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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् ७५

७. √स्पृश् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
८. √हु + शानच् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) = जुह्वानम्
९. √हु + तृच् = होतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
१०. √दह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) दहति

मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पको वा,
धृष्टः पार्श्वे वसति च सदा दूरतश्चाप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः,
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥५७॥

अन्वय- (सेवकः) मौनात् मूकः, प्रवचन-पटुः चाटुलः जल्पकः वा, सदा पार्श्वे वसति च धृष्टः, दूरतः च (वसति) अप्रगल्भः, क्षान्त्या भीरुः, यदि सहते न प्रायशः अभिजातः न (इति कथ्यते)। (अतः) सेवाधर्मः योगिनाम् अपि अगम्यः, परम गहनः भवति।

अनुवाद- (सेवक) चुप रहने से गूँगा, बोलने में निपुण होने पर, बहुत बोलने वाला या बकवादी और सदैव समीप रहने पर ढीठ, और दूर (रहने पर) न बोलने वाला क्षमाशील होने से डरपोक, यदि (अन्याय आदि को) सहन नहीं करता (तो) प्रायः सत्कुलोत्पन्न नहीं है (ऐसा कहा जाता है)। (अतः) सेवाधर्म योगियों के लिए भी अगम्य (और) अत्यन्त दुर्गम होता है।

व्याख्या- किसी की सेवा करने का काम अत्यन्त कठिन है तथा सबके वश की बात नहीं है। यहाँ तक कि यदि योगी भी इस कार्य में निपुणता प्राप्त करना चाहें तो उन्हें भी सफलता प्राप्त नहीं हो सकेगी, इसी का कारण बताते हुए कवि कहता है कि सेवक यदि अपने स्वामी के सामने उसका सम्मान करते हुए चुप रहता है तो स्वामी उसे मुँह में जबान नहीं है, ऐसा कहकर फटकार लगाता है और यदि वह अपनी योग्यता के कारण मालिक की बातों का बराबर जवाब देता है तो उसे बकवादी, फालतू बोलने वाला कहकर उसका तिरस्कार किया जाता है।

इसी प्रकार यदि सेवक सेवाभाव के कारण स्वामी के आसपास रहने का प्रयास करता है तो उसे ढीठ कहा जाता है और यदि वह दूर रहता है तो जरा भी अक्ल नहीं है, कहाँ रहना चाहिए, कहाँ नहीं, यह कहकर उसे दोषी करार दिया जाता है।

ठीक इसी प्रकार यदि सेवक स्वामी के किसी भी प्रकार से डांटने आदि पर भी उसे क्षमापूर्वक पलटकर जवाब नहीं देता तो डरपोक है, ऐसा कह दिया जाता है और यदि वह स्वामी आदि के द्वारा किए गए अन्याय अथवा दुर्व्यवहार को सहन न करता हुआ प्रतिकार करता है तो उसके लिए कहा जाता है कि यह सेवकों के श्रेष्ठकुल में उत्पन्न नहीं हुआ है। इसप्रकार सेवक के लिए सेवाकार्य करना अत्यन्त कठिन है।

७६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

विशेष- १. सेवाकार्य को अत्यन्त कठिन बताया गया है। २. वस्तुतः स्वामी का व्यवहार सेवक के लिए प्रायः इसी प्रकार का होता है। ३. मन्दाक्रान्ता छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— मन्दाक्रान्ता जलधिःषड् गैम्भौ नतौ ताद् गुरू चेत्। ४. 'वसति' पद यहाँ शतृ प्रत्ययान्त, सप्तमी विभक्ति के रूप में प्रयुक्त हुआ है, क्रिया पद, लट् लकार के रूप में नहीं। ५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. मुनेर्भावः मौनम्। मुनि + अण् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मौनात् २. प्रवचने पटुः, प्रवचन पटुः (सप्तमी तत्पुरुष) ३. √जल्प् + ण्वुल् = जल्पकः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. √वस् + शतृ = वसति (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) ५. √धृष् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = धृष्टः ६. न प्रगल्भः इति (नञ् समास) प्र + √गल्भ् + क्त = अप्रगल्भः ७. √क्षम् + क्तिन् = क्षान्त्या (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन). ८. अभि + √जन् + क्त = अभिजातः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ९. √गह् + ल्युट् = गहन १०. न गम्यः इति (नञ् समास) √गम् + ण्यत् = गम्यः ११. चाटुलः + जल्पकः + धा (:— उ— ओ, हशि च, आद् गुणः) १२. प्रायशः + न + अभिजातः (:— उ— ओ, हशि च, आद् गुणः) (दीर्घ— अकः सवर्णे दीर्घः) १३. भीरुः + यदि (ससजुषो रुः— :— र्) १४. दूरतः + अपि + अप्रगल्भः (अतो रोरप्लुतादप्लुतेः, इकोयणचि)

उद्भासिताखिलखलस्य विशृङ्खलस्य,
प्राग्जातविस्तृतनिजाधमकर्मवृत्तेः।
दैवादवाप्तविभवस्य गुणद्विषोऽस्य,
नीचस्य गोचरगतैः सुखमास्यते कैः॥५८॥

अन्वय- उद्भासिताखिलखलस्य विशृङ्खलस्य, प्राक्, जातविस्तृतनिजाधमकर्मवृत्तेः दैवात् अवाप्त-विभवस्य, गुणद्विषः अस्य नीचस्य गोचरगतैः कैः सुखम् आस्यते।
अनुवाद- (सदैव) सभी दुष्टों को प्रोत्साहित करने वाले, मर्यादाविहीन, पूर्वजन्म (के कर्मों) से बढ़े हुए अपने नीच कार्यों की प्रवृत्ति वाले, देवयोग से प्राप्त ऐश्वर्य से

नीतिशतकम् ७७

युक्त, गुणों से द्वेष करने वाले, इस नीच (पुरुष) की दृष्टि में पड़ने पर कौन (व्यक्ति) सुख से रह सकता है।

व्याख्या- इस संसार में व्यक्ति की सुख और शान्ति तभी तक विद्यमान है जब तक वह दुष्ट लोगों की नजरों में नहीं आता है। इन दुष्टों की विशेषताओं का कथन करते हुए कवि कहता है कि ये लोग सदा अपने जैसी प्रकृति वाले दुष्टों को ही सदा प्रश्रय देते हैं तथा प्रोत्साहित करते हैं। इनके लिए समाज द्वारा निर्धारित सभी मर्यादाओं का महत्त्व नहीं होता अर्थात् ये पूर्णतया उच्छृंखल होते हैं, उनकी रुचि सदा नीच कार्यों में रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानों अपने पूर्व जन्मों में इन्होंने कोई भी पुण्य कर्म नहीं किया है, इसी कारण इस जन्म में भी इनके विचार और कार्य पाप कर्मों में लिप्त हैं।

देवयोग अथवा संयोग से इनके पास धन-धान्य अर्थात् ऐश्वर्य भी पर्याप्त मात्रा में होता है। वस्तुतः इनका ऐश्वर्य कोई पुण्य कर्म का फल नहीं, अपितु मात्र एक संयोग ही होता है। इनका स्वभाव होता है कि ये सदा गुणवान् व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या करते हैं, उनसे प्रसन्न नहीं होते। यदि वास्तव में इन्हें सही शब्दों में कहना चाहें तो ये समाज के लिए कोढ़ होते हैं। भला ऐसे लोगों के दृष्टिपथ में आया हुआ व्यक्ति सुखी किस प्रकार रह सकता है अर्थात् कोई नहीं।

विशेष- १. यदि व्यक्ति इस संसार में सुखी रहना चाहता है तो उसे दुष्टों से जहाँ तक हो सके दूर रहने का प्रयास करना चाहिए।

२. दुर्जनों की सभी विशेषताओं का सुन्दर ढंग से अत्यन्त संक्षेप में उल्लेख किया गया हैं।

३. वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

४. प्रस्तुत श्लोक में, चतुर्थ चरण के अन्तिम पाद के कारण रूप में प्रारम्भिक पाद को प्रयुक्त किया गया है। अतः काव्यलिंग अलंकार, लक्षण इस प्रकार है—
हेतोर्वाक्यपदार्थत्वे काव्यलिङ्गमुदाहृतम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. उद्भासिताः अखिलाः खलाः येन सः, उद्भासिताखिलखलः तस्य (बहुव्रीहि)— उद्भासिताखिलखलस्य
२. विगता शृङ्खला यस्य सः, विशृङ्खलः (बहुव्रीहि) तस्य विशृङ्खलस्य
३. √जन् + क्त = जातः। वि + √स्तृ + क्त = विस्तृतः
४. √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः। अव + √आप् + क्त = अवाप्तः
५. अवाप्तः विभवः येन सः, अवाप्तविभवः (बहुव्रीहि)
६. गुण + √द्विष् + क्विप् (षष्ठी विभक्ति, एकवचन) गुणद्विषः

७८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

७. √आस् + णिच् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
८. वि + √भू + अच् = विभवः
९. गोचरं गतः, गोचरगतः तैः गोचरगतैः

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण,
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥५९॥

अन्वय- खल-सज्जनानाम् मैत्री दिनस्य पूर्वार्द्ध-परार्ध भिन्ना छाया इव आरम्भगुर्वी, क्रमेण क्षयिणी, पुरा लघ्वी, पश्चात् च वृद्धिमती (भवति)।

अनुवाद- दुष्ट और सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध में भिन्न (स्वरूप वाली) छाया के समान (दुष्टों की) आरम्भ में बड़ी, (किन्तु) क्रमशः छोटी होने वाली, (सज्जनों की) पहले छोटी और बाद में (क्रमशः) वृद्धि वाली (होती है)।

व्याख्या- दुष्टों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध की छाया के समान आरम्भ में बड़ी तथा क्रमशः छोटी होने वाली तथा सज्जनों की मित्रता दिन के उत्तरार्द्ध की छाया के समान पहले छोटी और बाद में क्रमशः बड़ी होने वाली होती है।

कहने का तात्पर्य है कि दुष्ट व्यक्ति किसी प्रयोजनवश मित्रता करता है और वह उसके निकट अत्यधिक उत्सुकता के साथ शीघ्रतापूर्वक जाता है, जिससे मित्रता करनी होती है, किन्तु जब उसका प्रयोजन हल हो जाता है तो वह मित्रता उतनी ही शीघ्रता से क्रमशः कम होती हुई, अन्त में समाप्त हो जाती है—जैसे प्रातःकालीन किसी भी वस्तु की छाया, यों तो आरम्भ में बड़ी होती है, किन्तु बाद में दोपहर होते होते छोटी होती हुई, अन्त में समाप्त हो जाती है।

किन्तु इसके ठीक विपरीत सज्जनों की मित्रता दोपहर के बाद की किसी वस्तु की छाया के समान आरम्भ में छोटी होती है, क्योंकि सज्जन व्यक्ति की मित्रता किसी स्वार्थ के कारण नहीं होती, अपितु निःस्वार्थ भाव से होती है। अतः उस वह अच्छी प्रकार परखने के बाद ही मित्रता करता है और यह मित्रता धीरे-धीरे दोपहर के बाद की छाया के समान बढ़ती चली जाती है।

विशेष- १. दुर्जन और सज्जन की मित्रता को अत्यन्त सुन्दर ढंग से उदाहरण द्वारा समझाया गया है।
२. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्व में दिया हुआ है।
३. यथासंख्या अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. खलानाम् सज्जनानाम् च (द्वन्द्व समास)

नीतिशतकम् ७९

२. आरम्भे गुर्वी (सप्तमी तत्पुरुष)
३. गुरु + ङीप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. √क्षि + अच् = क्षय, क्षय + इनि = क्षयिन् + ङीप् = क्षयिणी (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
५. लघु + ङीप्, लघ्वी (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. √वृध् + क्तिन् = वृद्धि, वृद्धि + मतुप् = वृद्धिमत् + ङीप् = वृद्धिमती
७. छाया + इव (गुण - आद् गुण: - आ + इ = ए)

मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम्।
लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति॥६०॥

अन्वय- जगति तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम्, मृगमीनसज्जनानाम् लुब्धकधीवरपिशुना, निष्कारणे एव वैरिणः (भवन्ति)।

अनुवाद- संसार में, तिनके, जल, सन्तोष से (ही) जीविका चलाने वाले, हिरण, मछली और सज्जनों के (क्रमशः) व्याध, मछुआरे, (और) चुगलखोर बिना कारण ही शत्रु (होते हैं)।

व्याख्या- इस संसार में हिरण, मछली और सज्जन ये तीनों क्रमशः घास, जल और सन्तोष मात्र से ही अपना जीवनयापन कर लेते हैं अर्थात् अपनी आजीविका के लिए किसी को कष्ट नहीं देते और न ही सताते हैं, किन्तु फिर भी इन तीनों के क्रमशः शिकारी, मछली पकड़ने वाले मछुआरे तथा चुगलखोर बिना किसी कारण के ही शत्रु होते हैं।

शिकारी मात्र घास के तिनकों पर जीवनयापन करने वाले हिरण को अपने स्वार्थ के लिए मार डालता है। इसी प्रकार मछली पकड़ने वाला जल मात्र से जीवित रहने वाली मछली को पकड़कर खा लेता है और इसी प्रकार सज्जन मात्र सन्तोष से ही अपना जीवनयापन करते हैं, किसी को कष्ट नहीं देते, किन्तु फिर भी चुगलखोर उनकी झूठी चुगली करके उन्हें हानि पहुँचाते रहते हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में मृगादि का तिनके आदि के साथ एक क्रम वर्णित किया गया है। अतः यथा- संख्य अलंकार है, लक्षण—

उद्दिष्टानां पदार्थानां पूर्वपश्चात् यथाक्रमम्।
अनुद्देशो भवेद्यत्र तद्यथासंख्यमुच्यते॥

२. दुष्ट प्रकृति के लोगों की शत्रुता के लिए कोई कारण नहीं होता, वे बिना किसी कारण ही शत्रुभाव रखते हैं।

३. आर्या छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है।

८० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सम् + √तुष् + घञ् = सन्तोषः २. वि + √धा + क्त = विहितः ३. √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः ४. √लुभ् + क्त = लुब्ध + कन् = लुब्धक ५. वैर + इनि = वैरिन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. तृणं च जलं च सन्तोषश्च = तृणजलसंतोषः , तैः विहिताः वृत्तयः येषां ते (बहुव्रीहि)
७. मृगश्च मीनश्च सज्जनश्च तेषां मृगमीनसज्जनानाम्।

सज्जनपद्धतिः

वाञ्छा सज्जनसङ्गमे¹ परगुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता,
विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद् भयम्।
भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले,
एते येषु वसन्ति² निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः॥६१॥

अन्वय- सज्जनसंगमे वाञ्छा, पर गुणे प्रीतिः, गुरौ नम्रता, विद्यायाम् व्यसनम्, स्वयोषिति रतिः, लोकापवादात् भयम्, शूलिनि भक्तिः, आत्मदमने शक्तिः, खले संसर्गमुक्तिः, येषु एते निर्मलगुणाः वसन्ति तेभ्यः नरेभ्यः नमः।

अनुवाद- सज्जनों की संगति की इच्छा, दूसरों के गुणों में प्रेम, बड़ों के प्रति नम्रता, विद्या में आसक्ति, अपनी पत्नी में प्रेम, लोक-निन्दा से भय, (भगवान्) शिव के प्रति भक्ति, आत्मसंयम में सामर्थ्य, दुर्जनों के संसर्ग का त्याग, जिनमें ये निर्मल गुण रहते हैं, उन लोगों को नमस्कार है।

व्याख्या- श्रेष्ठ लोगों के गुणों का कथन करते हुए कवि कहता है कि ये लोग सज्जनों की संगति की सदा इच्छा करते रहते हैं, क्योंकि सज्जनों के साथ रहने मात्र से व्यक्ति का उद्धार हो जाता है। इनकी विशेषता है कि ये दूसरों के गुणों के प्रति ईर्ष्याभाव नहीं रखते, अपितु उनकी प्रशंसा करते हुए प्रेम करते हैं, बड़ों अर्थात् अग्रजों के साथ नम्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं, इनकी रुचि विद्या अध्ययन में रहती हैं, क्योंकि विद्या से ही व्यक्ति को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है, एक पत्नी व्रत का पालन करते हुए, परस्त्री के साथ सम्पर्क को अनुचित मानते हैं, लोगों की निन्दा से डरते हैं अर्थात् ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे उन्हें निन्दा का पात्र होना पड़े, एकमात्र भगवान् शिव के प्रति उनकी एकनिष्ठ भक्ति रहती है तथा इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर ले जाने से


१. सज्जनसंगतौ।
२. येष्वेते निवसन्ति (जिनमें ये (गुण) निवास करते हैं।

नीतिशतकम् ८१

रोकते हैं, दुर्जन स्वभाव के लोगों के साथ नहीं रहते हैं। इस प्रकार के श्रेष्ठ लोगों अर्थात् महापुरुषों का मैं आदर करता हूँ और उन्हें नमन करता हूँ।

विशेष- १. महापुरुषों के गुणों का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। २. प्रस्तुत श्लोक के आधार पर भर्तृहरि के लिए कहा जा सकता है कि वे शिव के उपासक थे। ३. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ४. उदात्त अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सज्जनानां सङ्गमे सज्जनसङ्गमे २. सम् + √गम् + अप् = सङ्गमः, तस्मिन् सङ्गमे ३. √वाञ्छ् + अ + टाप् = वाञ्छा ४. परस्य गुणे परगुणे (षष्ठी तत्पुरुष) ५. √प्रीञ् (प्रीणने) + क्तिन् = प्रीतिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ६. वि + √अस् + ल्युट् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = व्यसनम् ७. √रम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = रतिः ८. अप + √वद् + घञ् = अपवादः ९. √भी + अच् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) = भयम् १०. शूल + इनि = शूलिन् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) शूलिनि ११. √भज् + क्तिन् = भक्तिः (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १२. आत्मनः दमने आत्मदमने (षष्ठी तत्पुरुष) १३. √शक् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १४. संसर्गस्य मुक्तिः = संसर्गमुक्तिः (षष्ठी तत्पुरुष) १५. लोक + अप + √वद् + घञ् = लोकापवादः तस्मात्— लोकापवादात् १६. √मुच् + क्तिन् = मुक्तिः

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ,
प्रकृति सिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥६२॥

अन्वय- विपदि धैर्यम्, अभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, अथ श्रुतौ व्यसनम्, इदम् हि महात्मनाम् प्रकृतिसिद्धम्।

८२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- आपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाणी की निपुणता, युद्ध में पराक्रम और यश में इच्छा तथा शास्त्रों में रुचि यह (सब) महात्माओं में स्वभाव से ही विराजमान रहता है।

व्याख्या- सज्जन एवं महापुरुषों में ये गुण स्वाभाविक रूप से ही रहते हैं, जैसे वे कितनी भी बड़ी से बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाए धैर्य का परित्याग नहीं करते, बड़े से बड़े पद को प्राप्त करने पर अथवा ऐश्वर्यसम्पन्न होने पर भी क्षमा का पालन करते हैं। सभा में अपनी वक्तृत्वकला के कारण शीघ्र ही अपना स्थान बना लेते हैं। युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हैं और सदा ही इस प्रकार के कार्य करते हैं। जिससे उनकी कीर्ति सारे संसार में फैलती है तथा सदा ही शास्त्रों का अध्ययन, चिन्तन एवं मनन करके अपने आचरण में उतारने का प्रयास करते हैं। ये सब गुण उनमें जन्मजात ही देखने को मिलते हैं।

विशेष- १. 'अथ' पद यहाँ 'समुच्चय' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
२. सज्जनों के गुणों का संक्षेप में उल्लेख किया गया है।
३. मनुष्य को बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।
४. ऐश्वर्य सम्पन्न होने पर भी क्षमा धारण करना, सज्जनता का प्रतीक है।
द्रुतविलम्बित छन्द-

द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. वि + √पत् + क्विप् (स्त्रीलिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विपदि
२. धीर + ष्यञ् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) धैर्यम्
३. अभि + उत् + √इण् (गतौ) + अच् (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) अभ्युदये
४. √क्षम् + अङ् + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमा
५. पटु + तल् + टाप् (पटुता)
६. वि + √अस् + ल्युट् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) व्यसनम्
७. प्रकृत्या सिद्धम् (तृतीया तत्पुरुष) प्रकृतिसिद्धम्
८. अथ + अभि + उदये (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः, यण् – इकोयणचि)
९. च + अभिरुचिः + व्यसनम् (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)

करे श्लाघ्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता,
मुखे सत्या वाणी विजयि भुजयोर्वीर्यमतुलम्।

नीतिशतकम् ८३

हृदि स्वस्था वृत्तिः श्रुत अधिगतैकव्रतफलं१, विनाप्यैश्वर्येण प्रकृति महतां मण्डनमिदम्।।६३।।

अन्वय- करे श्लाघ्यः त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता, मुखे सत्या वाणी, भुजयोः विजयि अतुलम् वीर्यम्, हृदि स्वस्था वृत्तिः, श्रुते अधिगत-एकव्रतफलम्, ऐश्वर्येण विना अपि प्रकृतिमहताम् इदम् मण्डनम्।

अनुवाद- हाथ में प्रशंसनीय दान, सिर पर बड़ों के चरणों में नमन, मुख में सत्यवाणी, भुजाओं में विजय प्रदान कराने वाला अनुपम पराक्रम, हृदय में स्वस्थ आचरण, कान में केवल ज्ञानप्राप्ति रूप व्रत का एकमात्र फल, ऐश्वर्य के बिना भी स्वभाव से महान् (लोगों का) यह (सब) आभूषण (ही है)।

व्याख्या- सज्जनों के पास भले ही ऐश्वर्य न हो, किन्तु प्रशंसनीय गुण जो उनके पास होते हैं, वस्तुतः आभूषणों के समान उनकी शोभा में वृद्धि करने वाले होते हैं जैसे- वे बहुत धनवान् न होने की स्थिति में भी अपने हाथों से धन का याचकों, जरूरतमन्दों को दान देते रहते हैं। वे सदा अपने से बड़ों के चरणों में प्रणाम निवेदन के साथ उनका सम्मान करते हैं, वे सदैव सत्यभाषण करते हैं, उनकी भुजाओं में इस प्रकार का पराक्रम होता है जो उन्हें सदैव युद्ध में विजय दिलाने वाला होता है, जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।

उनका हृदय स्वच्छ मनोवृत्ति वाला होता है अर्थात् उनके हृदय में दोहरी नीति नहीं होती, उनका व्यवहार भीतर बाहर दोनों ओर से एक जैसा होता है। उनके कानों में सदा ही शास्त्रों के श्रवण की लालसा रहती है। परनिन्दा आदि में उनके कान रुचि नहीं लेते हैं। इस प्रकार आचरण करने वाले सज्जन वस्तुतः महापुरुष हैं, प्रशंसनीय हैं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों के गुणों का परिगणन किया गया है। २. गुणों को ही यहाँ अलंकार कहा गया है। अतः उदात्त अलंकार । ३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है- रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ४. कवि ने अन्यत्र भी कहा है- श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन। दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।। ५. विना के योग में ऐश्वर्येण में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। ६. कुछ विद्वानों ने यहाँ श्रुत का अर्थ शास्त्र किया है जो उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सम्पूर्ण श्लोक में हाथ, सिर, मुँह, भुजा आदि अंगों का ही उल्लेख हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √श्लाघ् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) श्लाघ्यः


१. श्रुतमधिगते च श्रवणयोः (कानों में शास्त्राध्ययन का ज्ञान)

८४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

२. √त्यज् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) त्यागः
३. प्रणयिन् + तल् + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रणयिता
४. नास्ति तुला यस्य तत्, अतुलम् (बहुव्रीहि)
५. विजय + इनि (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विजयी
६. वीर + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वीर्यम् .
७. √श्रु + क्त (नपुं., सप्तमी विभक्ति, एकवचन) श्रुते
८. प्रकृत्या महान्तः इति प्रकृतिमहान्तः (तृतीया तत्पुरुष) तेषाम् प्रकृतिमहताम्
९. √मण्ड् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मण्डनम्
१०. ईश्वरस्य भावः ऐश्वर्यम्। ईश् + वरच् = ऐश्वर्येण (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
११. विना + अपि + ऐश्वर्येण (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) (यण् – इकोयणचि)
१२. श्लाघ्यः + त्यागः (विसर्ग – विसर्जनीयस्य सः)
१३. भुजयोः + वीर्यम् (विसर्ग – ससजुषो रुः)

प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं,
काले शक्त्या प्रदानं युवतिजनकथामूकभावः परेषाम्।
तृष्णास्रोतो विभङ्गो गुरुषु च विनयः सर्वभूतानुकम्पा,
सामान्यः सर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिः श्रेयसामेष पन्थाः॥६४॥

अन्वय- प्राणाघातात् निवृत्तिः, परधनहरणे संयमः, सत्यवाक्यम्, काले शक्त्या प्रदानम्, परेषाम् युवतिजनकथामूकभावः, तृष्णास्रोतः विभङ्गः, गुरुषु च विनयः, सर्वभूतानुकम्पा, सर्वशास्त्रेषु अनुपहतविधिः श्रेयषाम् एषः (एव) सामान्यः पन्थाः (अस्ति)।

अनुवाद- प्राणों के आघात से विमुखता, दूसरे का धन छीनने में स्वयं को रोकना, सत्य भाषण, समय पर शक्ति के अनुसार दान देना, दूसरों की स्त्रियों की बातों में मौनभाव, लोभ के प्रवाह का विनाश, बड़ों के प्रति विनम्रता, सभी प्राणियों पर दया, सभी शास्त्रों में (वर्णित) प्रशंसनीय सिद्धान्त वाला, कल्याणों का यही सामान्य मार्ग (है)।

व्याख्या- सभी शास्त्रों में चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय अथवा धर्म से सम्बन्धित क्यों न हों, कल्याणों की प्राप्ति के लिए एक ही मार्ग बताया है कि व्यक्ति को कभी भी अपने जीवन में किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए अर्थात् "अहिंसा परमो धर्मः" सिद्धान्त सर्वोत्कृष्ट है। दूसरे के धन पर कभी भी गिद्ध दृष्टि नहीं डालनी चाहिए, अपने परिश्रम द्वारा कमाया हुआ धन ही प्राप्त करने योग्य है। सदैव सत्य बोलना चाहिए जब भी आवश्यकता पड़े तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य देना चाहिए।

यदि कहीं पराई स्त्री की चर्चा हो रही हो तो उसमें कभी भी बढ़ चढ़कर हिस्सा

नीतिशतकम् ८५

नहीं लेना चाहिए, अपितु चुप ही रहना चाहिए। कभी भी लोभ नहीं करना चाहिए। जो भी आयु में अथवा विद्या में बढ़े हुए लोग हैं, उनके साथ सदा ही विनम्रता से व्यवहार करना चाहिए। इस संसार में जितने भी प्राणी हैं, चाहे वह छोटा हो या बड़ा सभी पर सदैव दयाभाव प्रदर्शित करना चाहिए।

उपरोक्त बातों का पालन करने से व्यक्ति को केवल कल्याणों की ही प्राप्ति होगी। यह सुनिश्चित है।

विशेष- १. धर्म कोई भी हो, ये बातें सर्वसम्मति से मान्य है। अतः ऐसा आचरण करने से मनुष्य निश्चय ही धरती पर स्वर्ग की परिकल्पना साकार करने में समर्थ है।

२. भाषा अत्यन्त सरल, भावबोधगम्य एवं प्रवाहपूर्ण प्रयुक्त हुई है।

३. मनुष्य का स्वभाव है कि वह प्रायः दूसरे के धन को येनकेन प्रकारेण हड़पना चाहता है, उसका पूर्णतया निषेध किया गया है।

४. सत्यं वद, धर्मं चर, मा हिंस्यात्, सर्वभूतानि, अनार्यः परदारव्यवहारः, आदि सिद्धान्तों की चर्चा सभी शास्त्रों में हुई है।

५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेन त्रिमुनियुतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. प्राणानाम् आघातः प्राणाघातः, तस्मात् (षष्ठी तत्पुरुष) आ + √हन् + णिच् + घञ् = आघातः २. नि + √वृत् + क्तिन् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) निवृत्तिः ३. प्र + √दा + ल्युट् = प्रदानम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. वि + √भञ्ज् + घञ् = विभङ्गः ५. वि + √नी + अक् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ६. न उपहतः विधिः यस्य सः, अनुपहतः (नञ् समास) ७. वि + √धा + कि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विधिः ८. समान + ष्यञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सामान्यः ९. √हृ + ल्युट् = हरणम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १०. प्रशस्य (श्र आदेश) + ईयसुन्, श्रेयसाम् ११. सर्वशास्त्रेषु + अनुपहतविधिः (यण्, इकोयणचि) १२. पन्थाः— पथिन् + सु (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १३. परधनस्य हरणे = परधनहरणे (षष्ठी तत्पुरुष) १४. युवतिजनानाम् कथासु, युवतिजनकथासु (षष्ठी तत्पुरुष) १५. सर्वेषु भूतेषु अनुकम्पा सर्वभूतानुकम्पा (सप्तमी तत्पुरुष)

८६

श्रीभर्तृहरिविरचितम्

सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम्।
आपत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशम्॥६५॥

अन्वय- महताम् चित्तम् सम्पत्सु उत्पलकोमलम्, आपत्सु च महाशैलशिला-संघातकर्कशम् भवति।

अनुवाद- महान् (पुरुषों) का मन सम्पत्तियों में कमल के समान कोमल और आपत्तियों में विशाल पर्वत की शिलाओं के संघात के समान कठोर होता है।

व्याख्या- महान् पुरुषों का चरित्र वस्तुतः आश्चर्यचकित कर देने वाला, अन्य लोगों से भिन्न होता है। जब इनके पास सम्पत्तियाँ आती हैं, ये ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं तो इनका मन अत्यन्त दयालु प्रकृति का हो जाता है, उस समय यह कमल के समान कोमल होता है, क्योंकि यदि इनके सामने कोई कष्ट में पड़ा हुआ व्यक्ति आता है तो ये दयार्द्र होकर तत्काल उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं।

इसके विपरीत जब ये आपत्तिग्रस्त होते हैं, उस समय इनका वही कमल के समान कोमल मन, विशाल पर्वत की कठोरतम शिला के समूह के समान आपत्तियों का सामना करने में समर्थ होता है अर्थात् वे आपत्तियों से घिर जाने पर जरा भी विचलित नहीं होते, अपितु पर्वत की मजबूत शिला के समान उनका डट कर मुकाबला करते हैं।

विशेष- १. महान् पुरुषों का चित्त आपत्ति और सम्पत्ति में क्रमशः कठोर और कोमलता का आचरण करता है।
२. प्रस्तुत श्लोक में मन की कोमलता की उपमा कमल से, कठोरता की उपमा कठोरतम शिला समूह से दी गई है। अतः उपमालंकार, लक्षण इस प्रकार है—

प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥

३. अनुष्टुप् छन्द, लक्षण पूर्ववत् है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. उत्पलम्, इव कोमलम् (अव्ययीभाव) उत्पलकोमलम्
२. महाशैलस्य शिलानाम् संघातः इव कर्कशम् (अव्ययीभाव) महाशिला-संघातकर्कशम्
३. भवति + उत्पलकोमलम् (यण् - इकोयणचि - इ- य्)
४. सम् + √हन् + घञ् = संघातः


प्रिया न्याय्या वृत्तिर्मलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरं,
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्य कृशधनः।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां,
सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम्॥६६॥

नीतिशतकम् ८७

अन्वय- प्रिया न्याय्या वृत्तिः, असुभंगे अपि मलिनम् असुकरम्, असन्तः न अभ्यर्थ्याः, कृशधनः सुहृद् अपि न याच्यः, विपदि उच्चैः स्थेयम्, महताम् पदम् अनुविधेयम्, असिधारा इदम् विषमम् व्रतम् सताम् केन उद्दिष्टम्।

अनुवाद- प्रिय और न्यायपूर्ण व्यवहार, प्राणों के नष्ट होने पर भी बुरा (कार्य) सरलता से न करना, दुष्टों से न मांगना, निर्धन मित्र से भी याचना न करना, आपत्ति में (अपने मनोबल को) ऊँचा बनाए रखना, महान् लोगों के पद (चिह्नों) का अनुसरण करना, तलवार की धार पर चलने के समान इस कठोर व्रत का सज्जनों को किसने उपदेश दिया।

व्याख्या- समाज सज्जनों से अनेक व्यवहार-विषयक अपेक्षा करता है, इसी आधार पर वे सज्जन कहलाते हैं, उनका कथन करते हुए कवि कहता है— व्यवहार न्यायसंगत भी हो और अच्छा भी लगे यह बहुत कम देखने में आता है, किन्तु सज्जनों को ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। भले ही प्राण ही संकट में क्यों न पड़ जाएँ, किन्तु सज्जनों को कोई भी मर्यादा के विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए। वह दुष्ट व्यक्ति से कभी भी कुछ न मांगे चाहे कितनी भी कठिनाई में क्यों न पड़ जाए।

साथ ही ऐसे मित्र से नहीं माँगे जो देने की स्थिति में नहीं हों, क्योंकि उस स्थिति में वह मित्र अत्यन्त हीनता का अनुभव करेगा और अपराध बोध से ग्रस्त होगा, इसके अतिरिक्त कठिन से कठिन स्थिति में पड़ने पर भी अपने धैर्य और मनोबल को न गिराये। ये सभी बातें सहज नहीं हैं अर्थात् तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन है, किन्तु फिर भी हम सभी सज्जनों से इसी प्रकार के आचरण की अपेक्षा करते हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है और सज्जन भी स्वतः ही बिना किसी की प्रेरणा के इस प्रकार का व्यवहार करते हैं। यह उससे भी अधिक आश्चर्य का विषय है।

विशेष- १: सज्जनों के लिए निश्चित मानदण्डों के आधार पर व्यवहार करना वस्तुतः तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन है।

२. 'न्याय्यः मनोहारि च दुर्लभं वचः' की भावनाओं का पोषण प्रस्तुत श्लोक में हुआ है। यदि कोई व्यक्ति न्यायपूर्ण आचरण करे तो आवश्यक नहीं कि वह प्रिय भी हो, सभी को अच्छा लगे, किन्तु लोग सज्जनों से यहीं अपेक्षा करते हैं।

३. प्रायः व्यक्ति अपने प्राणों को बचाने के लिए अनेकशः बुरे से बुरा कार्य करने को सहज ही तैयार हो जाता है, किन्तु सज्जनों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है।

४. वास्तव में प्रस्तुत श्लोक में गिनाए गए व्यवहार सामान्य व्यक्ति के लिए अत्यन्त कठिन ही नहीं, अपितु असंम्भव हैं, किन्तु हमारे समाज ने सज्जनों के लिए इन्हें निर्धारित किया हुआ है।

५. महाकवि कालिदास का भी विचार है कि—

याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा।

६. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है। लक्षण इस प्रकार है—

८८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. न्याय + यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) न्याय्या २. √वृत् + क्तिन् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः ३. असूनाम् भङ्गे (षष्ठी तत्पुरुष) असुभङ्गे ४. न सुकरम् इति (नञ् समास) असुकरम् ५. न सन्तः इति (नञ् समास) असन्तः ६. अभि + अर्थ + यत् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) अभ्यर्थ्याः ७. कृशम् धनम् यस्य सः (बहुव्रीहि) कृशधनः ८. √स्था + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) स्थेयम् ९. अनु + वि + √धा + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अनुविधेयम् १०. असिधारा इव कठिनव्रतम् (कर्मधारय) असिधाराव्रतम् ११. उत् + √दिश् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उद्दिष्टम् १२. विपदि + उच्चैः = विपद्युच्चैः (यण्, इकोयणचि) १३. केन + उद्दिष्टम् = केनोद्दिष्टम् (गुण, आद् गुणः)

प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृतेः। अनुत्सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसाराः परकथाः, सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम्॥६७॥

अन्वय- प्रच्छन्नम् प्रदानम्, गृहम् उपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियम् कृत्वा मौनम्, सदसि च उपकृतेः कथनम्, लक्ष्म्याम् अपि अनुत्सेकः, निरभिभवसाराः परकथाः, असिधाराविषमम् इदम् व्रतम् सताम् केन उद्दिष्टम्।

अनुवाद- अत्यन्त गुप्त पर्याप्त दान करना, घर पर आए हुए (व्यक्ति) का आदर करना, प्रिय करके चुप रहना और सभा में उपकार करने वाले का कथन करना, धन-सम्पत्ति होने पर भी घमण्ड न करना, दूसरों की निन्दारहित चर्चा करना, तलवार की धार पर चलने के समान यह कठोर व्रत सज्जनों को किसने बताया है।

व्याख्या- सज्जनों का आचरण किस प्रकार का होता है, इसका कथन करते हुए कवि कहता है कि उनका आचरण वस्तुतः तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन सामान्यजन के लिए अत्यन्त दुर्गम होता है, क्योंकि सज्जन को सदैव अत्यधिक मात्रा में दान देना चाहिए, किन्तु साथ ही वह दान यश-प्राप्ति के लिए न हो, अपितु गुप्त दान हो, ऐसी समाज की उससे अपेक्षा रहती है, जो वस्तुतः अत्यन्त कठिन कार्य है।

नीतिशतकम् ८९

इसी प्रकार सज्जन को घर पर आए व्यक्ति का भले ही वह अपरिचित ही क्यों न हो, सम्मान करना चाहिए, क्योंकि अतिथि देवता के समान होता है, उसकी पूजा सम्मान किया जाना आवश्यक है, भले ही स्वयं की आर्थिक स्थिति ठीक हो अथवा न हो।

इसके अतिरिक्त वह दूसरों का उपकार तो करे, पर चुप रहे, उसका कथन कहीं भी न करे, दूसरे शब्दों में ‘नेकी कर कुँए में डाल’ को अपने जीवन का आदर्श बनाए। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति ने उसके प्रति कोई उपकार किया है तो उसको सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कृतज्ञ, भाव से स्वीकार करे। भले ही अपने पास प्रभूत ऐश्वर्य क्यों न आ जाए, कितनी ही धन-सम्पत्ति के मालिक क्यों न हो जाए, किन्तु अहंकार को कभी भी अपने पास तक न फटकने देवे।

इसके अतिरिक्त प्रथम तो दूसरों की पीठ पीछे चर्चा ही न करे और यदि करनी भी पड़े तो वह निन्दापरक न हो, प्रशंसापरक होनी चाहिए। वस्तुतः ये सब गुण सज्जन के कहे गये हैं, किन्तु इस सब पर आचरण करना, पालन करना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन ही है।

विशेष— १. सज्जनों के असाधारण व्यवहार की ओर अत्यन्त सुन्दर ढंग से संकेत किया गया है। २. सज्जनों के मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन बताया गया है। ३. गुप्तदान सर्वाधिक प्रशंसनीय माना गया है, क्योंकि उसमें व्यक्ति की यश की कामना नहीं रहती। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. प्रकृष्टं दानम्, प्रदानम् (अव्ययीभाव)
२. प्र + √छद् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रच्छन्नम्
३. √दा + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दानम्
४. उप + √गम् + क्त = उपगतम् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) उपगते
५. सम्भ्रमस्य विधिः (षष्ठी तत्पुरुष) सम्भ्रमविधिः
६. सम् + √भ्रम् + घञ् = सम्भ्रमः। अभि + √भू + अप् = अभिभवः
७. वि + √धा + कि = विधिः। √सृ + घञ् = सारः
८. उप + √कृ + क्तिन् = उपकृतेः (स्त्रीलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
९. √कथ् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कथनम्
१०. न उत्सेकः अनुत्सेकः (नञ् समास)

९० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

११. उत् + √सिच् + घञ् = उत्सेकः। परेषां कथाः (षष्ठी तत्पुरुष) परकथाः १२. उत् + √दिश् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उद्दिष्टम् १३. असिधारा इव कठिनम् व्रतम् (कर्मधारय) असिधाराव्रतम् १४. निरभिभवः सारः यासां ताः, निरभिभवसाराः (बहुव्रीहि)

संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते$^१$,
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते।$^२$
स्वात्यां$^३$ सागरसूक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते,
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणाः संसर्गतो देहिनाम्$^४$॥६८॥

अन्वय- सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसः नाम अपि न ज्ञायते, तत् एव नलिनीपत्रस्थिम् मुक्ताकारतया राजते, तत् (एव) स्वात्याम् सागरसूक्तिमध्यपतितम् मौक्तिकम् जायते, प्रायेण देहिनाम् संसर्गतः अधममध्यमोत्तमगुणाः (जायन्ते)।

अनुवाद- अत्यधिक तपे हुए लोहे पर रखे हुए जल का नाम भी नहीं जाना जाता है, वही कमलिनी के पत्ते पर स्थित हुआ मोती के आकार में सुशोभित होता है, वही स्वाति (नक्षत्र) में समुद्र में स्थित सीप के बीच गिरा हुआ मोती हो जाता है, प्रायः देहधारियों में संसर्ग से (ही) अधम, मध्यम और उत्तम गुण (उत्पन्न होते हैं)।

व्याख्या- व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है अर्थात् उसमें उसी तरह के गुण आ जाते हैं, इसी बात को जल की बूँद का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि जल की एक बूँद को यदि अत्यन्त गर्म लोहे पर डाला जाए तो वह एक क्षण में ही छन की ध्वनि के साथ गायब हो जाती है, उसका नामोनिशान भी नहीं रहता है।

इसके विपरीत यदि उसी जल की बूँद को कमलिनी के पत्ते पर रखा जाए तो वही मोती के समान शोभा वाली हो जाती है तथा वही जल की बूँद यदि स्वाति नक्षत्र में समुद्र में स्थित सीप के सम्पर्क में आती है, तो मोती ही बन जाती है।

इस प्रकार एक ही बूँद जब गर्म लोहे रूपी अधम व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो पूर्णतया अस्तित्वविहीन हो गई। पुनः कमलिनी के पत्ते रूपी मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो मोती के समान दिखाई देने वाली हुई और वही जब उत्तम कोटि के व्यक्ति रूपी सीपी के सान्निध्य में आयी तो मोती ही बन गई।

इसी प्रकार व्यक्ति भी जब अधम, मध्यम और उत्तम गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के निकट आता है तो उसी प्रकार के गुणों से युक्त हो जाता है।


१. श्रूयते
२. दृश्यते
३. अन्तः
४. एवं विधा वृत्तयः

नीतिशतकम् ९१

विशेष- १. अन्यत्र भी कहा गया है- संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति। २. कहते हैं स्वाति नक्षत्र में यदि सागर में स्थित सीपी में जल की बूँद गिर जाए तो मोती बन जाती है। ३. संगति से होने वाले प्रभावों को अत्यन्त सुन्दर उदाहरण देकर प्रदर्शित किया गया है। ४. यहाँ तपा हुआ लोहा दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति का प्रतीक है। जिसके संसर्ग में आने पर व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। ५. मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ लोगों के सम्पर्क में आने का ही प्रयत्न करना चाहिए। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजा स्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥ ७. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तप्तम् अयः सन्तप्तायः, तस्मिन् (कर्मधारय) संतप्तायसि २. सम् + √स्था + क्त (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, नपुं.) संस्थितस्य ३. नलिन्याः पत्रम् (षष्ठी तत्पुरुष) नलिनीपत्रम्, तस्मिन् स्थितम् नलिनीपत्रस्थितम् ४. मुक्तायाः इव आकारः यस्य सः (बहुव्रीहि) मुक्ताकारः तस्य भावः मुक्ताकारता, तया मुक्ताकारतया ५. √राज् (दीप्तौ) + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) राजते ६. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते ७. संसर्ग + तसिल् = संसर्गतः ८. देह + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) देहिनाम् ९. अधमश्च मध्यमश्च उत्तमश्च (द्वन्द्व समास) अधममध्यमोत्तमाः १०. मुक्ता + कन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मौक्तिकम्

यः प्रीणये¹ त्सुचरितैः पितरं स पुत्रो,
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥६९॥

अन्वय- यः सुचरितैः पितरम् प्रीणयेत्, सः पुत्रः, यत् (सदा) भर्तुः एव हितम् वाञ्छति, तत् कलत्रम्, यत् आपदि सुखे च समक्रियम् तत् मित्रम्, जगति एतत् त्रयम् पुण्यकृतः (एव) लभन्ते।


१. पाठभेद— प्रीणाति यः (जो प्रसन्न करे)

९२श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- जो श्रेष्ठ आचरणों के द्वारा पिता को प्रसन्न करे, वह पुत्र, जो (सदैव) पति का ही हित चाहती हो, वह स्त्री, जो आपत्ति में और सुख में समान व्यवहार वाला हो, वह मित्र, संसार में ये तीनों पुण्यशाली ही प्राप्त करते हैं।

व्याख्या- वे लोग अत्यन्त पुण्यात्मा हैं, जिन्हें ऐसे पुत्र की प्राप्ति हो जो अच्छे आचरण द्वारा अपने माता-पिता को प्रसन्न करे। ठीक इसी प्रकार ऐसी पत्नी की प्राप्ति भी पुण्यों के ही प्रताप से सम्भव हैं जो केवल अपने पति के प्रति ही अनुरक्त हो तथा उसके ही हित का सदैव चिंतन करती हो और ऐसा मित्र भी व्यक्ति को अत्यधिक पुण्यों से ही मिलता है जो कठिन परिस्थिति में भी अर्थात् आपत्ति एवं सुख की स्थिति दोनों में समान व्यवहार करने वाला हो। सामान्यतः होता यह है कि मित्र सुख में साथ रहते हैं और आपत्ति के समय साथ छोड़ देते हैं।

विशेष- १. उत्तम पुत्र, पतिव्रता पत्नी एवं हितकारी मित्र ये तीनों पूर्व जन्म में किए गए परम पुण्यों से ही मिलते हैं।
२. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. अन्यत्र भी कवि ने कहा है कि जो आपत्ति में साथ दे वही सच्चा मित्र है—

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले।
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥

४. वसन्ततिलका छन्द है, लक्षण—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √प्रीञ् (प्रीणने) + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रीणयेत्
२. √भृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) भर्तुः
३. समानाः क्रियाः यस्य तत् समक्रियम् (बहुव्रीहि)
४. शोभनानि चरितानि सुचरितानि, तैः सुचरितैः


नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः,
स्वार्थान् सम्पादयन्तो वितत पृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे।
क्षान्त्यैवाक्षेपपरूक्षाक्षरमुखरमुखां दुर्मुखान् दूषयन्तः,
सन्तः साश्चर्यचर्या जगति बहुमताः कस्य नाभ्यर्थनीयाः॥७०॥

अन्वय- नम्रत्वेन उन्नमन्तः, परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः, परार्थे विततपृथुतरारम्भयत्नाः स्वार्थान् सम्पादयन्तः, आक्षेप-रूक्षाक्षरमुखरमुखान् दुर्मुखान् क्षान्त्या एव दूषयन्तः, साश्चर्यचर्याः बहुमताः सन्तः जगति कस्य अभ्यर्थनीयाः न।

अनुवाद- नम्रता से ऊपर उठते हुए, दूसरों के गुणों को कहने के द्वारा अपने गुणों को प्रकट करते हुए, दूसरों के लिए विस्तृत और विशाल प्रारम्भ से युक्त यत्नों द्वारा

नीतिशतकम् ९३

अपने अभिप्रायों का सम्पादनं करते हुए, क्षमा से ही निन्दा के कारण रूखे अक्षरों से वाचाल मुख वाले दुर्जनों को दूषित करते हुए, आश्चर्ययुक्त आचरण वाले, अनेकों द्वारा सम्मानित सज्जन (लोग) संसार में किसके लिए पूजनीय नहीं है ?

व्याख्या- सज्जन विनम्रतापूर्वक व्यवहार के द्वारा जीवन में उन्नति करते हुए प्रशंसा के पात्र होते हैं, वे सदैव दूसरों के गुणों का कथन करके परप्रशंसा रूप अपने गुणों को प्रकट करते हैं। उनके जितने भी कार्य होते हैं, वे सब प्रायः परोपकार के लिए ही मुख्य रूप से होते हैं, उन्हीं को प्रमुखता प्रदान करते हुए गौण रूप में अपने प्रयोजनों को भी सिद्ध कर लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इनकी जो भी दिनचर्या होती है, वह प्रमुख रूप से दूसरों की भलाई के लिए होती है, किन्तु उन्हें करते हुए यदि उनका अपना भी कोई कार्य सम्पादन हो रहा हो तो वे कर लेते हैं। स्वार्थ के लिए ही उनकी क्रियाएँ प्रारम्भ नहीं होतीं।

जब दुर्जन उनके ऊपर अनेक प्रकार से दोषारोपण करते हैं, ऐसे रूखे अक्षरों से मुखरित उनके मुखों को ये सज्जन एकमात्र क्षमा रूपी हथियार से बन्द कर देते हैं अर्थात् उन्हें क्षमारूपी अस्त्र के द्वारा निष्प्रभ कर देते हैं। इस प्रकार के आश्चर्यचकित कर देने वाले व्यवहार वाले परमादरणीय सज्जनों की कौन पूजा नहीं करता अर्थात् इस प्रकार के गुणों के युक्त सज्जन सभी के द्वारा समादरणीय होते हैं।

विशेष- १. सज्जनों के गुणों का उल्लेख करते हुए, उनके व्यवहार को आश्चर्यजनक बताया है।

२. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
म्रभ्रैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

३. उदात्त और समुच्चय अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. उत् + √नम् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उन्नमन्तः
२. परेषां गुणानां कथनम् – परगुणकथनम् तैः , परगुणकथनैः
३. वि + √तन् + क्त = वितत। आ + √रभ् + घञ् = आरम्भः
४. पृथु + तरप् = पृथुतर
५. √क्षम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) क्षान्त्या
६. आक्षेपेण रूक्षाक्षरैः मुखराणि मुखानि येषां तान्, आक्षेपरूक्षाक्षरमुखान्
७. दुष्टानि मुखानि येषाम् ते दुर्मुखाः, तान् दुर्मुखान् (बहुव्रीहि)
८. √चर् + यत् + टाप् = चर्या
९. अभि + √अर्च + अनीयर् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) अभ्यर्चनीयाः
१०. नम्रत्वेन + उन्नमन्तः (गुण, आद् गुणः) (अ + उ = ओ)
११. स्व + अर्थान् (अ + अ = आ)

९४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१२. पर + अर्थे (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) (अ + अ = आ) ११३. न + अभ्यर्चनीयाः (अ + अ = आ) १४. √ख्या + णिच् + शतृ (पुक् आगम) = ख्यापयन्तः १५. सम् + √पद् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्पादयन्तः

अप्रियवचनदरिद्रैः प्रियवचनाढ्यैः स्वदारपरितुष्टैः,
परपरिवादनिवृत्तैः क्वचित्क्वचिन्मण्डिता वसुधा॥७१॥

अन्वय- अप्रियवचनदरिद्रैः, प्रियवचनाढ्यैः, स्वदारपरितुष्टैः परपरिवादनिवृत्तैः (मानवैः) वसुधा क्वचित् क्वचित् मण्डिता।

अनुवाद- प्रिय न लगने वाले वचनों से दरिद्र, प्रिय वचनों से धनवान्, अपनी पत्नी से (पूर्णतया) संतुष्ट, दूसरों की निन्दा से विमुख (लोगों से) पृथिवी कहीं-कहीं पर ही सुशोभित होती है।

व्याख्या- इस संसार में इस प्रकार के लोग अँगुलिगण्य ही है जो इस प्रकार की वाणी बोलते हैं जो दूसरों को कटु न लगे। ठीक इसी प्रकार प्रिय वाणी बोलने वाले भी इस संसार में बहुत कम हैं।

इसी प्रकार संसार में ऐसे लोगों की संख्या भी अत्यल्प ही है जो एकमात्र अपनी पत्नी से ही संतुष्ट रहते हैं, साथ ही ऐसे लोग भी इस संसार में अधिक नहीं है जो दूसरों की निन्दा में आनन्द का अनुभव नहीं करते हैं और यदि अत्यल्प हैं भी, तो वे लोग वस्तुतः पृथिवी के अलंकार स्वरूप ही हैं।

विशेष- १. सामान्यतया लोग कठोर वाणी का प्रयोग करने वाले, दूसरों की स्त्रियों पर कुदृष्टि रखने वाले तथा दूसरों की निन्दा में रुचि रखने वाले होते हैं।
२. मानव स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

४. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. न प्रियः इति अप्रियः (नञ् समास) अप्रियैः वचनैः दरिद्राः अप्रियवचनदरिद्राः तैः, अप्रियवचनदरिद्रैः
२. परि + √तुष् + क्त = परितुष्टः, तैः परितुष्टैः
३. परि + √वद् + घञ् = परिवादः
४. नि + √वृत् + क्त = निवृत्तः, तैः निवृत्तैः