नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८ | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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अन्वय- अकरुणत्वम्, अकारणविग्रहः, परधने, परयोषिति च स्पृहा, सुजनबंधुजनेषु असहिष्णुता, इदम् दुरात्मनाम् प्रकृतिसिद्धम् हि।
अनुवाद- निर्दयता, अकारण झगड़ा, दूसरे के धन में तथा दूसरे की स्त्री में इच्छा करना, सज्जन और बन्धुजनों में सहनशीलता का अभाव, यह दुष्टों को स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं।
व्याख्या- दुष्ट प्रकृति के लोगों में स्वभाव से ही ये बातें देखने को मिलती हैं, अर्थात् ये सब उन्हें सिखाने की आवश्यकता नहीं होती, ये तो मानो उन्हें जन्म से ही प्राप्त होती हैं जैसे -
दुष्ट लोग जन्म से ही दयाभाव से रहित होते हैं, उनका हृदय अत्यन्त कठोर होता है, व्यर्थ में बिना किसी कारण के झगड़ा करने को सदैव तत्पर रहते हैं। दूसरों का धन और पराई स्त्री को छिनने के लिए सदैव सोचते रहते हैं। इनका सज्जन लोगों तथा अपने भाई बन्धुओं के साथ व्यवहार अत्यन्त कठोर होता है अर्थात् इनका सहयोग करने की इनमें कभी भी प्रवृत्ति नहीं होती है।
विशेष- १. दुरात्मा व्यक्ति के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया है। २. द्रुतविलम्बित छन्द, लक्षण इस प्रकार है— द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ। ३. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. नास्ति करुणा यस्य सः, अकरुणः , तस्य भावः अकरुणत्वम्, न करुणत्वम् (नञ् समास) २. न विद्यते कारणं यस्मिन् सः अकारणः, अकारणश्चासौ विग्रहः अकारणविग्रहः ३. वि + √ग्रह् + अप् = विग्रहः ४. √स्पृह् + अ + टाप् = स्पृहा। √सिध् + क्त = सिद्धम् ५. न सहिष्णु असहिष्णु (नञ् समास) तस्य भावः असहिष्णुता ६. √सह् + इष्णुच् + तल् + टाप् = सहिष्णुता ७. सुजनबंधुजनेषु + असहिष्णुता (यण्-इकोयणचि) = सुजनबंधुजनेष्वसहिष्णुता
दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि¹ सन्।
मणिना भूषितः² सर्पः किमसौ न भयङ्करः॥५२॥
१. भूषितः
२. अलंकृतः