी कमजोर हो गया हो, किन्तु एक समय यह अत्यन्त शक्तिशाली और उच्चकोटि का रहा है।
इसीप्रकार यद्यपि शरद् ऋतु में नदियों के तटों पर दूर-दूर तक रेत दिखाई देता है और जलप्रवाह सीमित विस्तार में रह जाता है, किन्तु फिर भी अपनी पूर्व समृद्धि की स्मृति के साथ इस दशा में भी वे दर्शनीय लगते हैं।
ऐसे ही दूज का चन्द्रमा जिसकी एक कला मात्र ही शेष है, निर्बल दशा में पतला सा भी सुन्दर लगता है। ठीक इसी प्रकार सम्भोग के बाद दुर्बल एवं शिथिल हुई भी बाल स्त्री, कम आयु वाली बाला स्त्री, आकर्षक एवं मनमोहक प्रतीत होती है।
ठीक इसी प्रकार ऐसे लोग जिनका ऐश्वर्य याचकों को देने से समाप्त हो गया है, निर्धन अवस्था में भी (अर्थात् दुर्बल भी) सुन्दर प्रतीत होते हैं। इस प्रकार ये सब निम्न अवस्था में भी सुन्दर लगते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में वस्तुतः उन सबको गिनाया गया है, जो दुर्बल अवस्था में भी आकर्षक प्रतीत होते हैं। २. यदि दान देने से व्यक्ति धनहीन भी हो जाता है तो उसके आंकर्षण व सम्मान में कमी नहीं आती है, अपितु वृद्धि ही होती है। ३. दाने देना धन का सर्वाधिक उत्तम उपयोग है। ४. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
नीतिशतकम् ५९
५. यहाँ अप्रस्तुत मणि आदि का प्रस्तुत मनुष्यों के साथ एक धर्मरूप सम्बन्ध होने से दीपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— ‘‘अप्रस्तुतप्रस्तुतयोर्दीपकन्तु निगद्यते।।’’
व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. उत् + √लिह् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) २. हेतिभिः निहतः = हेतिनिहतः (तृतीया तत्पुरुष) √हन् + क्तिन् ३. नि + √हन् + क्त = निहतः ४. वि + √जि + अच् = विजय + इनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ५. √क्षि + क्त = क्षीणः ६. श्यानानि पुलिनानि यासां ता, श्यानपुलिनाः (बहुव्रीहि) ७. √श्यै + क्त = श्यानः ८. कला एव शेषः यस्यः सः = कलाशेषः (बहुव्रीहि) ९. गलिताः विभवाः येषां ते, गलितविभवाः (बहुव्रीहि) १०. तनु + इमनिच् = तनिमन् (तृतीया विभक्ति, एकवचन) तनिम्ना ११. सुरते मृदिता सुरतमृदिता (सप्तमी तत्पुरुष) १२. मदेन क्षीणः मदक्षीणः (तृतीया तत्पुरुष)
परिक्षीणः कश्चित् स्पृहयति यवानां प्रसृतये, स पश्चात् सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसमाम्। अतश्चानैकान्त्याद् गुरुलघुतयार्थेषु धनिनां, अवस्था वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च॥४५॥
अन्वय- (कदापि) कश्चित् परिक्षीणः यवानाम् प्रसृतये स्पृहयति। पश्चात् सम्पूर्णः सः (एव) धरित्रीम् तृणसमाम् गणयति। अतः अनैकान्त्यात् धनिनाम् अवस्था अर्थेषु गुरुलघुतया वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च।
अनुवाद- (कभी) कोई दरिद्र धान की अंजलि के लिए लालायित होता है, बाद में (धन से) परिपूर्ण वही (सम्पूर्ण) पृथिवी को तिनके के समान मानता है। अतः धनों में अनेक अवस्था वाला होने के कारण धनवानों की अवस्था छोटी बड़ी होने का कारण, वस्तुओं को घटाती और बढ़ाती रहती है।
व्याख्या- व्यक्ति गरीबी की अवस्था में यह विचार करता है कि काश मुझे आज पेट भरने के लिए कोई मुट्ठी भर धान दे दे। इस स्थिति में उसके लिए मुट्ठी भर चावल का अत्यधिक महत्त्व होता है, किन्तु वही व्यक्ति, समय के परिवर्तन के साथ यदि धनाढ्य अथवा राजा बन जाता है तो सारी धरती को तिनके के समान तुच्छ मानने लगता है। इसी आकस्मिक परिवर्तन को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है कि—
६० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
वास्तव में इस संसार की कोई भी वस्तु न तो महत्त्वपूर्ण है और न ही महत्त्वहीन, अपितु यदि उससे मनुष्य की आवश्यकता पूरी होती है तो उसके लिए महत्त्व की है और यदि उससे उसकी आवश्यकता पूरी नहीं होती तो वह उसके लिए महत्त्वहीन होती है।
अतः धन की कोई स्थिति अथवा मूल्य नहीं, अपितु उसके प्रति व्यक्ति की कितनी चाह है वही उसके महत्त्व को घटाती बढ़ाती रहती है। इसलिए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि व्यक्ति की अपनी अवस्था ही जो दुर्बल और सबल अनेक रूपों वाली होती है, छोटी या बड़ी होने का कारण वस्तुओं के महत्त्व को घटाती या बढ़ाती रहती है। वस्तु का स्वयं में कोई महत्त्व नहीं होता।
विशेष– १. यह बात पूर्णतः सत्य है कि भूखे के लिए रोटी का जो महत्त्व है, वह पेट भरे हुए व्यक्ति के लिए नहीं।
२. मनुष्य की दृष्टि धनों के प्रति सदैव एक जैसी नहीं होती, बदलती रहती है, इसी का कथन प्रस्तुत श्लोक में हुआ है।
३. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. संसार की वस्तुओं का अपना कोई मूल्य नहीं, उसका मूल्य मनुष्य की दृष्टि पर निर्भर है।
५. दीपक एवं काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. परि + √क्षि + क्त = परिक्षीणः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
२. प्र + √सृ + क्तिन् = प्रसृतिः (स्त्रीलिंग, चतुर्थी विभक्ति, एकवचन) प्रसृतये
३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति
४. एकान्तस्य भावः एकान्त्यम्, न एकान्त्यम्, अनैकान्त्यम् तस्मात्— अनैकान्त्यात् (नञ् तत्पुरुष)
५. गुरु च लघु च तयोः भावः गुरुलघुता, तया गुरुलघुतया
६. गुरुलघु + तल् = गुरुलघुता
७. सम् + √कुच् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) संकोचयति
८. सम्पूर्णः + गणयति (विसर्ग, हशि च)
९. गुरुलघुतया + अर्थेषु (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः)
१०. √पृथु (विस्तरणे) + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रथयति
११. तृणेन समाम् तृणसमाम् (तृतीया तत्पुरुष)
नीतिशतकम् ६१
राजन् दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेतां,
तेनाद्य वत्समिव लोकममुं पुषाण।
तस्मिंश्च सम्यगनिशं परिपोष्यमाणे,
नाना फलं^१ फलति कल्पलतेव भूमिः॥४६॥
अन्वय- (हे) राजन्! यदि (त्वम्) एताम् क्षितिधेनुम् दुधुक्षसि, तेन अमुम् लोकम् अद्य वत्सम् इव पुषाण। तस्मिन् अनिशम् सम्यक् परिपोष्यमाणे (एषा) भूमिः कल्पलता इव नानाफलैः फलति।
अनुवाद- (हे) राजन्, यदि (तुम) इस पृथिवी रूपी गाय को दुहना चाहते हो (तो) उसके लिए इस प्रजा को आज बछड़े के समान पुष्ट करो और उसके निरन्तर ठीक प्रकार परिपुष्ट होने पर (यह) भूमि कल्पलता के समान अनेक फलों को निष्पादित करती है।
व्याख्या- ऐसे राजा को जो सदा ही प्रजा का शोषण करता रहता है, सम्बोधित करते हुए कवि कहता है कि— हे राजन्, यदि तुम इस पृथिवी रूपी गाय से अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त करना चाहते हो तो पहले इस प्रजा रूपी बछड़े की ठीक प्रकार सेवा-सुश्रूषा करो, क्योंकि इस बछड़े के संतुष्ट एवं पुष्ट होने पर ही यह पृथिवी तुम्हें कल्पलता के समान अनेक फलों को बिना माँगे ही प्रदान करेगी।
कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजा के प्रसन्न और संतुष्ट होने पर ही राजा को उससे ठीक प्रकार करादि की प्राप्ति होती है। जो राजा की आय का प्रमुख साधन है। प्रजा भी उस स्थिति में मन से परिश्रम करेगी और अनेक प्रकार के उत्पादों को इस धरती से प्राप्त करेगी। इसलिए राजा की सुख समृद्धि के लिए प्रथम प्रजा का सुखी और समृद्ध होना आवश्यक है।
अतः प्रजा पर कर वसूली में बल प्रदर्शन की अपेक्षा पहले उनकी कठिनाइयों को दूर करना तथा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करके उन्हें प्रसन्न करना अनिवार्य है, तभी राजा भी स्थिर, सुखी तथा समृद्ध हो सकता है।
विशेष-
१. 'क्षितिधेनुम्' में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः
२. प्रजा की बछड़े के साथ तथा पृथिवी की कल्पलता के साथ उपमा दी गई है। अतः उपमा अलंकार—
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
३. अत्यन्त सुन्दर राजनीतिक तथ्य को उद्घाटित किया गया है।
४. यहाँ वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
१. नानाफलैः— अनेक फलों के द्वारा
६२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
५. पृथिवी रूपी गाय से धन रूपी दूध प्राप्त करने के लिए प्रजा रूपी बछड़े को प्रसन्न करना अत्यावश्यक है। तभी भूमि कल्पलता के समान मनोवांछित फल प्रदान करेगी।
६. राजा के लिए अत्यन्त सुन्दर ढंग से नीतिगत उपदेश दिया गया है।
७. तेन पद का प्रयोग तृतीया अथवा चतुर्थी दोनों अर्थों की अभिव्यक्ति में स्वीकार किया जा सकता है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दोग्धुम् इच्छसि, दुधुक्षसि। √दुह् + सन् + सिप् (लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन)
२. परि + √पुष् + शानच् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) परिपोष्यमाणे
३. क्षितिः एव धेनुः क्षितिधेनुः ताम् क्षितिधेनुम् अथवा
४. क्षितिरूपा धेनुः ताम्
५. √पुष् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पुषाण
६. तेन + अद्य (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) तेनाद्य
७. तस्मिन् + च (व्यञ्जन, नश्छव्यप्रशान्, स्तोःश्चुना श्चुः)
८. कल्पलता + इव (गुण, आद् गुणः)
सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च,
हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या।
नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च,
वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा॥४७॥
अन्वय- नृपनीतिः वाराङ्गना इव सत्या अनृता च, परुषा प्रियवादिनी च, हिंस्रा दयालुः अपि, अर्थपरा वदान्या च, नित्यव्यया, प्रचुर-नित्य-धनागमा च अनेक रूपा (भवति)
अनुवाद- राजाओं की नीति वेश्या के समान, सत्य और (कहीं) असत्य, कठोर और (कहीं) प्रिय बोलने वाली, हिंसक (और) (कहीं कहीं) दयालु भी, (कहीं) धन की लोभी और कहीं उदार, नित्य व्यय करने वाली और (कहीं) नित्य प्रचुर मात्रा में धनागम (के कारण) अनेक रूपों वाली (होती है)।
व्याख्या- राजनीति वेश्या के समान अनेक रूपों वाली होती है, जिस प्रकार वेश्या कभी सच बोलती है तो कभी अवसर पड़ने पर झूठ भी बोलती है। कभी वह अत्यन्त कठोरतापूर्वक व्यवहार करती है तो कभी अत्यन्त मधुर भाषण करते हुए प्रेमपूर्वक
नीतिशतकम् ६३
वार्तालाप करती है। कभी वह हिंसा का सहारा लेती है तो कभी अत्यन्त दयालुता के साथ व्यवहार करती है।
इसी प्रकार कभी उसकी गिद्ध दृष्टि केवल धन के प्राप्त करने में ही रहती है, तो कभी वह दानादि के द्वारा अत्यन्त उदारता का परिचय देती है। कभी वह अत्यधिक धन का खर्च करती है तो कहीं उसे अनेक मार्गों से धन की प्राप्ति होती है।
ठीक इसी प्रकार राजनीति, राजाओं की नीति भी अनेक रूपों वाली होती है। वह भी कभी तो अवसर के अनुकूल झूठ बोलती है तो कभी सच बोलती है। कोई भी राजनीतिज्ञ कभी भी एक जैसे रूप एवं सिद्धान्त वाला नहीं होता। कभी वह अत्यन्त कठोरता के साथ आचरण करता है, तो कभी वह उदारता की सभी सीमाओं को लांघ जाता है, ऐसा लगता है कि इससे अधिक उदार इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता है। कभी अपनी बात मनवाने के लिए वह अनेक लोगों को क्षणभर में कटवा डालता है तो अनेक बार ऐसे अनेक कार्य करता है जिनसे उसकी दयालु हृदय होने का प्रणाम मिलता है।
विशेष- १. यहाँ राजनीति को वेश्या के समान अनेक रूपों वाला प्रतिपादित किया गया है। २. राजनीति के लिए, इसीलिए कहा जाता है कि यह तो गिरगिट के समान क्षण-क्षण में अपने रंग बदलती है। ३. राजनीति की उपमा वेश्या से दी गई है इसलिए उपमालंकार
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्नायमनसभलागः शिखरिणी।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. सत्या च अनृता च (द्वन्द्व समास) सत्यानृता २. न ऋता इति अनृता (नञ् समास) सत्य + अच् + टाप् = सत्या ३. प्रि + √वद् + णिनि = प्रियवादिन् ङीप्, प्रियवादिनी ४. प्रियम् वदति इति, प्रियवादिनी ५. नित्यं व्ययो यस्याः सा नित्यव्यया (बहुव्रीहि) ६. प्रचुरं नित्यं धनागमः यस्यां सा, प्रचुरनित्यधनागमा (बहुव्रीहि) ७. अनेकानि रूपाणि यस्याः सा, अनेक रूपा (बहुव्रीहि) ८. √हिंस् + र + टाप् = हिंसा ९. वारस्य जनसमूहस्य अङ्गना स्त्री या सा (बहुव्रीहि) वाराङ्गना १०. √पृ + उषन् + टाप् = परुषा ११. √वद् + अन्य + टाप् = वदान्या १२. वाराङ्गना + इव (गुण, आद् गुणः) वाराङ्गनेव
६४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
१३. धनस्य + आगमः = धनागमः (षष्ठी तत्पुरुष) (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१४. नृपनीतिः + अनेकरूपा (विसर्गः, ससजुषो रुः) नृपनीतिरनेकरूपा
१५. दयालुः + अपि (विसर्ग, ससजुषो रुः) दयालुरपि
१६. च + अर्थपरा (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) चार्थपरा
आज्ञा१ कीर्तिः पालनं ब्राह्मणानां,
दानं भोगो मित्रसंरक्षणञ्च।
येषामेते षड्गुणा न प्रवृत्ताः,
कोऽर्थस्तेषां पार्थिवोपाश्रयेण॥४८॥
अन्वय- येषाम् (पार्थिवानाम्) आज्ञा, कीर्तिः, ब्राह्मणानाम् पालनम्, दानम्, भोगः मित्रसंरक्षणम् च एते षड्गुणाः प्रवृत्ताः न, तेषाम् पार्थिवोपाश्रयेण कः अर्थः ?
अनुवाद- जिन (राजाओं के) पास आज्ञा, कीर्ति, ब्राह्मणों का पालन, दान, भोग और मित्रों की रक्षा करना ये छः गुण विराजमान नहीं (हैं), उन राजाओं के आश्रय से क्या लाभ ?
व्याख्या- जिन राजाओं की आज्ञा का उनकी प्रजा पालन नहीं करती हो, जिसका आदेश प्रभावशाली न हो। जिनकी उदारता एवं प्रजापालन विषयककीर्ति दिग्दिगन्त में प्रसारित नहीं हो रही हो, जो विद्वान् एवं ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों का ठीक प्रकार पालन नहीं करते हों, जो याचकों को पर्याप्त धनराशि दान नहीं देते हों, जो अपने ऐश्वर्यों का उपभोग नहीं करते हों और अपने मित्रों और हितैषियों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं करते हों ऐसे राजाओं के आश्रित रहने, उनकी सेवा करने से क्या लाभ अर्थात् ऐसे राजाओं के राज्य में, उनकी सेवा में रहना पूर्णतया निरर्थक है जिनमें उपरोक्त छः गुण नहीं है।
विशेष-
१. प्रस्तुत श्लोक में उत्तम राजा के छः श्रेष्ठ गुणों का परिगणन किया गया है।
२. यहाँ अप्रत्यक्ष रूप में राजा को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इस ओर भी संकेत किया गया है।
३. गुणवान् राजा ही सेवा के योग्य है, इस बात को अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादित किया गया है।
४. प्रस्तुत श्लोक में शालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
शालिन्युक्ता म्तौ तगौ गोऽब्धिलोकैः।
५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
१. विद्या
नीतिशतकम् ६५
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पृथ्वी + अण् = पार्थिवः, पार्थिवस्य उपाश्रयेण (षष्ठी तत्पुरुष)
२. √पाल् + ल्युट् = पालनम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
३. √भुज् + घञ् = भागः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. मित्राणाम् संरक्षणम् (षष्ठी तत्पुरुष) मित्रसंरक्षणम्
५. सम् + √रक्ष् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) संरक्षणम्
६. प्र + √वृत् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रवृत्ताः
७. उप + आ + √श्रि + अच् (पुल्लिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) उपाश्रयेण
८. आ + √ज्ञा + अङ् + टाप् = आज्ञा
९. √कृत् + क्तिन् = कीर्तिः
यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद् वा धनं,
तत्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम्।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्तिं वृथा मा कृथाः,
कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम्॥४९॥
अन्वय- धात्रा यत् स्तोकम् महत् वा धनम् निजभालपट्टलिखितम् (अस्ति) तत् मरुस्थले अपि नितराम् प्राप्नोति, ततः अधिकम् मेरौ (अपि) न। तत् धीरः भव, वित्तवत्सु वृथा कृपणाम् वृत्तिम् मा कृथाः। पश्य, घटः कूपे पयोनिधौ अपि तुल्यम् जलम् (एव) गृह्णाति।
अनुवाद- विधाता ने जो थोड़ा अथवा अधिक धन अपने मस्तकपटल पर लिख दिया (है), वह (मनुष्य) मरुस्थलं में भी आसानी से प्राप्त कर लेता है, उससे अधिक सुमेरु पर्वत पर (भी) नहीं (पाता)। इसलिए धैर्यवान् बनो, धनवानों के प्रति व्यर्थ में दीनता का व्यवहार मत करो। देखो, घड़ा कुएँ (और) समुद्र में भी समान जल (ही) प्राप्त करता है।
व्याख्या- व्यक्ति को कभी भी अधिक धन प्राप्त करने के लिए धनवानों के सामने दीनहीन वृत्ति का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। इसी बात को सोदाहरणं समझाते हुए कवि कहता है कि—
विधाता अर्थात् ब्रह्मा ने मनुष्य के भाग्य पटल पर जितना भी, थोड़ा अथवा अधिक, धन प्राप्ति का उल्लेख कर दिया है, उसे उससे अधिक अथवा कम किसी भी स्थिति में प्राप्त नहीं होगा, भले ही व्यक्ति मरुस्थल में ही क्यों न हो अथवा सोने की खान सुमेरु पर्वत पर ही क्यों न पहुँच जाए।
इसलिए व्यक्ति को सदैव धैर्य का पालन करना चाहिए, धनाढ्यों के प्रति अधिक प्राप्त करने के लोभ में अपनी दीनहीन वृत्ति प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए।
६६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
पुनः कवि घड़े का उदाहरण देते हुए कहता है कि जरा घड़े को देखो, यदि उसे पानी लेने के लिए कुएँ में डुबाया जाए या फिर उसे समुद्र में डुबाया जाए। दोनों ही स्थितियों में वह समान ही जल तो ग्रहण करेगा ऐसा तो नहीं कि अथाह जलराशि वाले समुद्र से उसे अधिक जल प्राप्त हो जाएगा। इसलिए इस सिद्धान्त को समझते हुए व्यक्ति को संतोष ही धारण करना चाहिए, बहुत अधिक लोभ एवं दीनता उचित नहीं है।
विशेष- १. मनुष्य को धन-प्राप्ति के लालच में अपने स्वाभिमान को कभी नहीं भूलना चाहिए, अपितु धैर्य धारण करना चाहिए। २. प्रस्तुत श्लोक में दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है— लक्षण— दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्॥ ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √धा + तृच् = धातृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन) धात्रा २. वित्त + मतुप् = वित्तवत् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वित्तवत्सु ३. पयसाम् निधिः पयोनिधिः, तस्मिन् पयोनिधौ (षष्ठी तत्पुरुष) ४. पयस् + नि + √धा + कि (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ५. यत् + धात्रा (व्यञ्जन - झलां जशोऽन्ते) यद् धात्रा ६. मरुस्थले + अपि (पूर्वरूप - एडः पदान्तादति) मरुस्थलेऽपि ७. न + अधिकम् (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) नाधिकम् ८. धीरः + भव (विसर्ग - हशि च) धीरोभव ९. पयोनिधौ + अपि (अयादि, एचोऽयवायावः) पयोनिधावपि
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव कर्म, सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव। अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव, त्वन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्॥५०॥
अन्वय- तानि अविकलानि इन्द्रियाणि, तत् एव कर्म, सा (एव) अप्रतिहता बुद्धिः, तत् एव वचनम्, अर्थोष्मणा विरहितः स एव पुरुषः क्षणेन अन्यः भवति, इति एतत् तु विचित्रम् (अस्ति)।
अनुवाद- वे (ही) स्वस्थ इन्द्रियाँ हैं, वही कर्म (है), वही अप्रतिहत बुद्धि (है), वही वचन (है), धन की गर्मी से रहित वहीं पुरुष क्षणभर में अन्य हो जाता है, यह तो (अत्यन्त) विचित्र (हैं)।
नीतिशतकम् ६७
व्याख्या- धन की प्राप्ति और धन का अभाव दोनों ही व्यक्ति में महान् परिवर्तन लाने वाले होते हैं, हालाँकि व्यक्ति की इन्द्रियों में कोई परिवर्तन नहीं होता जैसी पहले स्वस्थ थी वैसी सी अब भी हैं। काम भी पहले जैसा ही करता है, कार्यशैली में भी कोई परिवर्तन नहीं आया। साथ ही बुद्धि भी वैसा ही कार्य करती है, उसकी तीक्ष्णता में भी कोई बदलाव नहीं आया। वाणी भी उसी प्रकार भाषण करती है, किन्तु यदि अकस्मात् व्यक्ति के पास से धन चला जाता है तो उस धन की गर्मी से वहीँ व्यक्ति क्षणभर में ही दूसरा हो जाता है, उसका तो मानो सारा संसार ही बदल जाता है। यह कितनी विचित्र अर्थात् आश्चर्यजनक बात है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में प्राप्त नहीं होता है। २. धन में भी एक अनोखी गर्मी होती है जो व्यक्ति में अद्भुत गति पैदा कर देती है। ३. धन की महिमा संस्कृत साहित्य में अनेकशः अनेक कवियों द्वारा वर्णित की गई है। ४. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः। ५. धनवान् का व्यवहार और निर्धन का व्यवहार, शरीर एक जैसा होने पर भी अत्यन्त भिन्न होता है। ६. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. तानि + इन्द्रियाणि + अविकलानि (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) (यण्, इकोयणचि) २. तत् + एव (व्यञ्जन, झलां जशोऽन्ते) ३. अर्थ + ऊष्मणा (गुण – आद्गुणः) ४. तु + अन्यः (यण् – इकोयणचि) ५. भवति + इति (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) ६. बुद्धिः + अप्रतिहता (विसर्ग – ससजुषो रुः) ७. न विकलानि इति (नञ् समास) अविकलानि ८. न प्रतिहता इति (नञ् समास) अप्रतिहता ९. अर्थस्य ऊष्मणा (षष्ठी तत्पुरुष) अर्थोष्मणा १०. प्रति + √हन् + क्त + टाप् (प्रतिहता, न प्रतिहता, इति, अप्रतिहता)
दुर्जनपद्धतिः
अकरुणत्वमकारण विग्रहः परधनेपरयोषिति च स्पृहा। सुजन बन्धुजनेष्वसहिष्णुता, प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम्॥५१॥
| ६८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
अन्वय- अकरुणत्वम्, अकारणविग्रहः, परधने, परयोषिति च स्पृहा, सुजनबंधुजनेषु असहिष्णुता, इदम् दुरात्मनाम् प्रकृतिसिद्धम् हि।
अनुवाद- निर्दयता, अकारण झगड़ा, दूसरे के धन में तथा दूसरे की स्त्री में इच्छा करना, सज्जन और बन्धुजनों में सहनशीलता का अभाव, यह दुष्टों को स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं।
व्याख्या- दुष्ट प्रकृति के लोगों में स्वभाव से ही ये बातें देखने को मिलती हैं, अर्थात् ये सब उन्हें सिखाने की आवश्यकता नहीं होती, ये तो मानो उन्हें जन्म से ही प्राप्त होती हैं जैसे -
दुष्ट लोग जन्म से ही दयाभाव से रहित होते हैं, उनका हृदय अत्यन्त कठोर होता है, व्यर्थ में बिना किसी कारण के झगड़ा करने को सदैव तत्पर रहते हैं। दूसरों का धन और पराई स्त्री को छिनने के लिए सदैव सोचते रहते हैं। इनका सज्जन लोगों तथा अपने भाई बन्धुओं के साथ व्यवहार अत्यन्त कठोर होता है अर्थात् इनका सहयोग करने की इनमें कभी भी प्रवृत्ति नहीं होती है।
विशेष- १. दुरात्मा व्यक्ति के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है। २. द्रुतविलम्बित छन्द, लक्षण इस प्रकार है— द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ। ३. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. नास्ति करुणा यस्य सः, अकरुणः , तस्य भावः अकरुणत्वम्, न करुणत्वम् (नञ् समास) २. न विद्यते कारणं यस्मिन् सः अकारणः, अकारणश्चासौ विग्रहः अकारणविग्रहः ३. वि + √ग्रह् + अप् = विग्रहः ४. √स्पृह् + अ + टाप् = स्पृहा। √सिध् + क्त = सिद्धम् ५. न सहिष्णु असहिष्णु (नञ् समास) तस्य भावः असहिष्णुता ६. √सह् + इष्णुच् + तल् + टाप् = सहिष्णुता ७. सुजनबंधुजनेषु + असहिष्णुता (यण्-इकोयणचि) = सुजनबंधुजनेष्वसहिष्णुता
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि¹ सन्।
मणिना भूषितः² सर्पः किमसौ न भयङ्करः॥५२॥
१. भूषितः
२. अलंकृतः
नीतिशतकम् ६९
अन्वय- विद्यया अलङ्कृतः अपि सन् दुर्जनः परिहर्तव्यः। किम् मणिना भूषितः असौ सर्पः भयंकरः न (भवति)।
अनुवाद- विद्या से अलंकृत होता हुआ भी दुष्ट त्यागने योग्य है। क्या मणि से भूषित वह सर्प भयंकर नहीं (होता है)।
व्याख्या- यदि कोई व्यक्ति दुष्ट स्वभाव का है तो भले ही वह विद्वान् ही क्यों न हो, उसको छोड़ देना ही हितकर'है अर्थात् विद्वान् दुष्ट की संगति को भी व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए। इस प्रसंग में कवि मणि से सुशोभित सर्प का उदाहरण देते हुए कहता है कि ऐसा सर्प जिसके मस्तक पर मणि विराजमान है क्या हानि कर नहीं होता है अर्थात् होता ही है।
विशेष-
१. यहाँ विद्वान् दुष्ट की तुलना मणिधारी सर्प से की गई है।
२. जिस प्रकार मणिधारी सांप और भी अधिक भयंकर एवं हानि पहुँचाने वाला होता है, ठीक उसी प्रकार विद्या से युक्त दुष्ट अत्यन्त हानिकर होता है। अतः त्याज्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द। लक्षण पूर्ववत्।
४. प्रथम चरण और द्वितीय चरण में सम्बन्ध न होने से उपमा की परिकल्पना करने के कारण निदर्शनालंकार—
अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमापरिकल्पकः निदर्शना।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √अस् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = सन्
२. परि + √हृ + तव्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = परिहर्तव्यः
३. √भूष् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भूषितः
४. अलम् + √कृ + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = अलंकृतः
५. भयम् करोति इति भयंकरः
६. √विद् + क्यप् + टाप् = विद्या तया विद्यया (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
७. √दुष् + क्त = दुष्टः, दुष्टः जनः, दुर्जनः
८. √सृप् + अच् = सर्पः
जाड्यं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौ¹ दम्भः शुचौ कैतवं,
शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे,
तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्जनैर्नाङ्कितः॥५३॥
१. व्रतशुचौ
७० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अन्वय- (दुर्जनैः गुणिनाम्) ह्रीमति जाड्यम्, व्रतरुचौ दम्भः, शुचौ केतवम्, शूरे निर्घृणता, मुनौ विमतिता, प्रियालापिनि दैन्यम्, तेजस्विनि अवलिप्तता, वक्तरि मुखरता, स्थिरे अशक्तिः गण्यते। तत् गुणिनाम् कः सः गुणः नाम भवेत्, यः दुर्जनैः न अङ्कितः।
अनुवाद- (दुर्जनों के द्वारा गुणवान् पुरुषों की) लज्जा में मूर्खता, व्रत की रुचि में पाखण्ड, पवित्रता में धूर्तता, शौर्य में निर्दयता, चुप रहने में बुद्धिहीनता, प्रिय बोलने में दीनता, तेजस्विता में अभिमान, वक्तृत्व में वाचालता, स्थिरचित्त (शान्ति) में निर्बलता समझी जाती है। तो गुणवानों का कौन सा वह गुण हो सकता है, जो दुर्जनों के द्वारा कलंकित नहीं किया गया हो।
व्याख्या- दुर्जनों का स्वभाव होता है कि वे सज्जनों से ईर्ष्या के कारण उनके गुणों को भी अवगुण के रूप में देखते हैं, इसी बात का प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है कि यदि सज्जन संकोची स्वभाव के होते हैं तो दुर्जन उन्हें मूर्ख कहकर उनका उपहास उड़ाते हैं, यदि उनकी रुचि व्रतोपवासादि में रहती है तो उन्हें पाखण्डी कहा जाता है, ठीक इसी प्रकार यदि वे पवित्रता का आचरण करते हैं तो उन्हें धूर्त कहा जाता है।
इसी प्रकार यदि सज्जन शूरवीर होते हैं तो उन्हें निर्दयी, निरंकुश कहकर उनकी प्रताड़ना की जाती है और यदि वे चुप रहते हैं तो उन्हें बुद्धिहीन है, ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार सज्जनों के मृदुभाषी होने पर उन्हें दीनहीन की संज्ञा दी जाती है और यदि वे तेजस्वी स्वभाव के होते हैं तो उन्हें घमण्डी कहा जाता है तथा यदि वे भाषण कला में निपुण होते हैं तो उन्हें बकवादी कहकर उनकी उपेक्षा की जाती है। इसी प्रकार यदि वे शान्त चित्त रहते है तो उन्हें कमजोर कहकर प्रताडित किया जाता है।
इस प्रकार जरा आप ही बताइये कि सज्जनों का ऐसा कौन सा गुण है जिसे दुष्ट लोगों ने दुर्गुण के रूप में प्रस्थापित करके कलंकित न किया हो अर्थात् कोई नहीं।
विशेष-
१. दुर्जनों का स्वभाव होता है कि वे सज्जनों से स्वाभाविक वैर के कारण उनकी प्रशंसा को सहन नहीं कर पाते हैं। अतः आत्मतुष्टि के लिए उन्हें उनके गुणों में भी दोष ही नजर आते हैं।
२. इस श्लोक में कवि ने दुर्जनों का अत्यन्त सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण प्रस्तुत किया है, क्योंकि वे सदैव सज्जनों की निन्दा ही करते रहते हैं।
३. शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. यहाँ घृणा पद दया अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
५. सम्भावना में विधिलिंग लकार का प्रयोग हुआ है (भवेत्)
६. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. ह्री + मतुप् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ह्रीमति
नीतिशतकम् ७१
२. √जड् + ष्यञ् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) जाड्यम्
३. व्रतेषु रुचिः यस्य सः (बहुव्रीहि) व्रतरुचिः तस्मिन् व्रतरुचौ
४. कितव + अण् = कैतव (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कैतवम्
५. निर्गता घृणा यस्मात् निर्घृणः (बहुव्रीहि) तस्य भावः निर्घृणता
६. प्रिय + आ + √लप् + णिनि (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) प्रियालापिनि
७. दीन + ष्यञ् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दैन्यम्
८. अव + √लिप् + क्त = अवलिप्त + तल् + टाप् = अवलिप्तता
९. √वच् + तृच् = वक्तृ (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वक्तरि
१०. मुखर + तल + टाप् = मुखरता
११. न शक्तिः इति अशक्तिः (नञ् समास)
१२. अङ्क + इतच् = अङ्कित (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१३. तेजस्विनि + अवलिप्तता (यण् – इकोयणचि)
१४. वक्तरि + अशक्तिः (यण् – इकोयणचि)
१५. यः + दुर्जनैः + न + अंकितः (विसर्ग – हशि च, ससजुषो रुः) (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः)
लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः,
सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं निजैः¹ सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः,
सद्-विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना॥५४॥
अन्वय- चेत् लोभः (अस्ति) अगुणेन किम्, यदि पिशुनता अस्ति, पातकैः किम्, चेत् सत्यम् च (अस्ति) तपसा किम्, यदि शुचि मनः अस्ति तीर्थेन किम्, यदि सौजन्यम् निजैः किम्, यदि सुमहिमा अस्ति मण्डनैः किम्, यदि सद् विद्या अस्ति धनैः किम्, यदि अपयशः अस्ति मृत्युना किम्।
अनुवाद- यदि (व्यक्ति के पास) लोभ (है तो) दुर्गुणों से क्या (लाभ) ? यदि चुगलखोरी है तो (अन्य) पापों से क्या ? और यदि सत्य (है) (तो) तपस्या से क्या (लाभ), यदि पवित्र मन है (तो) तीर्थों से क्या (प्रयोजन), यदि सज्जनता है (तो) आत्मीयों से क्या ? यदि सुयश है (तो) आभूषणों से क्या, यदि श्रेष्ठ विद्या है (तो) धनों से क्या (और) यदि अपकीर्ति है (तो) मृत्यु से क्या ?
व्याख्या- लोभ व्यक्ति का सबसे बड़ा दुर्गुण है यदि वह उसके पास है तो फिर उसे किसी अन्य दुर्गुण की आवश्यकता नहीं है। यदि व्यक्ति चुगलखोर है तो उसे किसी दूसरे पाप करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चुगलखोरी सबसे बड़ा पाप है और
१. जनैः
| ७२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
|---|
यदि व्यक्ति सत्यभाषण करता है तो वह सबसे बड़ा तपस्वी है, क्योंकि सत्य बोलना सबसे बड़ी तपस्या है।
इसके अतिरिक्त यदि व्यक्ति का मन पवित्र है तो उसे किसी तीर्थ पर जाने की आवश्यकता नहीं है, पवित्र मन ही श्रेष्ठ तीर्थ है। यदि व्यक्ति सज्जन स्वभाव वाला है तो उसे आत्मीयजनों की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि उसके स्वभाव के कारण सभी लोग उसके अपने हो जाएँगे। यदि व्यक्ति प्रशंसनीय कीर्ति वाला है तो उसे कोई आभूषण धारण करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सुयश स्वयं में सबसे बड़ा आभूषण है।
ठीक इसी प्रकार यदि व्यक्ति के पास श्रेष्ठ विद्या है तो उसे किसी भी प्रकार के धनसंग्रह की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सद् विद्या सबसे बड़ा धन है। कहा भी है. विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम्।
अन्त में कवि कहता है कि यदि व्यक्ति अपकीर्ति वाला है तो उसे मृत्यु की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जिस व्यक्ति का संसार में अपयश फैला हुआ है वह तो जीवित रहते हुए भी मरा हुआ है।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में लोभ को सबसे बड़ा दुर्गुण, चुगलखोरी को सबसे बड़ा पाप, सत्य-भाषण को सबसे बड़ी तपस्या, पवित्र मन को सबसे बड़ा तीर्थ, सुयश को सबसे बड़ा आभूषण, श्रेष्ठ विद्या को उत्तम धन तथा अपयश को मृत्यु बताया गया है।
२. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण—
सूर्याश्वैर्मजसास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
३. किम् पद का प्रयोग यहाँ निरर्थकता प्रतिपादित करने के लिए हुआ है।
४. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. न गुणः इति (नञ् समास) तेन अगुणेन
२. पिशुन + तल् + टाप् = पिशुनता
३. सुजन + ष्यञ् (नपुं. प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = सौजन्यम्
४. महत् + इमनिच् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) महिमा
५. शोभनः महिमा सुमहिमा (कर्मधारय)
६. √मण्ड् + ल्युट् (नपुं. तृतीया विभक्ति, बहुवचन) मण्डनैः
७. √पत् + णिच् + ण्वुल् = पातकः तैः पातकैः
८. लोभः + चेत् + अगुणेन (स्तोःश्चुना श्चुः, झलां जश झशि)
९. यदि + अस्ति = (यण् – इकोयणर्चि – इ – य्)
१०. धनैः+अपयशः+ यदि (:-र्-ससजुषो रुः,:-उ-ओ)–(हशि च, आद् गुणः)
नीतिशतकम् ७३
शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी,
सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः।
प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतसज्जनो,
नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे॥५५॥
अन्वय- दिवसधूसरः शशी, गलितयौवना कामिनी, विगतवारिजम् सरः, स्वाकृतेः अनक्षरम् मुखम्, धन-परायणः प्रभुः, सततदुर्गतः सज्जनः, नृपाङ्गणगतः खलः, मे मनसि (एते) सप्तशल्यानि (सन्ति)।
अनुवाद- दिन में मलिन (कान्ति) चन्द्रमा, ढ़ले यौवनवाली सुन्दरी, कमलरहित सरोवर, सुन्दर आकृति वाला निरक्षर मुख, धन (बटोरने) में लगा स्वामी, निरन्तर दुर्गति को प्राप्त सज्जन, राजसभा में गया हुआ दुष्ट, मेरे मन में (ये) सात काँटे (निरन्तर खटकते हैं)।
व्याख्या- कवि को ये सात बातें काँटे के समान अत्यन्त कष्टकारी लगती हैं— दिन के तेज के कारण मलिन हुआ चन्द्रमा, ऐसी सुन्दर स्त्री जिसका यौवन अब आयु के बढ़ जाने से ढ़ल गया है अर्थात् कम हो गया है, ऐसा सरोवर जिसके कमल अब समाप्त हो गए हैं। ऐसा कंजूस स्वामी जो केवल धन-संग्रह में ही लगा हुआ है, अपने सेवकों का तथा अन्यों का उसे तनिक भी ध्यान नहीं है।
ऐसा सज्जन जो अपने गुणों के कारण ही दुर्जनों द्वारा अत्यन्त कष्टकारी स्थिति में पहुँचा दिया गया हो, ऐसा दुष्ट जो येनकेन प्रकारेण राजसभा में सम्मानजनक स्थान पर नियुक्त हो गया हो, क्योंकि उसके वहाँ जाने से अन्य लोग अनेक परेशानियों से घिर जाएँगे।
विशेष-
१. कांटा जिस प्रकार चुभने पर वेदना, कष्ट प्रदान करता है वैसे ही ये बातें देखकर असह्य मानसिक वेदना की कवि को अनुभूति होती है, यह अभिप्राय है।
२. पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।
३. दीपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिवसे धूसरः (सप्तमी तत्पुरुष) दिवसधूसरः
२. शश + इनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शशी
३. गलितं यौवनं यस्याः सा (बहुव्रीहि) गलितयौवना
४. √गल् + क्त = गलितः
५. युवन् + अण् = यौवन
६. काम + इनि + ङीप् = कामिनी
७४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
७. विगतानि वारिजानि यस्मात् तत् (बहुव्रीहि) विगतवारिजम्
८. न अक्षरम् अनक्षरम् (नञ् समास) अक्षरहिरतम् इति वा
९. धने परायणः (सप्तमी तत्पुरुष) धनपरायणः
१०. वारि + √जन् + ड = वारिजम्
११. दुष्टः गतिः दुर्गतिः, सततं दुर्गतिः यस्य सः (बहुव्रीहि) सततदुर्गतिः
न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजाम्।
होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः॥५६॥
अन्वय- चण्डकोपानाम् भूभुजाम् कश्चित् नाम आत्मीयः न (भवति), स्पृष्टः पावकः जुह्वानम् होतारम् अपि दहति।
अनुवाद- भयानक क्रोध वाले राजाओं का कोई भी अपना नहीं होता। स्पर्श किया गया अग्नि हवन करने वाले होता को भी जलाता है।
व्याख्या- जिन राजाओं का क्रोध अत्यन्त प्रचण्ड होता है, उनका कोई भी व्यक्ति आत्मीय अर्थात् निकटस्थ नहीं होता, क्योंकि उसे कब क्रोध आ जाएगा यह कुछ भी निश्चित नहीं होता तथा उसके क्रोधित होने पर व्यक्ति के प्राण भी जा सकते हैं। इसलिए कोई भी उसके निकट जाने तथा उसका हित सोचने का साहस नहीं कर पाता है।
इसी प्रसंग में अग्नि का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि कहता है कि क्रोधी राजा अग्नि के समान होते हैं, जो हवन करने वाले होता के हाथ को ही स्पर्श किए जाने पर जला देता है, हालाँकि वह होता उसी को हवि देकर प्रसन्न करता है।
विशेष-
१. यहाँ क्रोधी राजा को अग्नि के समान बताया गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'अव्यवस्थितचित्तानां प्रसादोऽपि भयंकरः' इन भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है।
३. निदर्शना अलंकार का प्रयोग हुआ है, क्योंकि द्वितीय पंक्ति की उपमा के रूप परिकल्पना करनी पड़ती है—
अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमा परिकल्पकः निदर्शना।
४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. चण्डः कोपः यस्य सः, चण्डकोपः तेषाम् (बहुव्रीहि) चण्डकोपानाम्।
२. √कुप् + घञ् = कोपः
३. भुवं भुञ्जन्ति इति भूभुजः, तेषाम् – भूभुजाम्
४. भू + √भुज् + क्विप् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन)
५. आत्मन् + छ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = आत्मीय
६. √पू + ण्वुल् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = पावकः
नीतिशतकम् ७५
७. √स्पृश् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. √हु + शानच् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) = जुह्वानम्
९. √हु + तृच् = होतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. √दह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) दहति
मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पको वा,
धृष्टः पार्श्वे वसति च सदा दूरतश्चाप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः,
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥५७॥
अन्वय- (सेवकः) मौनात् मूकः, प्रवचन-पटुः चाटुलः जल्पकः वा, सदा पार्श्वे वसति च धृष्टः, दूरतः च (वसति) अप्रगल्भः, क्षान्त्या भीरुः, यदि सहते न प्रायशः अभिजातः न (इति कथ्यते)। (अतः) सेवाधर्मः योगिनाम् अपि अगम्यः, परम गहनः भवति।
अनुवाद- (सेवक) चुप रहने से गूँगा, बोलने में निपुण होने पर, बहुत बोलने वाला या बकवादी और सदैव समीप रहने पर ढीठ, और दूर (रहने पर) न बोलने वाला क्षमाशील होने से डरपोक, यदि (अन्याय आदि को) सहन नहीं करता (तो) प्रायः सत्कुलोत्पन्न नहीं है (ऐसा कहा जाता है)। (अतः) सेवाधर्म योगियों के लिए भी अगम्य (और) अत्यन्त दुर्गम होता है।
व्याख्या- किसी की सेवा करने का काम अत्यन्त कठिन है तथा सबके वश की बात नहीं है। यहाँ तक कि यदि योगी भी इस कार्य में निपुणता प्राप्त करना चाहें तो उन्हें भी सफलता प्राप्त नहीं हो सकेगी, इसी का कारण बताते हुए कवि कहता है कि सेवक यदि अपने स्वामी के सामने उसका सम्मान करते हुए चुप रहता है तो स्वामी उसे मुँह में जबान नहीं है, ऐसा कहकर फटकार लगाता है और यदि वह अपनी योग्यता के कारण मालिक की बातों का बराबर जवाब देता है तो उसे बकवादी, फालतू बोलने वाला कहकर उसका तिरस्कार किया जाता है।
इसी प्रकार यदि सेवक सेवाभाव के कारण स्वामी के आसपास रहने का प्रयास करता है तो उसे ढीठ कहा जाता है और यदि वह दूर रहता है तो जरा भी अक्ल नहीं है, कहाँ रहना चाहिए, कहाँ नहीं, यह कहकर उसे दोषी करार दिया जाता है।
ठीक इसी प्रकार यदि सेवक स्वामी के किसी भी प्रकार से डांटने आदि पर भी उसे क्षमापूर्वक पलटकर जवाब नहीं देता तो डरपोक है, ऐसा कह दिया जाता है और यदि वह स्वामी आदि के द्वारा किए गए अन्याय अथवा दुर्व्यवहार को सहन न करता हुआ प्रतिकार करता है तो उसके लिए कहा जाता है कि यह सेवकों के श्रेष्ठकुल में उत्पन्न नहीं हुआ है। इसप्रकार सेवक के लिए सेवाकार्य करना अत्यन्त कठिन है।
७६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
विशेष- १. सेवाकार्य को अत्यन्त कठिन बताया गया है। २. वस्तुतः स्वामी का व्यवहार सेवक के लिए प्रायः इसी प्रकार का होता है। ३. मन्दाक्रान्ता छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— मन्दाक्रान्ता जलधिःषड् गैम्भौ नतौ ताद् गुरू चेत्। ४. 'वसति' पद यहाँ शतृ प्रत्ययान्त, सप्तमी विभक्ति के रूप में प्रयुक्त हुआ है, क्रिया पद, लट् लकार के रूप में नहीं। ५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मुनेर्भावः मौनम्। मुनि + अण् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मौनात् २. प्रवचने पटुः, प्रवचन पटुः (सप्तमी तत्पुरुष) ३. √जल्प् + ण्वुल् = जल्पकः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. √वस् + शतृ = वसति (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ५. √धृष् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = धृष्टः ६. न प्रगल्भः इति (नञ् समास) प्र + √गल्भ् + क्त = अप्रगल्भः ७. √क्षम् + क्तिन् = क्षान्त्या (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन). ८. अभि + √जन् + क्त = अभिजातः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. √गह् + ल्युट् = गहन १०. न गम्यः इति (नञ् समास) √गम् + ण्यत् = गम्यः ११. चाटुलः + जल्पकः + धा (:— उ— ओ, हशि च, आद् गुणः) १२. प्रायशः + न + अभिजातः (:— उ— ओ, हशि च, आद् गुणः) (दीर्घ— अकः सवर्णे दीर्घः) १३. भीरुः + यदि (ससजुषो रुः— :— र्) १४. दूरतः + अपि + अप्रगल्भः (अतो रोरप्लुतादप्लुतेः, इकोयणचि)
उद्भासिताखिलखलस्य विशृङ्खलस्य,
प्राग्जातविस्तृतनिजाधमकर्मवृत्तेः।
दैवादवाप्तविभवस्य गुणद्विषोऽस्य,
नीचस्य गोचरगतैः सुखमास्यते कैः॥५८॥
अन्वय- उद्भासिताखिलखलस्य विशृङ्खलस्य, प्राक्, जातविस्तृतनिजाधमकर्मवृत्तेः दैवात् अवाप्त-विभवस्य, गुणद्विषः अस्य नीचस्य गोचरगतैः कैः सुखम् आस्यते।
अनुवाद- (सदैव) सभी दुष्टों को प्रोत्साहित करने वाले, मर्यादाविहीन, पूर्वजन्म (के कर्मों) से बढ़े हुए अपने नीच कार्यों की प्रवृत्ति वाले, देवयोग से प्राप्त ऐश्वर्य से