नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ८९
इसी प्रकार सज्जन को घर पर आए व्यक्ति का भले ही वह अपरिचित ही क्यों न हो, सम्मान करना चाहिए, क्योंकि अतिथि देवता के समान होता है, उसकी पूजा सम्मान किया जाना आवश्यक है, भले ही स्वयं की आर्थिक स्थिति ठीक हो अथवा न हो।
इसके अतिरिक्त वह दूसरों का उपकार तो करे, पर चुप रहे, उसका कथन कहीं भी न करे, दूसरे शब्दों में ‘नेकी कर कुँए में डाल’ को अपने जीवन का आदर्श बनाए। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति ने उसके प्रति कोई उपकार किया है तो उसको सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कृतज्ञ, भाव से स्वीकार करे। भले ही अपने पास प्रभूत ऐश्वर्य क्यों न आ जाए, कितनी ही धन-सम्पत्ति के मालिक क्यों न हो जाए, किन्तु अहंकार को कभी भी अपने पास तक न फटकने देवे।
इसके अतिरिक्त प्रथम तो दूसरों की पीठ पीछे चर्चा ही न करे और यदि करनी भी पड़े तो वह निन्दापरक न हो, प्रशंसापरक होनी चाहिए। वस्तुतः ये सब गुण सज्जन के कहे गये हैं, किन्तु इस सब पर आचरण करना, पालन करना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन ही है।
विशेष— १. सज्जनों के असाधारण व्यवहार की ओर अत्यन्त सुन्दर ढंग से संकेत किया गया है। २. सज्जनों के मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन बताया गया है। ३. गुप्तदान सर्वाधिक प्रशंसनीय माना गया है, क्योंकि उसमें व्यक्ति की यश की कामना नहीं रहती। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. प्रकृष्टं दानम्, प्रदानम् (अव्ययीभाव)
२. प्र + √छद् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रच्छन्नम्
३. √दा + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दानम्
४. उप + √गम् + क्त = उपगतम् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) उपगते
५. सम्भ्रमस्य विधिः (षष्ठी तत्पुरुष) सम्भ्रमविधिः
६. सम् + √भ्रम् + घञ् = सम्भ्रमः। अभि + √भू + अप् = अभिभवः
७. वि + √धा + कि = विधिः। √सृ + घञ् = सारः
८. उप + √कृ + क्तिन् = उपकृतेः (स्त्रीलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
९. √कथ् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कथनम्
१०. न उत्सेकः अनुत्सेकः (नञ् समास)