भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 194 में से

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पृष्ठ 108

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श्रीभर्तृहरिविरचितम्

सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम्।
आपत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशम्॥६५॥

अन्वय- महताम् चित्तम् सम्पत्सु उत्पलकोमलम्, आपत्सु च महाशैलशिला-संघातकर्कशम् भवति।

अनुवाद- महान् (पुरुषों) का मन सम्पत्तियों में कमल के समान कोमल और आपत्तियों में विशाल पर्वत की शिलाओं के संघात के समान कठोर होता है।

व्याख्या- महान् पुरुषों का चरित्र वस्तुतः आश्चर्यचकित कर देने वाला, अन्य लोगों से भिन्न होता है। जब इनके पास सम्पत्तियाँ आती हैं, ये ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं तो इनका मन अत्यन्त दयालु प्रकृति का हो जाता है, उस समय यह कमल के समान कोमल होता है, क्योंकि यदि इनके सामने कोई कष्ट में पड़ा हुआ व्यक्ति आता है तो ये दयार्द्र होकर तत्काल उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाते हैं।

इसके विपरीत जब ये आपत्तिग्रस्त होते हैं, उस समय इनका वही कमल के समान कोमल मन, विशाल पर्वत की कठोरतम शिला के समूह के समान आपत्तियों का सामना करने में समर्थ होता है अर्थात् वे आपत्तियों से घिर जाने पर जरा भी विचलित नहीं होते, अपितु पर्वत की मजबूत शिला के समान उनका डट कर मुकाबला करते हैं।

विशेष- १. महान् पुरुषों का चित्त आपत्ति और सम्पत्ति में क्रमशः कठोर और कोमलता का आचरण करता है।
२. प्रस्तुत श्लोक में मन की कोमलता की उपमा कमल से, कठोरता की उपमा कठोरतम शिला समूह से दी गई है। अतः उपमालंकार, लक्षण इस प्रकार है—

प्रस्फुटं सुन्दरं साम्यमुपमेत्यभिधीयते॥

३. अनुष्टुप् छन्द, लक्षण पूर्ववत् है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. उत्पलम्, इव कोमलम् (अव्ययीभाव) उत्पलकोमलम्
२. महाशैलस्य शिलानाम् संघातः इव कर्कशम् (अव्ययीभाव) महाशिला-संघातकर्कशम्
३. भवति + उत्पलकोमलम् (यण् - इकोयणचि - इ- य्)
४. सम् + √हन् + घञ् = संघातः


प्रिया न्याय्या वृत्तिर्मलिनमसुभङ्गेऽप्यसुकरं,
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्य कृशधनः।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां,
सतां केनोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम्॥६६॥