नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
अनुवाद- आपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाणी की निपुणता, युद्ध में पराक्रम और यश में इच्छा तथा शास्त्रों में रुचि यह (सब) महात्माओं में स्वभाव से ही विराजमान रहता है।
व्याख्या- सज्जन एवं महापुरुषों में ये गुण स्वाभाविक रूप से ही रहते हैं, जैसे वे कितनी भी बड़ी से बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाए धैर्य का परित्याग नहीं करते, बड़े से बड़े पद को प्राप्त करने पर अथवा ऐश्वर्यसम्पन्न होने पर भी क्षमा का पालन करते हैं। सभा में अपनी वक्तृत्वकला के कारण शीघ्र ही अपना स्थान बना लेते हैं। युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हैं और सदा ही इस प्रकार के कार्य करते हैं। जिससे उनकी कीर्ति सारे संसार में फैलती है तथा सदा ही शास्त्रों का अध्ययन, चिन्तन एवं मनन करके अपने आचरण में उतारने का प्रयास करते हैं। ये सब गुण उनमें जन्मजात ही देखने को मिलते हैं।
विशेष-
१. 'अथ' पद यहाँ 'समुच्चय' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
२. सज्जनों के गुणों का संक्षेप में उल्लेख किया गया है।
३. मनुष्य को बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए।
४. ऐश्वर्य सम्पन्न होने पर भी क्षमा धारण करना, सज्जनता का प्रतीक है।
द्रुतविलम्बित छन्द-
द्रुतविलम्बितमाह नभौ भरौ।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. वि + √पत् + क्विप् (स्त्रीलिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) विपदि
२. धीर + ष्यञ् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) धैर्यम्
३. अभि + उत् + √इण् (गतौ) + अच् (पुल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) अभ्युदये
४. √क्षम् + अङ् + टाप् (स्त्रीलिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) क्षमा
५. पटु + तल् + टाप् (पटुता)
६. वि + √अस् + ल्युट् (नपुं, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) व्यसनम्
७. प्रकृत्या सिद्धम् (तृतीया तत्पुरुष) प्रकृतिसिद्धम्
८. अथ + अभि + उदये (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः, यण् – इकोयणचि)
९. च + अभिरुचिः + व्यसनम् (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)
करे श्लाघ्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता,
मुखे सत्या वाणी विजयि भुजयोर्वीर्यमतुलम्।