भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 194 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 88

६६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

पुनः कवि घड़े का उदाहरण देते हुए कहता है कि जरा घड़े को देखो, यदि उसे पानी लेने के लिए कुएँ में डुबाया जाए या फिर उसे समुद्र में डुबाया जाए। दोनों ही स्थितियों में वह समान ही जल तो ग्रहण करेगा ऐसा तो नहीं कि अथाह जलराशि वाले समुद्र से उसे अधिक जल प्राप्त हो जाएगा। इसलिए इस सिद्धान्त को समझते हुए व्यक्ति को संतोष ही धारण करना चाहिए, बहुत अधिक लोभ एवं दीनता उचित नहीं है।

विशेष- १. मनुष्य को धन-प्राप्ति के लालच में अपने स्वाभिमान को कभी नहीं भूलना चाहिए, अपितु धैर्य धारण करना चाहिए। २. प्रस्तुत श्लोक में दृष्टान्त अलंकार का प्रयोग हुआ है— लक्षण— दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्॥ ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजस्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √धा + तृच् = धातृ (तृतीया विभक्ति, एकवचन) धात्रा २. वित्त + मतुप् = वित्तवत् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) वित्तवत्सु ३. पयसाम् निधिः पयोनिधिः, तस्मिन् पयोनिधौ (षष्ठी तत्पुरुष) ४. पयस् + नि + √धा + कि (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ५. यत् + धात्रा (व्यञ्जन - झलां जशोऽन्ते) यद् धात्रा ६. मरुस्थले + अपि (पूर्वरूप - एडः पदान्तादति) मरुस्थलेऽपि ७. न + अधिकम् (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) नाधिकम् ८. धीरः + भव (विसर्ग - हशि च) धीरोभव ९. पयोनिधौ + अपि (अयादि, एचोऽयवायावः) पयोनिधावपि

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव कर्म, सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव। अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव, त्वन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्॥५०॥

अन्वय- तानि अविकलानि इन्द्रियाणि, तत् एव कर्म, सा (एव) अप्रतिहता बुद्धिः, तत् एव वचनम्, अर्थोष्मणा विरहितः स एव पुरुषः क्षणेन अन्यः भवति, इति एतत् तु विचित्रम् (अस्ति)।

अनुवाद- वे (ही) स्वस्थ इन्द्रियाँ हैं, वही कर्म (है), वही अप्रतिहत बुद्धि (है), वही वचन (है), धन की गर्मी से रहित वहीं पुरुष क्षणभर में अन्य हो जाता है, यह तो (अत्यन्त) विचित्र (हैं)।