भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

८४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

२. √त्यज् + घञ् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) त्यागः
३. प्रणयिन् + तल् + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रणयिता
४. नास्ति तुला यस्य तत्, अतुलम् (बहुव्रीहि)
५. विजय + इनि (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विजयी
६. वीर + यत् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) वीर्यम् .
७. √श्रु + क्त (नपुं., सप्तमी विभक्ति, एकवचन) श्रुते
८. प्रकृत्या महान्तः इति प्रकृतिमहान्तः (तृतीया तत्पुरुष) तेषाम् प्रकृतिमहताम्
९. √मण्ड् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मण्डनम्
१०. ईश्वरस्य भावः ऐश्वर्यम्। ईश् + वरच् = ऐश्वर्येण (तृतीया विभक्ति, एकवचन)
११. विना + अपि + ऐश्वर्येण (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) (यण् – इकोयणचि)
१२. श्लाघ्यः + त्यागः (विसर्ग – विसर्जनीयस्य सः)
१३. भुजयोः + वीर्यम् (विसर्ग – ससजुषो रुः)

प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्यवाक्यं,
काले शक्त्या प्रदानं युवतिजनकथामूकभावः परेषाम्।
तृष्णास्रोतो विभङ्गो गुरुषु च विनयः सर्वभूतानुकम्पा,
सामान्यः सर्वशास्त्रेष्वनुपहतविधिः श्रेयसामेष पन्थाः॥६४॥

अन्वय- प्राणाघातात् निवृत्तिः, परधनहरणे संयमः, सत्यवाक्यम्, काले शक्त्या प्रदानम्, परेषाम् युवतिजनकथामूकभावः, तृष्णास्रोतः विभङ्गः, गुरुषु च विनयः, सर्वभूतानुकम्पा, सर्वशास्त्रेषु अनुपहतविधिः श्रेयषाम् एषः (एव) सामान्यः पन्थाः (अस्ति)।

अनुवाद- प्राणों के आघात से विमुखता, दूसरे का धन छीनने में स्वयं को रोकना, सत्य भाषण, समय पर शक्ति के अनुसार दान देना, दूसरों की स्त्रियों की बातों में मौनभाव, लोभ के प्रवाह का विनाश, बड़ों के प्रति विनम्रता, सभी प्राणियों पर दया, सभी शास्त्रों में (वर्णित) प्रशंसनीय सिद्धान्त वाला, कल्याणों का यही सामान्य मार्ग (है)।

व्याख्या- सभी शास्त्रों में चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय अथवा धर्म से सम्बन्धित क्यों न हों, कल्याणों की प्राप्ति के लिए एक ही मार्ग बताया है कि व्यक्ति को कभी भी अपने जीवन में किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए अर्थात् "अहिंसा परमो धर्मः" सिद्धान्त सर्वोत्कृष्ट है। दूसरे के धन पर कभी भी गिद्ध दृष्टि नहीं डालनी चाहिए, अपने परिश्रम द्वारा कमाया हुआ धन ही प्राप्त करने योग्य है। सदैव सत्य बोलना चाहिए जब भी आवश्यकता पड़े तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य देना चाहिए।

यदि कहीं पराई स्त्री की चर्चा हो रही हो तो उसमें कभी भी बढ़ चढ़कर हिस्सा