नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ७५
७. √स्पृश् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. √हु + शानच् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) = जुह्वानम्
९. √हु + तृच् = होतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. √दह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) दहति
मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पको वा,
धृष्टः पार्श्वे वसति च सदा दूरतश्चाप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः,
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥५७॥
अन्वय- (सेवकः) मौनात् मूकः, प्रवचन-पटुः चाटुलः जल्पकः वा, सदा पार्श्वे वसति च धृष्टः, दूरतः च (वसति) अप्रगल्भः, क्षान्त्या भीरुः, यदि सहते न प्रायशः अभिजातः न (इति कथ्यते)। (अतः) सेवाधर्मः योगिनाम् अपि अगम्यः, परम गहनः भवति।
अनुवाद- (सेवक) चुप रहने से गूँगा, बोलने में निपुण होने पर, बहुत बोलने वाला या बकवादी और सदैव समीप रहने पर ढीठ, और दूर (रहने पर) न बोलने वाला क्षमाशील होने से डरपोक, यदि (अन्याय आदि को) सहन नहीं करता (तो) प्रायः सत्कुलोत्पन्न नहीं है (ऐसा कहा जाता है)। (अतः) सेवाधर्म योगियों के लिए भी अगम्य (और) अत्यन्त दुर्गम होता है।
व्याख्या- किसी की सेवा करने का काम अत्यन्त कठिन है तथा सबके वश की बात नहीं है। यहाँ तक कि यदि योगी भी इस कार्य में निपुणता प्राप्त करना चाहें तो उन्हें भी सफलता प्राप्त नहीं हो सकेगी, इसी का कारण बताते हुए कवि कहता है कि सेवक यदि अपने स्वामी के सामने उसका सम्मान करते हुए चुप रहता है तो स्वामी उसे मुँह में जबान नहीं है, ऐसा कहकर फटकार लगाता है और यदि वह अपनी योग्यता के कारण मालिक की बातों का बराबर जवाब देता है तो उसे बकवादी, फालतू बोलने वाला कहकर उसका तिरस्कार किया जाता है।
इसी प्रकार यदि सेवक सेवाभाव के कारण स्वामी के आसपास रहने का प्रयास करता है तो उसे ढीठ कहा जाता है और यदि वह दूर रहता है तो जरा भी अक्ल नहीं है, कहाँ रहना चाहिए, कहाँ नहीं, यह कहकर उसे दोषी करार दिया जाता है।
ठीक इसी प्रकार यदि सेवक स्वामी के किसी भी प्रकार से डांटने आदि पर भी उसे क्षमापूर्वक पलटकर जवाब नहीं देता तो डरपोक है, ऐसा कह दिया जाता है और यदि वह स्वामी आदि के द्वारा किए गए अन्याय अथवा दुर्व्यवहार को सहन न करता हुआ प्रतिकार करता है तो उसके लिए कहा जाता है कि यह सेवकों के श्रेष्ठकुल में उत्पन्न नहीं हुआ है। इसप्रकार सेवक के लिए सेवाकार्य करना अत्यन्त कठिन है।