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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

६२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

५. पृथिवी रूपी गाय से धन रूपी दूध प्राप्त करने के लिए प्रजा रूपी बछड़े को प्रसन्न करना अत्यावश्यक है। तभी भूमि कल्पलता के समान मनोवांछित फल प्रदान करेगी।

६. राजा के लिए अत्यन्त सुन्दर ढंग से नीतिगत उपदेश दिया गया है।

७. तेन पद का प्रयोग तृतीया अथवा चतुर्थी दोनों अर्थों की अभिव्यक्ति में स्वीकार किया जा सकता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. दोग्धुम् इच्छसि, दुधुक्षसि। √दुह् + सन् + सिप् (लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन)
२. परि + √पुष् + शानच् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) परिपोष्यमाणे
३. क्षितिः एव धेनुः क्षितिधेनुः ताम् क्षितिधेनुम् अथवा
४. क्षितिरूपा धेनुः ताम्
५. √पुष् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पुषाण
६. तेन + अद्य (दीर्घ, अकः सवर्णे दीर्घः) तेनाद्य
७. तस्मिन् + च (व्यञ्जन, नश्छव्यप्रशान्, स्तोःश्चुना श्चुः)
८. कल्पलता + इव (गुण, आद् गुणः)

सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च,
हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या।
नित्यव्यया प्रचुरनित्यधनागमा च,
वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा॥४७॥

अन्वय- नृपनीतिः वाराङ्गना इव सत्या अनृता च, परुषा प्रियवादिनी च, हिंस्रा दयालुः अपि, अर्थपरा वदान्या च, नित्यव्यया, प्रचुर-नित्य-धनागमा च अनेक रूपा (भवति)

अनुवाद- राजाओं की नीति वेश्या के समान, सत्य और (कहीं) असत्य, कठोर और (कहीं) प्रिय बोलने वाली, हिंसक (और) (कहीं कहीं) दयालु भी, (कहीं) धन की लोभी और कहीं उदार, नित्य व्यय करने वाली और (कहीं) नित्य प्रचुर मात्रा में धनागम (के कारण) अनेक रूपों वाली (होती है)।

व्याख्या- राजनीति वेश्या के समान अनेक रूपों वाली होती है, जिस प्रकार वेश्या कभी सच बोलती है तो कभी अवसर पड़ने पर झूठ भी बोलती है। कभी वह अत्यन्त कठोरतापूर्वक व्यवहार करती है तो कभी अत्यन्त मधुर भाषण करते हुए प्रेमपूर्वक