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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 194 में से

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पृष्ठ 109

नीतिशतकम् ८७

अन्वय- प्रिया न्याय्या वृत्तिः, असुभंगे अपि मलिनम् असुकरम्, असन्तः न अभ्यर्थ्याः, कृशधनः सुहृद् अपि न याच्यः, विपदि उच्चैः स्थेयम्, महताम् पदम् अनुविधेयम्, असिधारा इदम् विषमम् व्रतम् सताम् केन उद्दिष्टम्।

अनुवाद- प्रिय और न्यायपूर्ण व्यवहार, प्राणों के नष्ट होने पर भी बुरा (कार्य) सरलता से न करना, दुष्टों से न मांगना, निर्धन मित्र से भी याचना न करना, आपत्ति में (अपने मनोबल को) ऊँचा बनाए रखना, महान् लोगों के पद (चिह्नों) का अनुसरण करना, तलवार की धार पर चलने के समान इस कठोर व्रत का सज्जनों को किसने उपदेश दिया।

व्याख्या- समाज सज्जनों से अनेक व्यवहार-विषयक अपेक्षा करता है, इसी आधार पर वे सज्जन कहलाते हैं, उनका कथन करते हुए कवि कहता है— व्यवहार न्यायसंगत भी हो और अच्छा भी लगे यह बहुत कम देखने में आता है, किन्तु सज्जनों को ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। भले ही प्राण ही संकट में क्यों न पड़ जाएँ, किन्तु सज्जनों को कोई भी मर्यादा के विपरीत आचरण नहीं करना चाहिए। वह दुष्ट व्यक्ति से कभी भी कुछ न मांगे चाहे कितनी भी कठिनाई में क्यों न पड़ जाए।

साथ ही ऐसे मित्र से नहीं माँगे जो देने की स्थिति में नहीं हों, क्योंकि उस स्थिति में वह मित्र अत्यन्त हीनता का अनुभव करेगा और अपराध बोध से ग्रस्त होगा, इसके अतिरिक्त कठिन से कठिन स्थिति में पड़ने पर भी अपने धैर्य और मनोबल को न गिराये। ये सभी बातें सहज नहीं हैं अर्थात् तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन है, किन्तु फिर भी हम सभी सज्जनों से इसी प्रकार के आचरण की अपेक्षा करते हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है और सज्जन भी स्वतः ही बिना किसी की प्रेरणा के इस प्रकार का व्यवहार करते हैं। यह उससे भी अधिक आश्चर्य का विषय है।

विशेष- १: सज्जनों के लिए निश्चित मानदण्डों के आधार पर व्यवहार करना वस्तुतः तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन है।

२. 'न्याय्यः मनोहारि च दुर्लभं वचः' की भावनाओं का पोषण प्रस्तुत श्लोक में हुआ है। यदि कोई व्यक्ति न्यायपूर्ण आचरण करे तो आवश्यक नहीं कि वह प्रिय भी हो, सभी को अच्छा लगे, किन्तु लोग सज्जनों से यहीं अपेक्षा करते हैं।

३. प्रायः व्यक्ति अपने प्राणों को बचाने के लिए अनेकशः बुरे से बुरा कार्य करने को सहज ही तैयार हो जाता है, किन्तु सज्जनों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है।

४. वास्तव में प्रस्तुत श्लोक में गिनाए गए व्यवहार सामान्य व्यक्ति के लिए अत्यन्त कठिन ही नहीं, अपितु असंम्भव हैं, किन्तु हमारे समाज ने सज्जनों के लिए इन्हें निर्धारित किया हुआ है।

५. महाकवि कालिदास का भी विचार है कि—

याञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा।

६. प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है। लक्षण इस प्रकार है—