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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 194 में से

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६४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१३. धनस्य + आगमः = धनागमः (षष्ठी तत्पुरुष) (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१४. नृपनीतिः + अनेकरूपा (विसर्गः, ससजुषो रुः) नृपनीतिरनेकरूपा
१५. दयालुः + अपि (विसर्ग, ससजुषो रुः) दयालुरपि
१६. च + अर्थपरा (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) चार्थपरा

आज्ञा१ कीर्तिः पालनं ब्राह्मणानां,
दानं भोगो मित्रसंरक्षणञ्च।
येषामेते षड्गुणा न प्रवृत्ताः,
कोऽर्थस्तेषां पार्थिवोपाश्रयेण॥४८॥

अन्वय- येषाम् (पार्थिवानाम्) आज्ञा, कीर्तिः, ब्राह्मणानाम् पालनम्, दानम्, भोगः मित्रसंरक्षणम् च एते षड्गुणाः प्रवृत्ताः न, तेषाम् पार्थिवोपाश्रयेण कः अर्थः ?

अनुवाद- जिन (राजाओं के) पास आज्ञा, कीर्ति, ब्राह्मणों का पालन, दान, भोग और मित्रों की रक्षा करना ये छः गुण विराजमान नहीं (हैं), उन राजाओं के आश्रय से क्या लाभ ?

व्याख्या- जिन राजाओं की आज्ञा का उनकी प्रजा पालन नहीं करती हो, जिसका आदेश प्रभावशाली न हो। जिनकी उदारता एवं प्रजापालन विषयककीर्ति दिग्दिगन्त में प्रसारित नहीं हो रही हो, जो विद्वान् एवं ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों का ठीक प्रकार पालन नहीं करते हों, जो याचकों को पर्याप्त धनराशि दान नहीं देते हों, जो अपने ऐश्वर्यों का उपभोग नहीं करते हों और अपने मित्रों और हितैषियों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं करते हों ऐसे राजाओं के आश्रित रहने, उनकी सेवा करने से क्या लाभ अर्थात् ऐसे राजाओं के राज्य में, उनकी सेवा में रहना पूर्णतया निरर्थक है जिनमें उपरोक्त छः गुण नहीं है।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में उत्तम राजा के छः श्रेष्ठ गुणों का परिगणन किया गया है।
२. यहाँ अप्रत्यक्ष रूप में राजा को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इस ओर भी संकेत किया गया है।
३. गुणवान् राजा ही सेवा के योग्य है, इस बात को अत्यन्त सुन्दर ढंग से प्रतिपादित किया गया है।
४. प्रस्तुत श्लोक में शालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
शालिन्युक्ता म्तौ तगौ गोऽब्धिलोकैः।
५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।


१. विद्या

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