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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 194 में से

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पृष्ठ 96

७४ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

७. विगतानि वारिजानि यस्मात् तत् (बहुव्रीहि) विगतवारिजम्
८. न अक्षरम् अनक्षरम् (नञ् समास) अक्षरहिरतम् इति वा
९. धने परायणः (सप्तमी तत्पुरुष) धनपरायणः
१०. वारि + √जन् + ड = वारिजम्
११. दुष्टः गतिः दुर्गतिः, सततं दुर्गतिः यस्य सः (बहुव्रीहि) सततदुर्गतिः

न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजाम्।
होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः॥५६॥

अन्वय- चण्डकोपानाम् भूभुजाम् कश्चित् नाम आत्मीयः न (भवति), स्पृष्टः पावकः जुह्वानम् होतारम् अपि दहति।

अनुवाद- भयानक क्रोध वाले राजाओं का कोई भी अपना नहीं होता। स्पर्श किया गया अग्नि हवन करने वाले होता को भी जलाता है।

व्याख्या- जिन राजाओं का क्रोध अत्यन्त प्रचण्ड होता है, उनका कोई भी व्यक्ति आत्मीय अर्थात् निकटस्थ नहीं होता, क्योंकि उसे कब क्रोध आ जाएगा यह कुछ भी निश्चित नहीं होता तथा उसके क्रोधित होने पर व्यक्ति के प्राण भी जा सकते हैं। इसलिए कोई भी उसके निकट जाने तथा उसका हित सोचने का साहस नहीं कर पाता है।

इसी प्रसंग में अग्नि का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कवि कहता है कि क्रोधी राजा अग्नि के समान होते हैं, जो हवन करने वाले होता के हाथ को ही स्पर्श किए जाने पर जला देता है, हालाँकि वह होता उसी को हवि देकर प्रसन्न करता है।

विशेष- १. यहाँ क्रोधी राजा को अग्नि के समान बताया गया है।
२. प्रस्तुत श्लोक में 'अव्यवस्थितचित्तानां प्रसादोऽपि भयंकरः' इन भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है।
३. निदर्शना अलंकार का प्रयोग हुआ है, क्योंकि द्वितीय पंक्ति की उपमा के रूप परिकल्पना करनी पड़ती है—

अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमा परिकल्पकः निदर्शना।

४. अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. चण्डः कोपः यस्य सः, चण्डकोपः तेषाम् (बहुव्रीहि) चण्डकोपानाम्।
२. √कुप् + घञ् = कोपः
३. भुवं भुञ्जन्ति इति भूभुजः, तेषाम् – भूभुजाम्
४. भू + √भुज् + क्विप् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन)
५. आत्मन् + छ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = आत्मीय
६. √पू + ण्वुल् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = पावकः