भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 194 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

नीतिशतकम् ९१

विशेष- १. अन्यत्र भी कहा गया है- संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति। २. कहते हैं स्वाति नक्षत्र में यदि सागर में स्थित सीपी में जल की बूँद गिर जाए तो मोती बन जाती है। ३. संगति से होने वाले प्रभावों को अत्यन्त सुन्दर उदाहरण देकर प्रदर्शित किया गया है। ४. यहाँ तपा हुआ लोहा दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति का प्रतीक है। जिसके संसर्ग में आने पर व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। ५. मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ लोगों के सम्पर्क में आने का ही प्रयत्न करना चाहिए। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजा स्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥ ७. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तप्तम् अयः सन्तप्तायः, तस्मिन् (कर्मधारय) संतप्तायसि २. सम् + √स्था + क्त (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, नपुं.) संस्थितस्य ३. नलिन्याः पत्रम् (षष्ठी तत्पुरुष) नलिनीपत्रम्, तस्मिन् स्थितम् नलिनीपत्रस्थितम् ४. मुक्तायाः इव आकारः यस्य सः (बहुव्रीहि) मुक्ताकारः तस्य भावः मुक्ताकारता, तया मुक्ताकारतया ५. √राज् (दीप्तौ) + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) राजते ६. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते ७. संसर्ग + तसिल् = संसर्गतः ८. देह + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) देहिनाम् ९. अधमश्च मध्यमश्च उत्तमश्च (द्वन्द्व समास) अधममध्यमोत्तमाः १०. मुक्ता + कन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मौक्तिकम्

यः प्रीणये¹ त्सुचरितैः पितरं स पुत्रो,
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥६९॥

अन्वय- यः सुचरितैः पितरम् प्रीणयेत्, सः पुत्रः, यत् (सदा) भर्तुः एव हितम् वाञ्छति, तत् कलत्रम्, यत् आपदि सुखे च समक्रियम् तत् मित्रम्, जगति एतत् त्रयम् पुण्यकृतः (एव) लभन्ते।


१. पाठभेद— प्रीणाति यः (जो प्रसन्न करे)