भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 194 में से

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८८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. न्याय + यत् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) न्याय्या २. √वृत् + क्तिन् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वृत्तिः ३. असूनाम् भङ्गे (षष्ठी तत्पुरुष) असुभङ्गे ४. न सुकरम् इति (नञ् समास) असुकरम् ५. न सन्तः इति (नञ् समास) असन्तः ६. अभि + अर्थ + यत् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) अभ्यर्थ्याः ७. कृशम् धनम् यस्य सः (बहुव्रीहि) कृशधनः ८. √स्था + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) स्थेयम् ९. अनु + वि + √धा + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अनुविधेयम् १०. असिधारा इव कठिनव्रतम् (कर्मधारय) असिधाराव्रतम् ११. उत् + √दिश् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उद्दिष्टम् १२. विपदि + उच्चैः = विपद्युच्चैः (यण्, इकोयणचि) १३. केन + उद्दिष्टम् = केनोद्दिष्टम् (गुण, आद् गुणः)

प्रदानं प्रच्छन्नं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं चाप्युपकृतेः। अनुत्सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसाराः परकथाः, सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम्॥६७॥

अन्वय- प्रच्छन्नम् प्रदानम्, गृहम् उपगते सम्भ्रमविधिः, प्रियम् कृत्वा मौनम्, सदसि च उपकृतेः कथनम्, लक्ष्म्याम् अपि अनुत्सेकः, निरभिभवसाराः परकथाः, असिधाराविषमम् इदम् व्रतम् सताम् केन उद्दिष्टम्।

अनुवाद- अत्यन्त गुप्त पर्याप्त दान करना, घर पर आए हुए (व्यक्ति) का आदर करना, प्रिय करके चुप रहना और सभा में उपकार करने वाले का कथन करना, धन-सम्पत्ति होने पर भी घमण्ड न करना, दूसरों की निन्दारहित चर्चा करना, तलवार की धार पर चलने के समान यह कठोर व्रत सज्जनों को किसने बताया है।

व्याख्या- सज्जनों का आचरण किस प्रकार का होता है, इसका कथन करते हुए कवि कहता है कि उनका आचरण वस्तुतः तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन सामान्यजन के लिए अत्यन्त दुर्गम होता है, क्योंकि सज्जन को सदैव अत्यधिक मात्रा में दान देना चाहिए, किन्तु साथ ही वह दान यश-प्राप्ति के लिए न हो, अपितु गुप्त दान हो, ऐसी समाज की उससे अपेक्षा रहती है, जो वस्तुतः अत्यन्त कठिन कार्य है।

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