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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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९२श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- जो श्रेष्ठ आचरणों के द्वारा पिता को प्रसन्न करे, वह पुत्र, जो (सदैव) पति का ही हित चाहती हो, वह स्त्री, जो आपत्ति में और सुख में समान व्यवहार वाला हो, वह मित्र, संसार में ये तीनों पुण्यशाली ही प्राप्त करते हैं।

व्याख्या- वे लोग अत्यन्त पुण्यात्मा हैं, जिन्हें ऐसे पुत्र की प्राप्ति हो जो अच्छे आचरण द्वारा अपने माता-पिता को प्रसन्न करे। ठीक इसी प्रकार ऐसी पत्नी की प्राप्ति भी पुण्यों के ही प्रताप से सम्भव हैं जो केवल अपने पति के प्रति ही अनुरक्त हो तथा उसके ही हित का सदैव चिंतन करती हो और ऐसा मित्र भी व्यक्ति को अत्यधिक पुण्यों से ही मिलता है जो कठिन परिस्थिति में भी अर्थात् आपत्ति एवं सुख की स्थिति दोनों में समान व्यवहार करने वाला हो। सामान्यतः होता यह है कि मित्र सुख में साथ रहते हैं और आपत्ति के समय साथ छोड़ देते हैं।

विशेष- १. उत्तम पुत्र, पतिव्रता पत्नी एवं हितकारी मित्र ये तीनों पूर्व जन्म में किए गए परम पुण्यों से ही मिलते हैं।
२. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. अन्यत्र भी कवि ने कहा है कि जो आपत्ति में साथ दे वही सच्चा मित्र है—

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले।
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥

४. वसन्ततिलका छन्द है, लक्षण—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √प्रीञ् (प्रीणने) + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रीणयेत्
२. √भृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) भर्तुः
३. समानाः क्रियाः यस्य तत् समक्रियम् (बहुव्रीहि)
४. शोभनानि चरितानि सुचरितानि, तैः सुचरितैः


नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः,
स्वार्थान् सम्पादयन्तो वितत पृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे।
क्षान्त्यैवाक्षेपपरूक्षाक्षरमुखरमुखां दुर्मुखान् दूषयन्तः,
सन्तः साश्चर्यचर्या जगति बहुमताः कस्य नाभ्यर्थनीयाः॥७०॥

अन्वय- नम्रत्वेन उन्नमन्तः, परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः, परार्थे विततपृथुतरारम्भयत्नाः स्वार्थान् सम्पादयन्तः, आक्षेप-रूक्षाक्षरमुखरमुखान् दुर्मुखान् क्षान्त्या एव दूषयन्तः, साश्चर्यचर्याः बहुमताः सन्तः जगति कस्य अभ्यर्थनीयाः न।

अनुवाद- नम्रता से ऊपर उठते हुए, दूसरों के गुणों को कहने के द्वारा अपने गुणों को प्रकट करते हुए, दूसरों के लिए विस्तृत और विशाल प्रारम्भ से युक्त यत्नों द्वारा