नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ७३
शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी,
सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतेः।
प्रभुर्धनपरायणः सततदुर्गतसज्जनो,
नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानि मे॥५५॥
अन्वय- दिवसधूसरः शशी, गलितयौवना कामिनी, विगतवारिजम् सरः, स्वाकृतेः अनक्षरम् मुखम्, धन-परायणः प्रभुः, सततदुर्गतः सज्जनः, नृपाङ्गणगतः खलः, मे मनसि (एते) सप्तशल्यानि (सन्ति)।
अनुवाद- दिन में मलिन (कान्ति) चन्द्रमा, ढ़ले यौवनवाली सुन्दरी, कमलरहित सरोवर, सुन्दर आकृति वाला निरक्षर मुख, धन (बटोरने) में लगा स्वामी, निरन्तर दुर्गति को प्राप्त सज्जन, राजसभा में गया हुआ दुष्ट, मेरे मन में (ये) सात काँटे (निरन्तर खटकते हैं)।
व्याख्या- कवि को ये सात बातें काँटे के समान अत्यन्त कष्टकारी लगती हैं— दिन के तेज के कारण मलिन हुआ चन्द्रमा, ऐसी सुन्दर स्त्री जिसका यौवन अब आयु के बढ़ जाने से ढ़ल गया है अर्थात् कम हो गया है, ऐसा सरोवर जिसके कमल अब समाप्त हो गए हैं। ऐसा कंजूस स्वामी जो केवल धन-संग्रह में ही लगा हुआ है, अपने सेवकों का तथा अन्यों का उसे तनिक भी ध्यान नहीं है।
ऐसा सज्जन जो अपने गुणों के कारण ही दुर्जनों द्वारा अत्यन्त कष्टकारी स्थिति में पहुँचा दिया गया हो, ऐसा दुष्ट जो येनकेन प्रकारेण राजसभा में सम्मानजनक स्थान पर नियुक्त हो गया हो, क्योंकि उसके वहाँ जाने से अन्य लोग अनेक परेशानियों से घिर जाएँगे।
विशेष-
१. कांटा जिस प्रकार चुभने पर वेदना, कष्ट प्रदान करता है वैसे ही ये बातें देखकर असह्य मानसिक वेदना की कवि को अनुभूति होती है, यह अभिप्राय है।
२. पृथिवी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।
३. दीपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिवसे धूसरः (सप्तमी तत्पुरुष) दिवसधूसरः
२. शश + इनि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शशी
३. गलितं यौवनं यस्याः सा (बहुव्रीहि) गलितयौवना
४. √गल् + क्त = गलितः
५. युवन् + अण् = यौवन
६. काम + इनि + ङीप् = कामिनी