नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ८३
हृदि स्वस्था वृत्तिः श्रुत अधिगतैकव्रतफलं१, विनाप्यैश्वर्येण प्रकृति महतां मण्डनमिदम्।।६३।।
अन्वय- करे श्लाघ्यः त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता, मुखे सत्या वाणी, भुजयोः विजयि अतुलम् वीर्यम्, हृदि स्वस्था वृत्तिः, श्रुते अधिगत-एकव्रतफलम्, ऐश्वर्येण विना अपि प्रकृतिमहताम् इदम् मण्डनम्।
अनुवाद- हाथ में प्रशंसनीय दान, सिर पर बड़ों के चरणों में नमन, मुख में सत्यवाणी, भुजाओं में विजय प्रदान कराने वाला अनुपम पराक्रम, हृदय में स्वस्थ आचरण, कान में केवल ज्ञानप्राप्ति रूप व्रत का एकमात्र फल, ऐश्वर्य के बिना भी स्वभाव से महान् (लोगों का) यह (सब) आभूषण (ही है)।
व्याख्या- सज्जनों के पास भले ही ऐश्वर्य न हो, किन्तु प्रशंसनीय गुण जो उनके पास होते हैं, वस्तुतः आभूषणों के समान उनकी शोभा में वृद्धि करने वाले होते हैं जैसे- वे बहुत धनवान् न होने की स्थिति में भी अपने हाथों से धन का याचकों, जरूरतमन्दों को दान देते रहते हैं। वे सदा अपने से बड़ों के चरणों में प्रणाम निवेदन के साथ उनका सम्मान करते हैं, वे सदैव सत्यभाषण करते हैं, उनकी भुजाओं में इस प्रकार का पराक्रम होता है जो उन्हें सदैव युद्ध में विजय दिलाने वाला होता है, जिसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।
उनका हृदय स्वच्छ मनोवृत्ति वाला होता है अर्थात् उनके हृदय में दोहरी नीति नहीं होती, उनका व्यवहार भीतर बाहर दोनों ओर से एक जैसा होता है। उनके कानों में सदा ही शास्त्रों के श्रवण की लालसा रहती है। परनिन्दा आदि में उनके कान रुचि नहीं लेते हैं। इस प्रकार आचरण करने वाले सज्जन वस्तुतः महापुरुष हैं, प्रशंसनीय हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में सज्जनों के गुणों का परिगणन किया गया है। २. गुणों को ही यहाँ अलंकार कहा गया है। अतः उदात्त अलंकार । ३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है- रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ४. कवि ने अन्यत्र भी कहा है- श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन। दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।। ५. विना के योग में ऐश्वर्येण में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है। ६. कुछ विद्वानों ने यहाँ श्रुत का अर्थ शास्त्र किया है जो उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सम्पूर्ण श्लोक में हाथ, सिर, मुँह, भुजा आदि अंगों का ही उल्लेख हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √श्लाघ् + ण्यत् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) श्लाघ्यः
१. श्रुतमधिगते च श्रवणयोः (कानों में शास्त्राध्ययन का ज्ञान)