नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ६३
वार्तालाप करती है। कभी वह हिंसा का सहारा लेती है तो कभी अत्यन्त दयालुता के साथ व्यवहार करती है।
इसी प्रकार कभी उसकी गिद्ध दृष्टि केवल धन के प्राप्त करने में ही रहती है, तो कभी वह दानादि के द्वारा अत्यन्त उदारता का परिचय देती है। कभी वह अत्यधिक धन का खर्च करती है तो कहीं उसे अनेक मार्गों से धन की प्राप्ति होती है।
ठीक इसी प्रकार राजनीति, राजाओं की नीति भी अनेक रूपों वाली होती है। वह भी कभी तो अवसर के अनुकूल झूठ बोलती है तो कभी सच बोलती है। कोई भी राजनीतिज्ञ कभी भी एक जैसे रूप एवं सिद्धान्त वाला नहीं होता। कभी वह अत्यन्त कठोरता के साथ आचरण करता है, तो कभी वह उदारता की सभी सीमाओं को लांघ जाता है, ऐसा लगता है कि इससे अधिक उदार इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता है। कभी अपनी बात मनवाने के लिए वह अनेक लोगों को क्षणभर में कटवा डालता है तो अनेक बार ऐसे अनेक कार्य करता है जिनसे उसकी दयालु हृदय होने का प्रणाम मिलता है।
विशेष- १. यहाँ राजनीति को वेश्या के समान अनेक रूपों वाला प्रतिपादित किया गया है। २. राजनीति के लिए, इसीलिए कहा जाता है कि यह तो गिरगिट के समान क्षण-क्षण में अपने रंग बदलती है। ३. राजनीति की उपमा वेश्या से दी गई है इसलिए उपमालंकार
प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते।
४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
रसैः रुद्रैश्छिन्नायमनसभलागः शिखरिणी।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. सत्या च अनृता च (द्वन्द्व समास) सत्यानृता २. न ऋता इति अनृता (नञ् समास) सत्य + अच् + टाप् = सत्या ३. प्रि + √वद् + णिनि = प्रियवादिन् ङीप्, प्रियवादिनी ४. प्रियम् वदति इति, प्रियवादिनी ५. नित्यं व्ययो यस्याः सा नित्यव्यया (बहुव्रीहि) ६. प्रचुरं नित्यं धनागमः यस्यां सा, प्रचुरनित्यधनागमा (बहुव्रीहि) ७. अनेकानि रूपाणि यस्याः सा, अनेक रूपा (बहुव्रीहि) ८. √हिंस् + र + टाप् = हिंसा ९. वारस्य जनसमूहस्य अङ्गना स्त्री या सा (बहुव्रीहि) वाराङ्गना १०. √पृ + उषन् + टाप् = परुषा ११. √वद् + अन्य + टाप् = वदान्या १२. वाराङ्गना + इव (गुण, आद् गुणः) वाराङ्गनेव