नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें७० | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अन्वय- (दुर्जनैः गुणिनाम्) ह्रीमति जाड्यम्, व्रतरुचौ दम्भः, शुचौ केतवम्, शूरे निर्घृणता, मुनौ विमतिता, प्रियालापिनि दैन्यम्, तेजस्विनि अवलिप्तता, वक्तरि मुखरता, स्थिरे अशक्तिः गण्यते। तत् गुणिनाम् कः सः गुणः नाम भवेत्, यः दुर्जनैः न अङ्कितः।
अनुवाद- (दुर्जनों के द्वारा गुणवान् पुरुषों की) लज्जा में मूर्खता, व्रत की रुचि में पाखण्ड, पवित्रता में धूर्तता, शौर्य में निर्दयता, चुप रहने में बुद्धिहीनता, प्रिय बोलने में दीनता, तेजस्विता में अभिमान, वक्तृत्व में वाचालता, स्थिरचित्त (शान्ति) में निर्बलता समझी जाती है। तो गुणवानों का कौन सा वह गुण हो सकता है, जो दुर्जनों के द्वारा कलंकित नहीं किया गया हो।
व्याख्या- दुर्जनों का स्वभाव होता है कि वे सज्जनों से ईर्ष्या के कारण उनके गुणों को भी अवगुण के रूप में देखते हैं, इसी बात का प्रतिपादन करते हुए कवि कहता है कि यदि सज्जन संकोची स्वभाव के होते हैं तो दुर्जन उन्हें मूर्ख कहकर उनका उपहास उड़ाते हैं, यदि उनकी रुचि व्रतोपवासादि में रहती है तो उन्हें पाखण्डी कहा जाता है, ठीक इसी प्रकार यदि वे पवित्रता का आचरण करते हैं तो उन्हें धूर्त कहा जाता है।
इसी प्रकार यदि सज्जन शूरवीर होते हैं तो उन्हें निर्दयी, निरंकुश कहकर उनकी प्रताड़ना की जाती है और यदि वे चुप रहते हैं तो उन्हें बुद्धिहीन है, ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार सज्जनों के मृदुभाषी होने पर उन्हें दीनहीन की संज्ञा दी जाती है और यदि वे तेजस्वी स्वभाव के होते हैं तो उन्हें घमण्डी कहा जाता है तथा यदि वे भाषण कला में निपुण होते हैं तो उन्हें बकवादी कहकर उनकी उपेक्षा की जाती है। इसी प्रकार यदि वे शान्त चित्त रहते है तो उन्हें कमजोर कहकर प्रताडित किया जाता है।
इस प्रकार जरा आप ही बताइये कि सज्जनों का ऐसा कौन सा गुण है जिसे दुष्ट लोगों ने दुर्गुण के रूप में प्रस्थापित करके कलंकित न किया हो अर्थात् कोई नहीं।
विशेष-
१. दुर्जनों का स्वभाव होता है कि वे सज्जनों से स्वाभाविक वैर के कारण उनकी प्रशंसा को सहन नहीं कर पाते हैं। अतः आत्मतुष्टि के लिए उन्हें उनके गुणों में भी दोष ही नजर आते हैं।
२. इस श्लोक में कवि ने दुर्जनों का अत्यन्त सुन्दर मनोवैज्ञानिक चित्रण प्रस्तुत किया है, क्योंकि वे सदैव सज्जनों की निन्दा ही करते रहते हैं।
३. शार्दूलविक्रीडित छन्द है, लक्षण इस प्रकार है—
सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।
४. यहाँ घृणा पद दया अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
५. सम्भावना में विधिलिंग लकार का प्रयोग हुआ है (भवेत्)
६. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. ह्री + मतुप् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ह्रीमति