नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें९० श्रीभर्तृहरिविरचितम्
११. उत् + √सिच् + घञ् = उत्सेकः। परेषां कथाः (षष्ठी तत्पुरुष) परकथाः १२. उत् + √दिश् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उद्दिष्टम् १३. असिधारा इव कठिनम् व्रतम् (कर्मधारय) असिधाराव्रतम् १४. निरभिभवः सारः यासां ताः, निरभिभवसाराः (बहुव्रीहि)
संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते$^१$,
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते।$^२$
स्वात्यां$^३$ सागरसूक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते,
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणाः संसर्गतो देहिनाम्$^४$॥६८॥
अन्वय- सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसः नाम अपि न ज्ञायते, तत् एव नलिनीपत्रस्थिम् मुक्ताकारतया राजते, तत् (एव) स्वात्याम् सागरसूक्तिमध्यपतितम् मौक्तिकम् जायते, प्रायेण देहिनाम् संसर्गतः अधममध्यमोत्तमगुणाः (जायन्ते)।
अनुवाद- अत्यधिक तपे हुए लोहे पर रखे हुए जल का नाम भी नहीं जाना जाता है, वही कमलिनी के पत्ते पर स्थित हुआ मोती के आकार में सुशोभित होता है, वही स्वाति (नक्षत्र) में समुद्र में स्थित सीप के बीच गिरा हुआ मोती हो जाता है, प्रायः देहधारियों में संसर्ग से (ही) अधम, मध्यम और उत्तम गुण (उत्पन्न होते हैं)।
व्याख्या- व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है अर्थात् उसमें उसी तरह के गुण आ जाते हैं, इसी बात को जल की बूँद का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि जल की एक बूँद को यदि अत्यन्त गर्म लोहे पर डाला जाए तो वह एक क्षण में ही छन की ध्वनि के साथ गायब हो जाती है, उसका नामोनिशान भी नहीं रहता है।
इसके विपरीत यदि उसी जल की बूँद को कमलिनी के पत्ते पर रखा जाए तो वही मोती के समान शोभा वाली हो जाती है तथा वही जल की बूँद यदि स्वाति नक्षत्र में समुद्र में स्थित सीप के सम्पर्क में आती है, तो मोती ही बन जाती है।
इस प्रकार एक ही बूँद जब गर्म लोहे रूपी अधम व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो पूर्णतया अस्तित्वविहीन हो गई। पुनः कमलिनी के पत्ते रूपी मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो मोती के समान दिखाई देने वाली हुई और वही जब उत्तम कोटि के व्यक्ति रूपी सीपी के सान्निध्य में आयी तो मोती ही बन गई।
इसी प्रकार व्यक्ति भी जब अधम, मध्यम और उत्तम गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के निकट आता है तो उसी प्रकार के गुणों से युक्त हो जाता है।
१. श्रूयते
२. दृश्यते
३. अन्तः
४. एवं विधा वृत्तयः