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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 194 में से

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पृष्ठ 91

नीतिशतकम् ६९

अन्वय- विद्यया अलङ्कृतः अपि सन् दुर्जनः परिहर्तव्यः। किम् मणिना भूषितः असौ सर्पः भयंकरः न (भवति)।

अनुवाद- विद्या से अलंकृत होता हुआ भी दुष्ट त्यागने योग्य है। क्या मणि से भूषित वह सर्प भयंकर नहीं (होता है)।

व्याख्या- यदि कोई व्यक्ति दुष्ट स्वभाव का है तो भले ही वह विद्वान् ही क्यों न हो, उसको छोड़ देना ही हितकर'है अर्थात् विद्वान् दुष्ट की संगति को भी व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए। इस प्रसंग में कवि मणि से सुशोभित सर्प का उदाहरण देते हुए कहता है कि ऐसा सर्प जिसके मस्तक पर मणि विराजमान है क्या हानि कर नहीं होता है अर्थात् होता ही है।

विशेष- १. यहाँ विद्वान् दुष्ट की तुलना मणिधारी सर्प से की गई है।
२. जिस प्रकार मणिधारी सांप और भी अधिक भयंकर एवं हानि पहुँचाने वाला होता है, ठीक उसी प्रकार विद्या से युक्त दुष्ट अत्यन्त हानिकर होता है। अतः त्याज्य है।
३. अनुष्टुप् छन्द। लक्षण पूर्ववत्।
४. प्रथम चरण और द्वितीय चरण में सम्बन्ध न होने से उपमा की परिकल्पना करने के कारण निदर्शनालंकार—

अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमापरिकल्पकः निदर्शना।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √अस् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = सन्
२. परि + √हृ + तव्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = परिहर्तव्यः
३. √भूष् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भूषितः
४. अलम् + √कृ + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = अलंकृतः
५. भयम् करोति इति भयंकरः
६. √विद् + क्यप् + टाप् = विद्या तया विद्यया (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
७. √दुष् + क्त = दुष्टः, दुष्टः जनः, दुर्जनः
८. √सृप् + अच् = सर्पः

जाड्यं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौ¹ दम्भः शुचौ कैतवं,
शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे,
तत्को नाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्जनैर्नाङ्कितः॥५३॥


१. व्रतशुचौ

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