नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ८५
नहीं लेना चाहिए, अपितु चुप ही रहना चाहिए। कभी भी लोभ नहीं करना चाहिए। जो भी आयु में अथवा विद्या में बढ़े हुए लोग हैं, उनके साथ सदा ही विनम्रता से व्यवहार करना चाहिए। इस संसार में जितने भी प्राणी हैं, चाहे वह छोटा हो या बड़ा सभी पर सदैव दयाभाव प्रदर्शित करना चाहिए।
उपरोक्त बातों का पालन करने से व्यक्ति को केवल कल्याणों की ही प्राप्ति होगी। यह सुनिश्चित है।
विशेष- १. धर्म कोई भी हो, ये बातें सर्वसम्मति से मान्य है। अतः ऐसा आचरण करने से मनुष्य निश्चय ही धरती पर स्वर्ग की परिकल्पना साकार करने में समर्थ है।
२. भाषा अत्यन्त सरल, भावबोधगम्य एवं प्रवाहपूर्ण प्रयुक्त हुई है।
३. मनुष्य का स्वभाव है कि वह प्रायः दूसरे के धन को येनकेन प्रकारेण हड़पना चाहता है, उसका पूर्णतया निषेध किया गया है।
४. सत्यं वद, धर्मं चर, मा हिंस्यात्, सर्वभूतानि, अनार्यः परदारव्यवहारः, आदि सिद्धान्तों की चर्चा सभी शास्त्रों में हुई है।
५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेन त्रिमुनियुतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।
व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. प्राणानाम् आघातः प्राणाघातः, तस्मात् (षष्ठी तत्पुरुष) आ + √हन् + णिच् + घञ् = आघातः २. नि + √वृत् + क्तिन् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) निवृत्तिः ३. प्र + √दा + ल्युट् = प्रदानम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ४. वि + √भञ्ज् + घञ् = विभङ्गः ५. वि + √नी + अक् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विनयः ६. न उपहतः विधिः यस्य सः, अनुपहतः (नञ् समास) ७. वि + √धा + कि (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विधिः ८. समान + ष्यञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) सामान्यः ९. √हृ + ल्युट् = हरणम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १०. प्रशस्य (श्र आदेश) + ईयसुन्, श्रेयसाम् ११. सर्वशास्त्रेषु + अनुपहतविधिः (यण्, इकोयणचि) १२. पन्थाः— पथिन् + सु (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) १३. परधनस्य हरणे = परधनहरणे (षष्ठी तत्पुरुष) १४. युवतिजनानाम् कथासु, युवतिजनकथासु (षष्ठी तत्पुरुष) १५. सर्वेषु भूतेषु अनुकम्पा सर्वभूतानुकम्पा (सप्तमी तत्पुरुष)