भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 194 में से

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पृष्ठ 89

नीतिशतकम् ६७

व्याख्या- धन की प्राप्ति और धन का अभाव दोनों ही व्यक्ति में महान् परिवर्तन लाने वाले होते हैं, हालाँकि व्यक्ति की इन्द्रियों में कोई परिवर्तन नहीं होता जैसी पहले स्वस्थ थी वैसी सी अब भी हैं। काम भी पहले जैसा ही करता है, कार्यशैली में भी कोई परिवर्तन नहीं आया। साथ ही बुद्धि भी वैसा ही कार्य करती है, उसकी तीक्ष्णता में भी कोई बदलाव नहीं आया। वाणी भी उसी प्रकार भाषण करती है, किन्तु यदि अकस्मात् व्यक्ति के पास से धन चला जाता है तो उस धन की गर्मी से वहीँ व्यक्ति क्षणभर में ही दूसरा हो जाता है, उसका तो मानो सारा संसार ही बदल जाता है। यह कितनी विचित्र अर्थात् आश्चर्यजनक बात है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में प्राप्त नहीं होता है। २. धन में भी एक अनोखी गर्मी होती है जो व्यक्ति में अद्भुत गति पैदा कर देती है। ३. धन की महिमा संस्कृत साहित्य में अनेकशः अनेक कवियों द्वारा वर्णित की गई है। ४. प्रस्तुत श्लोक में वसन्ततिलका छन्द है, लक्षण इस प्रकार है— उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः। ५. धनवान् का व्यवहार और निर्धन का व्यवहार, शरीर एक जैसा होने पर भी अत्यन्त भिन्न होता है। ६. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. तानि + इन्द्रियाणि + अविकलानि (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) (यण्, इकोयणचि) २. तत् + एव (व्यञ्जन, झलां जशोऽन्ते) ३. अर्थ + ऊष्मणा (गुण – आद्गुणः) ४. तु + अन्यः (यण् – इकोयणचि) ५. भवति + इति (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) ६. बुद्धिः + अप्रतिहता (विसर्ग – ससजुषो रुः) ७. न विकलानि इति (नञ् समास) अविकलानि ८. न प्रतिहता इति (नञ् समास) अप्रतिहता ९. अर्थस्य ऊष्मणा (षष्ठी तत्पुरुष) अर्थोष्मणा १०. प्रति + √हन् + क्त + टाप् (प्रतिहता, न प्रतिहता, इति, अप्रतिहता)

दुर्जनपद्धतिः

अकरुणत्वमकारण विग्रहः परधनेपरयोषिति च स्पृहा। सुजन बन्धुजनेष्वसहिष्णुता, प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम्॥५१॥