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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् ८९

इसी प्रकार सज्जन को घर पर आए व्यक्ति का भले ही वह अपरिचित ही क्यों न हो, सम्मान करना चाहिए, क्योंकि अतिथि देवता के समान होता है, उसकी पूजा सम्मान किया जाना आवश्यक है, भले ही स्वयं की आर्थिक स्थिति ठीक हो अथवा न हो।

इसके अतिरिक्त वह दूसरों का उपकार तो करे, पर चुप रहे, उसका कथन कहीं भी न करे, दूसरे शब्दों में ‘नेकी कर कुँए में डाल’ को अपने जीवन का आदर्श बनाए। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति ने उसके प्रति कोई उपकार किया है तो उसको सार्वजनिक रूप से अत्यन्त कृतज्ञ, भाव से स्वीकार करे। भले ही अपने पास प्रभूत ऐश्वर्य क्यों न आ जाए, कितनी ही धन-सम्पत्ति के मालिक क्यों न हो जाए, किन्तु अहंकार को कभी भी अपने पास तक न फटकने देवे।

इसके अतिरिक्त प्रथम तो दूसरों की पीठ पीछे चर्चा ही न करे और यदि करनी भी पड़े तो वह निन्दापरक न हो, प्रशंसापरक होनी चाहिए। वस्तुतः ये सब गुण सज्जन के कहे गये हैं, किन्तु इस सब पर आचरण करना, पालन करना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन ही है।

विशेष— १. सज्जनों के असाधारण व्यवहार की ओर अत्यन्त सुन्दर ढंग से संकेत किया गया है। २. सज्जनों के मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान अत्यन्त कठिन बताया गया है। ३. गुप्तदान सर्वाधिक प्रशंसनीय माना गया है, क्योंकि उसमें व्यक्ति की यश की कामना नहीं रहती। ४. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी। ५. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. प्रकृष्टं दानम्, प्रदानम् (अव्ययीभाव)
२. प्र + √छद् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) प्रच्छन्नम्
३. √दा + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) दानम्
४. उप + √गम् + क्त = उपगतम् (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) उपगते
५. सम्भ्रमस्य विधिः (षष्ठी तत्पुरुष) सम्भ्रमविधिः
६. सम् + √भ्रम् + घञ् = सम्भ्रमः। अभि + √भू + अप् = अभिभवः
७. वि + √धा + कि = विधिः। √सृ + घञ् = सारः
८. उप + √कृ + क्तिन् = उपकृतेः (स्त्रीलिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन)
९. √कथ् + ल्युट् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कथनम्
१०. न उत्सेकः अनुत्सेकः (नञ् समास)

९० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

११. उत् + √सिच् + घञ् = उत्सेकः। परेषां कथाः (षष्ठी तत्पुरुष) परकथाः १२. उत् + √दिश् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) उद्दिष्टम् १३. असिधारा इव कठिनम् व्रतम् (कर्मधारय) असिधाराव्रतम् १४. निरभिभवः सारः यासां ताः, निरभिभवसाराः (बहुव्रीहि)

संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते$^१$,
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते।$^२$
स्वात्यां$^३$ सागरसूक्तिमध्यपतितं तन्मौक्तिकं जायते,
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणाः संसर्गतो देहिनाम्$^४$॥६८॥

अन्वय- सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसः नाम अपि न ज्ञायते, तत् एव नलिनीपत्रस्थिम् मुक्ताकारतया राजते, तत् (एव) स्वात्याम् सागरसूक्तिमध्यपतितम् मौक्तिकम् जायते, प्रायेण देहिनाम् संसर्गतः अधममध्यमोत्तमगुणाः (जायन्ते)।

अनुवाद- अत्यधिक तपे हुए लोहे पर रखे हुए जल का नाम भी नहीं जाना जाता है, वही कमलिनी के पत्ते पर स्थित हुआ मोती के आकार में सुशोभित होता है, वही स्वाति (नक्षत्र) में समुद्र में स्थित सीप के बीच गिरा हुआ मोती हो जाता है, प्रायः देहधारियों में संसर्ग से (ही) अधम, मध्यम और उत्तम गुण (उत्पन्न होते हैं)।

व्याख्या- व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वैसा ही बन जाता है अर्थात् उसमें उसी तरह के गुण आ जाते हैं, इसी बात को जल की बूँद का उदाहरण देते हुए कवि कहता है कि जल की एक बूँद को यदि अत्यन्त गर्म लोहे पर डाला जाए तो वह एक क्षण में ही छन की ध्वनि के साथ गायब हो जाती है, उसका नामोनिशान भी नहीं रहता है।

इसके विपरीत यदि उसी जल की बूँद को कमलिनी के पत्ते पर रखा जाए तो वही मोती के समान शोभा वाली हो जाती है तथा वही जल की बूँद यदि स्वाति नक्षत्र में समुद्र में स्थित सीप के सम्पर्क में आती है, तो मोती ही बन जाती है।

इस प्रकार एक ही बूँद जब गर्म लोहे रूपी अधम व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो पूर्णतया अस्तित्वविहीन हो गई। पुनः कमलिनी के पत्ते रूपी मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के सम्पर्क में आयी तो मोती के समान दिखाई देने वाली हुई और वही जब उत्तम कोटि के व्यक्ति रूपी सीपी के सान्निध्य में आयी तो मोती ही बन गई।

इसी प्रकार व्यक्ति भी जब अधम, मध्यम और उत्तम गुणों से सम्पन्न व्यक्ति के निकट आता है तो उसी प्रकार के गुणों से युक्त हो जाता है।


१. श्रूयते
२. दृश्यते
३. अन्तः
४. एवं विधा वृत्तयः

नीतिशतकम् ९१

विशेष- १. अन्यत्र भी कहा गया है- संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति। २. कहते हैं स्वाति नक्षत्र में यदि सागर में स्थित सीपी में जल की बूँद गिर जाए तो मोती बन जाती है। ३. संगति से होने वाले प्रभावों को अत्यन्त सुन्दर उदाहरण देकर प्रदर्शित किया गया है। ४. यहाँ तपा हुआ लोहा दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति का प्रतीक है। जिसके संसर्ग में आने पर व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। ५. मनुष्य को सदैव श्रेष्ठ लोगों के सम्पर्क में आने का ही प्रयत्न करना चाहिए। ६. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— सूर्याश्वैर्मसजा स्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥ ७. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सन्तप्तम् अयः सन्तप्तायः, तस्मिन् (कर्मधारय) संतप्तायसि २. सम् + √स्था + क्त (षष्ठी विभक्ति, एकवचन, नपुं.) संस्थितस्य ३. नलिन्याः पत्रम् (षष्ठी तत्पुरुष) नलिनीपत्रम्, तस्मिन् स्थितम् नलिनीपत्रस्थितम् ४. मुक्तायाः इव आकारः यस्य सः (बहुव्रीहि) मुक्ताकारः तस्य भावः मुक्ताकारता, तया मुक्ताकारतया ५. √राज् (दीप्तौ) + त (लट् लकार, आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचन) राजते ६. √जनि (प्रादुर्भावे) + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) जायते ७. संसर्ग + तसिल् = संसर्गतः ८. देह + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) देहिनाम् ९. अधमश्च मध्यमश्च उत्तमश्च (द्वन्द्व समास) अधममध्यमोत्तमाः १०. मुक्ता + कन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मौक्तिकम्

यः प्रीणये¹ त्सुचरितैः पितरं स पुत्रो,
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत् त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते॥६९॥

अन्वय- यः सुचरितैः पितरम् प्रीणयेत्, सः पुत्रः, यत् (सदा) भर्तुः एव हितम् वाञ्छति, तत् कलत्रम्, यत् आपदि सुखे च समक्रियम् तत् मित्रम्, जगति एतत् त्रयम् पुण्यकृतः (एव) लभन्ते।


१. पाठभेद— प्रीणाति यः (जो प्रसन्न करे)

९२श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अनुवाद- जो श्रेष्ठ आचरणों के द्वारा पिता को प्रसन्न करे, वह पुत्र, जो (सदैव) पति का ही हित चाहती हो, वह स्त्री, जो आपत्ति में और सुख में समान व्यवहार वाला हो, वह मित्र, संसार में ये तीनों पुण्यशाली ही प्राप्त करते हैं।

व्याख्या- वे लोग अत्यन्त पुण्यात्मा हैं, जिन्हें ऐसे पुत्र की प्राप्ति हो जो अच्छे आचरण द्वारा अपने माता-पिता को प्रसन्न करे। ठीक इसी प्रकार ऐसी पत्नी की प्राप्ति भी पुण्यों के ही प्रताप से सम्भव हैं जो केवल अपने पति के प्रति ही अनुरक्त हो तथा उसके ही हित का सदैव चिंतन करती हो और ऐसा मित्र भी व्यक्ति को अत्यधिक पुण्यों से ही मिलता है जो कठिन परिस्थिति में भी अर्थात् आपत्ति एवं सुख की स्थिति दोनों में समान व्यवहार करने वाला हो। सामान्यतः होता यह है कि मित्र सुख में साथ रहते हैं और आपत्ति के समय साथ छोड़ देते हैं।

विशेष- १. उत्तम पुत्र, पतिव्रता पत्नी एवं हितकारी मित्र ये तीनों पूर्व जन्म में किए गए परम पुण्यों से ही मिलते हैं।
२. काव्यलिंग अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. अन्यत्र भी कवि ने कहा है कि जो आपत्ति में साथ दे वही सच्चा मित्र है—

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले।
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥

४. वसन्ततिलका छन्द है, लक्षण—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √प्रीञ् (प्रीणने) + तिप् (विधिलिंग, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रीणयेत्
२. √भृ + तृच् (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, एकवचन) भर्तुः
३. समानाः क्रियाः यस्य तत् समक्रियम् (बहुव्रीहि)
४. शोभनानि चरितानि सुचरितानि, तैः सुचरितैः


नम्रत्वेनोन्नमन्तः परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः,
स्वार्थान् सम्पादयन्तो वितत पृथुतरारम्भयत्नाः परार्थे।
क्षान्त्यैवाक्षेपपरूक्षाक्षरमुखरमुखां दुर्मुखान् दूषयन्तः,
सन्तः साश्चर्यचर्या जगति बहुमताः कस्य नाभ्यर्थनीयाः॥७०॥

अन्वय- नम्रत्वेन उन्नमन्तः, परगुणकथनैः स्वान् गुणान् ख्यापयन्तः, परार्थे विततपृथुतरारम्भयत्नाः स्वार्थान् सम्पादयन्तः, आक्षेप-रूक्षाक्षरमुखरमुखान् दुर्मुखान् क्षान्त्या एव दूषयन्तः, साश्चर्यचर्याः बहुमताः सन्तः जगति कस्य अभ्यर्थनीयाः न।

अनुवाद- नम्रता से ऊपर उठते हुए, दूसरों के गुणों को कहने के द्वारा अपने गुणों को प्रकट करते हुए, दूसरों के लिए विस्तृत और विशाल प्रारम्भ से युक्त यत्नों द्वारा

नीतिशतकम् ९३

अपने अभिप्रायों का सम्पादनं करते हुए, क्षमा से ही निन्दा के कारण रूखे अक्षरों से वाचाल मुख वाले दुर्जनों को दूषित करते हुए, आश्चर्ययुक्त आचरण वाले, अनेकों द्वारा सम्मानित सज्जन (लोग) संसार में किसके लिए पूजनीय नहीं है ?

व्याख्या- सज्जन विनम्रतापूर्वक व्यवहार के द्वारा जीवन में उन्नति करते हुए प्रशंसा के पात्र होते हैं, वे सदैव दूसरों के गुणों का कथन करके परप्रशंसा रूप अपने गुणों को प्रकट करते हैं। उनके जितने भी कार्य होते हैं, वे सब प्रायः परोपकार के लिए ही मुख्य रूप से होते हैं, उन्हीं को प्रमुखता प्रदान करते हुए गौण रूप में अपने प्रयोजनों को भी सिद्ध कर लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इनकी जो भी दिनचर्या होती है, वह प्रमुख रूप से दूसरों की भलाई के लिए होती है, किन्तु उन्हें करते हुए यदि उनका अपना भी कोई कार्य सम्पादन हो रहा हो तो वे कर लेते हैं। स्वार्थ के लिए ही उनकी क्रियाएँ प्रारम्भ नहीं होतीं।

जब दुर्जन उनके ऊपर अनेक प्रकार से दोषारोपण करते हैं, ऐसे रूखे अक्षरों से मुखरित उनके मुखों को ये सज्जन एकमात्र क्षमा रूपी हथियार से बन्द कर देते हैं अर्थात् उन्हें क्षमारूपी अस्त्र के द्वारा निष्प्रभ कर देते हैं। इस प्रकार के आश्चर्यचकित कर देने वाले व्यवहार वाले परमादरणीय सज्जनों की कौन पूजा नहीं करता अर्थात् इस प्रकार के गुणों के युक्त सज्जन सभी के द्वारा समादरणीय होते हैं।

विशेष- १. सज्जनों के गुणों का उल्लेख करते हुए, उनके व्यवहार को आश्चर्यजनक बताया है।

२. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
म्रभ्रैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

३. उदात्त और समुच्चय अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. उत् + √नम् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उन्नमन्तः
२. परेषां गुणानां कथनम् – परगुणकथनम् तैः , परगुणकथनैः
३. वि + √तन् + क्त = वितत। आ + √रभ् + घञ् = आरम्भः
४. पृथु + तरप् = पृथुतर
५. √क्षम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) क्षान्त्या
६. आक्षेपेण रूक्षाक्षरैः मुखराणि मुखानि येषां तान्, आक्षेपरूक्षाक्षरमुखान्
७. दुष्टानि मुखानि येषाम् ते दुर्मुखाः, तान् दुर्मुखान् (बहुव्रीहि)
८. √चर् + यत् + टाप् = चर्या
९. अभि + √अर्च + अनीयर् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) अभ्यर्चनीयाः
१०. नम्रत्वेन + उन्नमन्तः (गुण, आद् गुणः) (अ + उ = ओ)
११. स्व + अर्थान् (अ + अ = आ)

९४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१२. पर + अर्थे (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) (अ + अ = आ) ११३. न + अभ्यर्चनीयाः (अ + अ = आ) १४. √ख्या + णिच् + शतृ (पुक् आगम) = ख्यापयन्तः १५. सम् + √पद् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्पादयन्तः

अप्रियवचनदरिद्रैः प्रियवचनाढ्यैः स्वदारपरितुष्टैः,
परपरिवादनिवृत्तैः क्वचित्क्वचिन्मण्डिता वसुधा॥७१॥

अन्वय- अप्रियवचनदरिद्रैः, प्रियवचनाढ्यैः, स्वदारपरितुष्टैः परपरिवादनिवृत्तैः (मानवैः) वसुधा क्वचित् क्वचित् मण्डिता।

अनुवाद- प्रिय न लगने वाले वचनों से दरिद्र, प्रिय वचनों से धनवान्, अपनी पत्नी से (पूर्णतया) संतुष्ट, दूसरों की निन्दा से विमुख (लोगों से) पृथिवी कहीं-कहीं पर ही सुशोभित होती है।

व्याख्या- इस संसार में इस प्रकार के लोग अँगुलिगण्य ही है जो इस प्रकार की वाणी बोलते हैं जो दूसरों को कटु न लगे। ठीक इसी प्रकार प्रिय वाणी बोलने वाले भी इस संसार में बहुत कम हैं।

इसी प्रकार संसार में ऐसे लोगों की संख्या भी अत्यल्प ही है जो एकमात्र अपनी पत्नी से ही संतुष्ट रहते हैं, साथ ही ऐसे लोग भी इस संसार में अधिक नहीं है जो दूसरों की निन्दा में आनन्द का अनुभव नहीं करते हैं और यदि अत्यल्प हैं भी, तो वे लोग वस्तुतः पृथिवी के अलंकार स्वरूप ही हैं।

विशेष- १. सामान्यतया लोग कठोर वाणी का प्रयोग करने वाले, दूसरों की स्त्रियों पर कुदृष्टि रखने वाले तथा दूसरों की निन्दा में रुचि रखने वाले होते हैं।
२. मानव स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

४. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. न प्रियः इति अप्रियः (नञ् समास) अप्रियैः वचनैः दरिद्राः अप्रियवचनदरिद्राः तैः, अप्रियवचनदरिद्रैः
२. परि + √तुष् + क्त = परितुष्टः, तैः परितुष्टैः
३. परि + √वद् + घञ् = परिवादः
४. नि + √वृत् + क्त = निवृत्तः, तैः निवृत्तैः

नीतिशतकम् ९५

५. √मण्ड् + क्त + टाप् = मण्डिता (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. स्वदारैः परितुष्टाः स्वदारपरितुष्टाः तैः स्वदारपरितुष्टैः

एको देवः केशवो वा शिवो वा,
एकं¹ मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
एका² नारी सुन्दरी वा दरी वा॥७२॥

अन्वय- एकः देवः केशवः वा शिवः वा, एकम् मित्रम् भूपतिः वा यतिः वा, एकः वासः पत्तने वा वने वा, एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।

अनुवाद- एक (ही) देवता (हो) केशव (हो) या शिव (हो), एक (ही) मित्र (हो) (चाहे वह) राजा (हो) या सन्यासी (हो) एक (ही) निवास (हो) (चाहे वह) नगर में (हो) या वन में (हो) एक (ही) नारी (हो), सुन्दरी हो या कुरूप (हो)।

व्याख्या- व्यक्ति के लिए स्थिर चित्त होना आवश्यक है, इसी का कथन करते हुए कवि कहता है, व्यक्ति को एक ही देवता में ध्यान लगाना चाहिए चाहे वह शिव हो या फिर विष्णु, इसी प्रकार व्यक्ति को एक ही व्यक्ति से मित्रता करनी चाहिए चाहे वह ऐश्वर्य सम्पन्न व्यक्ति से करे अथवा सन्यासी से, किन्तु वह मित्रता स्थायी होनी चाहिए, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति को एक स्थान पर रहने का निश्चय करना चाहिए चाहे वह निवास नगर में हो या फिर वन में, एक ही नारी से व्यक्ति को प्रेम करना चाहिए चाहे वह सुन्दर हो अथवा कुरूप एकाधिक स्त्रियों से सम्पर्क उचित नहीं है।

विशेष-
१. व्यक्ति की उन्नति एवं शुद्ध छवि के लिए स्थिर चित्त होना आवश्यक है।
२. प्रस्तुत श्लोक से कवि का शैव अथवा वैष्णव होना प्रतीत होता है।
३. शिखरिणी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण-

रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।

४. भाषा अत्यन्त सरल एवं भावबोधगम्य प्रयुक्त हुई है।
५. अनुप्रास अलंकार दर्शनीय है।
६. प्रत्येक चरण में एक वा पद का प्रयोग पाद पूर्ति के लिए है।
७. कुछ विद्वान् टीकाकारों ने दरी का अर्थ गुफा किया है, जो उचित प्रतीत नहीं होता।

त्वमेव चातकाधारोऽसीति केषां न गोचरः।
किमम्भोदवरास्माकं कार्पण्योक्तिं प्रतीक्षसे॥७३॥


१. ह्येकम्
२. ह्येका

९६श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अन्वय- (हे) अम्भोदवर! त्वम् एव चातकाधारः असि इति, केषाम् गोचरः न (अस्ति)। (पुनरपि) अस्माकम् कार्पण्योक्तिम् किम् प्रतीक्षसे।

अनुवाद- (हे) श्रेष्ठ मेघ! तुम ही चातक के आधार हो, यह किसको ज्ञात नहीं (है)। (फिर भी) हमारे दीन वचनों की प्रतीक्षा क्यों करते हो।

व्याख्या- बादल को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे श्रेष्ठ बादल! तुम जो जल प्रदान करते हो, उसी को पीकर चातक अपना जीवन धारण करता है। अतः तुम ही वस्तुतः उसके जीवन के आधार हो तब यह जानते हुए भी तुम स्वयं ही उसे, उसकी आवश्यकता को समझते हुए तथा अपने महत्त्व को स्वीकार करते हुए, उसके उपयोग के योग्य जल प्रदान क्यों नहीं करते हो। तुम यह प्रतीक्षा क्यों करते हो कि पहले यह मेरे सामने अत्यन्त दीनहीन होकर याचना करे तब ही मैं इसे जल की कुछ बूँदें प्रदान करूँगा। वस्तुतः तुम्हारा बड़प्पन तो इसी में है कि तुम इसकी आवश्यकता एवं अपनी उदारता प्रदर्शित करते हुए स्वयं ही इसे जल प्रदान करो।

विशेष- १. यहाँ बादल धनवान् का तथा चातक निर्धन का प्रतीक है।
२. वस्तुतः यह संदेश कवि का धनवान् को अन्योक्ति के माध्यम से दिया गया है। अतः अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. दीन व्यक्ति को उसकी आवश्यकता समझकर बिना मांगे ही देना, धनवानों का पुनीत कर्तव्य है।
४. अनुष्टुप् छन्द प्रयुक्त हुआ है। लक्षण पूर्ववत् ।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अम्भः ददाति इति अम्भोदः, अम्भस् + √दा + क
२. अम्भोदेषु वरः इति (सप्तमी तत्पुरुष) अम्भोदवरः
३. चातकस्य आधारः, चातकाधारः (षष्ठी तत्पुरुष)
४. कृपणस्य भावः कार्पण्यम् (षष्ठी तत्पुरुष) कृपण + ष्यञ्=कार्पण्य
५. गावः चरन्ति अस्मिन् इति गोचरः
६. √वच् + क्तिन् = उक्तिः

परोपकारपद्धतिः

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै-
र्नवाम्बुभिर्भूरिभि³ विलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषा 'समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्।।७४।।


३. भूरिविलम्बितः (अत्यधिक झुके हुए)

नीतिशतकम् ९७

अन्वय- तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति, घनाः नवाम्बुभिः भूमिविलम्बिनः (भवन्ति) सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः भवन्ति। एषः परोपकारिणाम् स्वभावः एव भवति।

अनुवाद- पेड़ फलों के आने से विनम्र हो जाते हैं, बादल नये जलों से और अधिक पृथ्वी पर झुक (जाते हैं), सज्जन सम्पन्नता से अहंकार रहित (हो जाते हैं)। (वस्तुतः) यह परोपकारियों का स्वभाव ही होता है।

व्याख्या- परोपकारी लोगों का यह स्वभाव है कि वे समृद्धि आने पर अपेक्षाकृत और अधिक विनम्र हो जाते हैं। इसी सम्बन्ध में कवि वृक्षों बादलों और सज्जनों का उदाहरण देते हुए कहता है कि- वृक्षों पर फल आने से वे मानों नम्रतावश झुक जाते हैं।

इसी प्रकार वर्षा ऋतु में नये नये जलों से भरे हुए बादल पृथ्वी की ओर उसे सिञ्चित करने के लिए मानो विनम्र होकर पृथ्वी के निकट आ जाते हैं। यह भी समृद्धि होने पर उनके नम्र स्वभाव का ही परिणाम है।

ठीक इसी प्रकार सज्जन स्वभाव के लोग यदि उनके पास धन-धान्य, ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ आदि आती हैं तो उनका व्यवहार अपने सेवकों, मित्रों आदि के प्रति और अधिक नम्र हो जाता है।

विशेष- १. यद्यपि वृक्ष फलों के बोझ से, बादल जलों के बोझ से नीचे झुकते हैं, किन्तु कवि इसमें कल्पना करता है कि वे वस्तुतः समृद्धि आने पर झुक जाते हैं। २. प्रकृति का मानवीकरण करने का प्रयास किया है। ३. प्रस्तुत श्लोक में परोपकारियों के स्वभाव का विश्लेषण किया गया है। ४. वंशस्थ छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. फलानाम् उद्गमः फलोद्गमः तैः, फलोद्गमैः (षष्ठी तत्पुरुष) २. उत् + √गम् + घञ् = उद्गमः ३. √नम् + र (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) नम्राः ४. न उद्धताः इति (नञ् समास) अनुद्धताः ५. उत् + √हन् + क्त = उद्धतः ६. परेषां उपकारः, परोपकारः (षष्ठी तत्पुरुष) ७. परोपकार + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) परोपकारिणाम् ८. नवानि अम्बूने नवाम्बूनि तैः (कर्मधारय समास) नवाम्बुभिः ९. सम् + √ऋध् (वृद्धौ) + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, बहुवचन) समृद्धिभिः

९८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन,
दानेन पाणि र्न तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारै र्न तु चन्दनेन॥७५॥

अन्वय- श्रोत्रम् श्रुतेन एव (विभाति) कुण्डलेन न पाणिः दानेन (विभाति) तु कङ्कणेन न, करुणापराणाम् कायः परोपकारैः विभाति, चन्दनेन न।

अनुवाद- कान शास्त्र-श्रवण से ही (शोभा पाता है), कुण्डल से नहीं, हाथ दान से (सुशोभित होता है), किन्तु कङ्कन से नहीं, दयावान् लोगों का शरीर परोपकार (के कार्यों) से सुशोभित होता है, चन्दन से नहीं।

व्याख्या- सामान्यतः व्यक्ति कानों की शोभा बढ़ाने के लिए कुण्डल आदि धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कानों के लिए शास्त्रों के श्रवण को ही सबसे सुन्दर और महत्त्वपूर्ण आभूषण माना है।

इसी प्रकार मनुष्य हाथों की सुन्दरता में वृद्धि के लिए सोने-चाँदी कंगन आदि के आभूषण धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे भी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हाथों की सुन्दरता में बढ़ोतरी के लिए मनुष्य को अधिक से अधिक दान देना चाहिए।

पुनः कवि कहता है कि लोग अपने शरीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए चन्दन आदि का लेप करते हैं जो उचित नहीं है, क्योंकि सुगन्धित चन्दन आदि के लेप करने से शरीर की शोभा नहीं बढ़ती, अपितु शरीर की सुन्दरता परोपकारपूर्ण कार्य करने से ही होती है। अतः व्यक्ति को अपने शरीर से सदैव परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।

विशेष- १. मनुष्य को सदैव कानों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए शास्त्रों का श्रवण, हाथों की सुन्दरता के लिए अधिकाधिक दान तथा शरीर की सुन्दरता के लिए, परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।
२. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण पूर्ववत् है।
३. क्रियादीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √श्रु + ष्ट्रन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) श्रोत्रम्
२. करुणा + परा (श्रेष्ठा) येषाम् ते करुणापराः, तेषाम् करुणापराणाम्
३. वि + √भा (दीप्तौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विभाति
४. श्रुतेन + एव (वृद्धि– वृद्धिरेचि– अ + ए = ऐ)
५. पाणिः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
६. परोपकारैः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
७. पर + उप + √कृ + घञ् (परोपकारः) तैः ,परोपकारैः

नीतिशतकम् ९९

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति,
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्।
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति,
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥७६॥

अन्वय- दिनकरः पद्माकरम् विकचीकरोति, चन्द्रः कैरवचक्रवालम् विकासयति, जलधरः अपि न अभ्यर्थितः जलम् ददाति, सन्तः स्वयम् परहितेषु कृताभियोगाः (भवन्ति)।

अनुवाद- सूर्य कमल समूह को विकसित करता है, चन्द्रमा कुमुदों के समूह को खिलाता है, बादल भी बिना मांगे (ही) जल देता है। (वस्तुतः) सज्जन लोग स्वयं दूसरों के हित साधन में प्रयास करने वाले (होते हैं)।

व्याख्या- सज्जन बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही दूसरों का हित करने वाले कार्यों के लिए परिश्रमशील होते हैं, इस बात को तीन उदाहरण देकर पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि—

सत्पुरुषों का यह स्वभाव ही होता है कि वे दूसरे के लिए स्वयं ही कार्य करते हैं जैसे- सूर्य को कोई भी कमलवन को प्रफुल्लित करने, खिलाने के लिए नहीं कहता है, अपितु वह तो प्रतिदिन स्वयं ही उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है।

इसी प्रकार चन्द्रमा भी बिना किसी की प्रेरणा के कुमुदों के वन को विकसित करता है, क्योंकि परोपकार चन्द्रमा का स्वभाव है। ठीक इसी प्रकार बादल भी बिना मांगे ही इस सम्पूर्ण संसार को स्वतः ही जल प्रदान करते हैं।

विशेष- १. सज्जनों को दूसरे के हित का कार्य करने की प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती, अपितु यह तो वे स्वतः प्रेरित होकर करते हैं।
२. कुमुदों की विशेषता है कि वे चन्द्र-दर्शन से खिलते हैं और कमल सूर्य-दर्शन से विकसित होते हैं।
३. सज्जनों के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
४. अन्तिम चरण की सामान्य बात का प्रथम तीन चरणों में कहीं गई बातों से समर्थन के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार— लक्षण इस प्रकार है—

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्र सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा॥

५. वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिनं करोति इति दिनकरः (द्वितीया तत्पुरुष)

१००श्रीभर्तृहरिविरचितम्

२. पद्मानाम् आकरम्, पद्माकरम् (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कैरवाणाम् चक्रवालम् (षष्ठी तत्पुरुष) कैरवचक्रवालम्
४. वि + √कास् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकासयति
५. जलं धरति इति, जलधरः (द्वितीया तत्पुरुष)
६. अभि + √अर्थ् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अभ्यर्थितः
७. कृतः अभियोगः यैः, ते (बहुव्रीहि) कृताभियोगः
८. अभि + √युज् + घञ् = अभियोगः
९. न + अभ्यर्थितः + जलधरः + अपि

दीर्घ संधिविसर्ग संधिविसर्ग संधि
(अकः सवर्णे दीर्घः)(हशि च)(अतोरोरप्लुतादप्लुते)
( अ + अ = आ)(: – उ – ओ)( : – उ – ओ)

१०. वि + √धा + क्त = विहितः
११. विकच + च्वि + √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकचीकरोति

एके¹ सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये,
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,
ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥७७॥

अन्वय- एके सत्पुरुषाः ये स्वार्थम् परित्यज्य परार्थघटकाः (भवन्ति) ये स्वार्थाविरोधेन परार्थम् उद्यमभृतः, ते तु सामान्याः (भवन्ति), ये स्वार्थाय परहितम् निघ्नन्ति, अमी ते मानुषराक्षसाः (भवन्ति), (किन्तु) ये निरर्थकम् (एव) परहितम् निघ्नन्ति, ते के न जानीमहे।

अनुवाद- एक (तो) सज्जन हैं, जो स्वार्थ को छोड़कर दूसरों का प्रयोजन सिद्ध करने वाले (होते हैं), जो स्वार्थ के साथ विरोध न होने पर दूसरों के कार्य के लिए परिश्रम करने वाले हैं, वे तो सामान्य (होते हैं), जो स्वार्थ के लिए दूसरों के हित का हनन करते हैं, ये वे मनुष्य रूपी राक्षस (होते हैं), (किन्तु) जो निरर्थक (ही) परहित का हनन करते हैं, वे कौन (हैं), (यह हम) नहीं जानते हैं।

व्याख्या- सज्जन लोग स्वार्थ का परित्याग करके दूसरों के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते हैं, उनकी प्रत्येक क्रिया परोपकार के लिए होती है स्वार्थ के लिए नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपना कोई नुकसान न हो अथवा अपना कार्य भी हो जाए तो उस


१. एते

नीतिशतकम् १०१

स्थिति में दूसरों का हित साधन करने के लिए तत्पर रहते हैं, इस प्रकार के लोगों को कवि ने सामान्य व्यक्ति कहा है, क्योंकि उनकी दृष्टि में स्वार्थ प्रमुख रहता है और संसार में ऐसे लोग संख्या में अधिक भी होते हैं।

किन्तु इसके साथ-साथ इस संसार में कुछ लोग अपने हित साधन के लिए दूसरों के हितों की हानि करने से भी नहीं चूकते हैं, ऐसे लोगों को कवि मनुष्य रूपी राक्षस कहता है, अर्थात् केवल स्वार्थमयी वृत्ति वाले लोग मनुष्यों के रूप में राक्षस ही हैं।

इस तीन प्रकार के लोगों— सज्जन, सामान्य और मनुष्यरूपी राक्षसों का कथन करने के बाद एक चौथे प्रकार की श्रेणी का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि इन सबके विपरीत इस संसार में कुछ लोग इस प्रकार के भी होते हैं जो व्यर्थ ही परहित का हनन करते रहते हैं, अर्थात् दूसरों का काम बिगाड़ने, उनका नुकसान करने में उन्हें आनन्द आता है, यद्यपि उनके नुकसान से उनका अपना कोई लाभ नहीं होता है। अन्त में कवि कहता है कि इस प्रकार की प्रवृत्ति वाले लोगों को हम क्या नाम दें, यह तो हमारी समझ में भी नहीं आता है, अर्थात् इस प्रकार की वृत्ति वाले लोगों के लिए कोई निकृष्टतम नाम भी हमारे पास नहीं है।

विशेष— १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने मनुष्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है— सज्जन, सामान्य, मानुष-राक्षस, सर्वाधिक निकृष्ट। २. आजकल हमें संसार में चतुर्थ श्रेणी के लोग अधिक देखने को मिलते हैं। ३. उक्त चारों श्रेणियों का आधार स्वार्थ और परार्थ ही है। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. मानुषराक्षसाः में रूपक अलंकार मनुष्यरूपी राक्षस, लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. परि + √त्यज् + ल्यप् = परित्यज्य २. √घट् + णिच् + ण्वुल् = घटकः ते घटकाः (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) ३. स्वार्थस्य अविरोधः स्वार्थाविरोधः तेन स्वार्थाविरोधेन ४. उद्यमम् बिभ्रति इति (द्वितीया तत्पुरुष) उद्यमभृतः ५. उद्यम + √भृ + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उद्यमभृतः ६. नि + √हन् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निघ्नन्ति ७. मानुषेषु राक्षसाः (सप्तमी तत्पुरुष) मानुषराक्षसाः ८. उत् + √यम् + अप् = उद्यमः ९. निर्गतः अर्थः यस्मात्, तत् निरर्थकम् १०. सामान्याः + तु (विसर्ग - विसर्जनीयस्य सः)

१०२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

११. स्वार्थ + अविरोधेन (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. न विरोधेन इति अविरोधेन (नञ् समास)

पापान्निवारयति योजयते हिताय,
गुह्यं च निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले,
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥७८॥

अन्वय- (सन्मित्रम्) पापात् निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यम् च गूहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतम् च जहाति न, काले ददाति, सन्तः इदम् सन्मित्रलक्षणम् प्रवदन्ति।

अनुवाद- (श्रेष्ठ मित्र) पाप से रोकता है, हित के लिए लगाता है और गोपनीय को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति में पड़ने पर छोड़ता नहीं है, समय पड़ने पर (साथ) देता है। सज्जन लोग अच्छे मित्र के यह लक्षण कहते हैं।

व्याख्या- इस संसार में श्रेष्ठ मित्र का अत्यन्त महत्त्व है, किन्तु उसे पहचानने में लोग प्रायः भूल कर जाते हैं। इसीलिए यहाँ कवि ने श्रेष्ठ मित्र के लक्षणों का उल्लेख किया है—

अच्छा मित्र सदैव अपने मित्र को पापपूर्ण अनुचित कार्यों को करने से रोकता है तथा जो उसके हित के लिए हों, ऐसे कार्यों के प्रति उसे सदैव प्रेरित करता है। मित्र की जो बातें छिपाने योग्य होती हैं उन्हें कहीं भी नहीं कहता, अपितु छिपाकर अपने पास ही रखता है। इसके विपरीत अपने मित्र के गुणों को, अच्छी-अच्छी बातों, को सार्वजनिक रूप से बताता है।

मित्र के आपत्ति में पड़ने पर उसका साथ नहीं छोड़ता है, अपितु उस समय उसका पूरा-पूरा साथ देता है, कठिन परिस्थितियों में यदि मित्र को आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है तो पीछे नहीं हटता, अपितु पूरा-पूरा सहयोग करता है।

सज्जनों ने श्रेष्ठ मित्र के ये ही संक्षेप में लक्षण बताए हैं।

विशेष- १. सामान्यतः मित्रता स्वार्थवश अधिक होती है, इसलिए मित्रता में प्रायः लोगों को धोखा हो जाता है। प्रस्तुत श्लोक में कवि ने श्रेष्ठ मित्र की पहचान का सहज उपाय बताया है।
२. यहाँ "ददाति काले" का अर्थ, समय पर साथ देना भी किया जा सकता है और समय पड़ने पर आर्थिक मदद देना भी किया जा सकता है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

नीतिशतकम् १०३

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. नि + √वृ + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निवारयति
२. नि + √गुह् + क्यप् (गुह्यम्)
३. नि + √गुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निगूहति
४. प्रकट + च्वि + √कृ + ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रकटी करोति
५. प्रापात् + निवारयति (व्यञ्जन— वा पदान्तस्य)
६. प्र + √वद् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रवदन्ति

क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः,
क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशानौ हुतः।
गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं,
युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी॥७९॥

अन्वय- पुरा क्षीरेण ते अखिलाः गुणाः आत्मगतोदकाय हि दत्ताः, (पुनः) तेन पयसा क्षीरे तापम् अवेक्ष्य स्वात्मा कृशानौ हुतः। तत् तु मित्रापदम् दृष्ट्वा पावकम् गन्तुम् उन्मनः अभवत् पुनः तेन जलेन युक्तम् शाम्यति। सताम् मैत्री ईदृशी (एव) (भवति)

अनुवाद- पहले दूध के द्वारा वे सभी गुण अपने में गिरे हुए जल को ही दे दिए, (पुनः) उस जल द्वारा दूध में ताप को देखकर स्वयं को अग्नि में डाल दिया और वह (दूध) मित्र की आपत्ति को देखकर अग्नि में जाने के लिए बेचैन हो गया (और) फिर उस जल से युक्त हुआ (ही) शान्त हो सका। सज्जनों की मित्रता ऐसी (ही होती है)।

व्याख्या- सज्जनों की मित्रता को समझाने के लिए दूध और पानी का उदाहरण दिया गया है। पहले तो जब दूध में पानी मिलाया गया तो दूध ने अपने सारे गुण उस पानी को दे दिये। इसी प्रकार अच्छे मित्र अपने अच्छे गुण सहज ही मित्र को प्रदान कर देते हैं।

पुनः जब जल ने दूध को उबलते हुए संतप्त अवस्था में देखा तो उसे आपत्ति से बचाने के लिए उसने अग्नि (बुझाने के लिए) स्वयं को अग्नि में डाल दिया और अपने प्राणों की बलि देकर मित्र की रक्षा की, किन्तु जब दूध ने पानी को अग्नि में गिरते हुए आपद्ग्रस्त जाना तो वह भी उबाल के रूप में अग्नि में जाने को व्याकुल हो गया।

इसी प्रकार अच्छा मित्र अपने मित्र को आपत्ति में फंसा हुआ देखकर उसे बचाने के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता और अपने मित्र से मिलकर ही उसकी व्याकुलता शान्त होती है।

ठीक इसी प्रकार जल भी अपने मित्र दूध से मिलकर शान्त हुआ। वास्तव में सज्जनों की मित्रता ऐसी ही होती है।

१०४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

विशेष- १. दूध में उबाल कम करने के लिए, अग्नि बुझाने हेतु उसपर पानी डाला जाता है। (यह आधुनिक– गैस के युग की बात नहीं है)।
२. फिर भी यदि दूध का उबाल नहीं रुकता तो दूध में ही पानी के छींटे डाले जाते हैं।
३. दूध और जल की स्वाभाविक क्रिया में प्राणाहूत की सम्भावना के कारण उत्प्रेक्षालंकार, लक्षण इस प्रकार है–

सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण इस प्रकार है–

सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. अव + √ईक्ष् + ल्यप् = अवेक्ष्य
२. गम् + तुमुन् = गन्तुम्
३. आत्मानम् गतम् आत्मगतम्, तादृशम् उदकम् तस्मै आत्मगतोदकाय
४. क्षीर + उत् + √तप् + घञ् = क्षीरोत्तापः, तम् = क्षीरोत्तापम्
५. √हु + क्त = हुतः
६. √पू + ण्वुल् = पावकः तम्, पावकम्
७. √युज् + क्त = युक्तः तम्, युक्तम्
८. मित्र + अण् + ङीप् = मैत्री
९. √शम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शाम्यति
१०. मित्रस्य आपदम् मित्रापदम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. क्षीरेण + आत्मगत + उदकाय (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः, गुण - आद् गुणः अ + उ = ओ)
१२. पुनः + तु + ईदृशी (विसर्जनीयस्य सः, इकोयणचि)
१३. ते + अखिलाः (एङः पदान्तादति)

इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीय द्विषां,
इतश्च शरणार्थिनां शिखरिणां गणाः शेरते।
इतश्च वडवानलः सह समस्तसंवर्तकैः,
अहो विततमूर्जितं भरसहं च सिन्धोर्वपुः॥८०॥

अन्वय- इतः केशवः स्वपिति, इतः तदीय द्विषाम् कुलम् (स्वपिति), इतः च शरणार्थिनाम् शिखरिणाम् गणाः शेरते। इतः च समस्त संवर्तकैः सह वडवानलः (स्वपिति), अहो सिन्धो वपुः (कीदृशम्) विततम्, ऊर्जितम् भरसहम् च अस्ति।

नीतिशतकम् १०५

अनुवाद- इधर विष्णु सो रहे हैं, इधर उनके शत्रुओं का समूह (सो रहा है) और इधर शरणार्थी पर्वतों के समूह सो रहे हैं, और इधर सभी (प्रलयकालीन बादल) संवर्तकादि के साथ वडवानल (सो रहा है), आश्चर्य है, समुद्र का शरीर (कितना) विस्तृत, शक्तिशाली और भार को सहन करने वाला है।

व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं होती, इस बात का कथन समुद्र का उदाहरण देकर बताया गया है कि इसमें एक कोने में समस्त संसार के पालक भगवान् विष्णु शयन कर रहे हैं और इसी में दूसरी ओर देवों के शत्रु राक्षस, वह भी एक दो नहीं, अपितु पूरा समूह ही शयन कर रहा है, इतना ही नहीं, इसी में एक ओर इन्द्र के वज्र से बचने के लिए भाग कर शरण में आए हुए मैनाक आदि पर्वतों का समूह शयन कर रहा है।

इतना ही नहीं इसी विशाल सामर्थ्य वाले समुद्र में प्रलयकाल में भयंकर विनाश करने वाले, शक्तिशाली, संवर्तक आदि बादलों के साथ समुद्र की आग वडवानल भी विराजमान है।

इस सबको देखकर अत्यन्त आश्चर्य होता हैं कि इस समुद्र की शक्ति, सामर्थ्य और विशालता अत्यन्त अद्भुत एवं वाङ्मनस् अगोचर है।

विशेष-

१. महापुरुषों की सामर्थ्य को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है, वे निस्सीम होती हैं।

२. यहाँ समुद्र महापुरुष का प्रतीक है, अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

३. प्रस्तुत श्लोक में राक्षसादि सभी के शयन की बात कही गयी है, इससे भी समुद्र की विशालता का अतिरेक अभिव्यञ्जित हो रहा है, क्योंकि ये सभी समुद्र में कष्ट से एक दूसरे के ऊपर पड़े हुए नहीं है, अपितु आराम से शयन कर रहे हैं।

४. समुद्र की शरणागतवत्सलता की भी अभिव्यक्ति हो रही है।

५. अग्नि तीन प्रकार की होती है— वन की आग–दावानल, पेट की आग–जठरानल और समुद्र की आग–वडवानल। इस वडवानल के ही कारण समुद्र में बादल बनते हैं।

६. अग्नि से उत्पन्न बादलों का समूह संवर्तक नाम से जाना जाता है, यह प्रलयकाल में अत्यन्त विध्वंस करता है।

७. पुराणों में कथा आती है कि जब इन्द्र पर्वतों के पंख काट रहा था तो कुछ मैनाकादि पर्वत स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गए थे।

८. पृथ्वी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।

९. ‘सहयुक्तेऽप्रधाने’ सूत्र से ‘संवर्तकैः’ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

१०. अहो यहाँ आश्चर्यातिरेक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।

१०६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. इदम् + तसिल् = इतः २. शिखर + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) शिखरिणाम् ३. समस्तैः संवर्तकैः (अव्ययीभाव) समस्तसंवर्तकैः ४. वि + √तन् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विततम् ५. ऊर्जा + इतच् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ऊर्जितम् ६. भरं सहते इति, भरसहम् ७. द्विष् + आम् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) द्विषाम् ८. शरण + अर्थ + णिनि = शरणार्थिन् तेषाम्, शरणार्थिनाम् ९. बलं वाति इति, बल + वा + क + टाप् = वडवा (डलयोरैक्यात् लस्य डत्वम्) वडवायाः अनलः = वडवानलः।

जातः कूर्म स एकः पृथुभुवनभरायार्पितं येन पृष्ठं, श्लाघ्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमति नियमितं यत्र तेजस्विचक्रम्। संजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणे नोपरिष्टान्न चाधो, ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवदपरे जन्तवो जातनष्टाः॥८१॥

अन्वय- सः एकः कूर्मः जातः, येन पृथुभुवनभराय पृष्ठम् अर्पितम्, ध्रुवस्य जन्म (अपि) श्लाघ्यम्, यत्र तेजस्विचक्रम् नियमितम् (भूत्वा) भ्रमति। परहितकरणे संजातव्यर्थपक्षाः अपरेजन्तवः न उपरिष्टात् न च अधः (किमपि कुर्वन्ति), (अपितु) ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवत् जातनष्टाः (भवन्ति)।

अनुवाद- वह अकेला कछुआ पैदा हुआ, जिसने विशाल भुवनों के भार के लिए (अपनी) पीठ को अर्पित कर दिया। ध्रुव का जन्म (भी) प्रशंसनीय है, जहाँ तेजस्वी चक्र नियमित रूप से भ्रमण करता है। परोपकार में जिनके पक्ष व्यर्थ ही उत्पन्न हुए हैं (ऐसे) अन्य प्राणी न ऊपर और न ही नीचे (कुछ करते हैं, अपितु) ब्रह्माण्ड रूपी गूलर के भीतर मच्छरों के समान उत्पन्न होकर नष्ट (होते रहते हैं)।

व्याख्या- परोपकार करने से ही मनुष्य के जीवन की सार्थकता है, इस बात को एक पाताल में स्थित कच्छपराज का और दूसरा अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का उदाहरण देकर समझाते हुए कवि कहता है कि—

उस कछुवे का जन्म सार्थक है भले ही वह पाताल में स्थित क्यों न हो, क्योंकि उसने सम्पूर्ण भुवनों के गुरुतर भार को वहन करने के लिए स्वेच्छा से अपनी पीठ को समर्पित कर दिया। साथ ही अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का जन्म भी प्रशंसनीय है, क्योंकि सम्पूर्ण अन्तरिक्षमण्डल में स्थित तेजस्वी ग्रह उसी को केन्द्र बनाकर नियमित रूप से

नीतिशतकम् १०७

भ्रमण कर पाते हैं अर्थात् एक मात्र ध्रुव के आधार पर ही तेजस्वी ग्रहों का समूह जीवित है, अस्तित्व बनाए हुए है।

इसके विपरीत परोपकार पूर्ण कार्यों में जिनकी लेशमात्र भी रुचि (पक्ष) नहीं है, ऐसे दूसरे अनेक प्राणी न तो उच्च पदों पर स्थित होकर ही कुछ कर पाते हैं और न ही किसी नीचे पद पर आसीन होकर ही कुछ करते हैं।

इस प्रकार के प्राणी वस्तुतः गूलर नामक फल के अन्दर स्थित उन मच्छरों के समान होते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में पैदा होकर निरर्थक ही आते हैं और चले जाते हैं। वास्तव में उनका जीवन निरर्थक होता है।

विशेष- १. परोपकार पूर्ण कार्यों से ही जीवन की सार्थकता है, इसका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन उदाहरण सहित किया गया है।

२. ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में अभेद की स्थापना की गई है, अतः रूपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

३. अन्तरिक्षमण्डल में स्थित ध्रुव को सम्पूर्ण तारामण्डल का केन्द्र माना गया है, उसी के चारों ओर सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं।

४. पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण भुवनों के भार को कच्छपावतार अपनी पीठ पर धारण किए हुए हैं।

५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण, त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

६. उदुम्बर गूलर को कहते हैं, पकने पर उसमें बहुत से छोटे-छोटे मच्छर हो जाते हैं। स्वाद मीठा होता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √जन् + क्त = जातः
२. √श्लाघ् + ण्यत् = श्लाघ्यम्
३. सम् + √जन् + क्त = संजातः
४. परेषां हितं परहितं तेषां, करणे, परहितकरणे
५. पृथुभुवनं तस्य भरः तस्मै= पृथुभुवनभराय
६. ब्रह्मणः अण्डं ब्रह्माण्डम्, ब्रह्माण्डम् एव उदरं तस्य, अन्तः तत्र मशकाः ब्रह्माण्डोडुम्बराान्तमशकाः तद्वत्।
७. √भ्रम् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = भ्रमति
८. न + उपरिष्टात् + न (गुण - आद् गुणः, व्यञ्जन)
९. नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)

१०८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

तृष्णां छिन्धि¹ भज क्षमां जहि मदं पापे रतिं मा कृथाः,
सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम्।
मान्यान् मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रच्छादय² स्वान्गुणान्,
कीर्तिं पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां लक्षणम्॥८२॥

अन्वय- तृष्णाम् छिन्धि, क्षमाम् भज, मदम् जहि, पापे रतिम् मा कृथाः, सत्यम् ब्रूहि, साधु-पदवीम् अनुयाहि, विद्वज्जनम्, सेवस्व, मान्यान् मानय, विद्विषः अपि अनुनय, स्वान् गुणान् प्रच्छादय, कीर्तिम् पालय, दुःखिते दयाम् कुरु, सताम् एतत् लक्षणम्।

अनुवाद- लोभ का नाश करो, क्षमा का पालन करो, अहंकार का त्याग करो, पाप में प्रेम मत करो, सत्य बोलो, सज्जनों के मार्ग का अनुसरण करो, विद्वज्जनों की सेवा करो, सम्माननीय (लोगों) का सम्मान करो, शत्रुओं को भी प्रसन्न करो, अपने गुणों को छिपाओ, यश का पालन करो, दुःखी पर दया करो, सज्जनों के यह लक्षण हैं।

व्याख्या- सज्जन बनने के लिए हमें किस प्रकार का आचरण करना चाहिए, इसी बात का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में किया गया है— हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए, सदैव क्षमा का पालन करना चाहिए, कभी भी किसी भी बात का अहंकार नहीं करना चाहिए, पापपूर्ण कार्यों मे कभी भी अनुराग नहीं करना चाहिए, सदैव सत्यभाषण करना चाहिए, सज्जनों द्वारा बताए गए मार्ग पर ही सदैव चलना चाहिए, विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जो सम्मान एवं आदर के पात्र हैं, ऐसे लोगों का सदैव सम्मान करना चाहिए, अपने शत्रुओं को भी सदैव प्रसन्न करने के प्रयास करने चाहिएँ, स्वयं के गुणों का प्रख्यापन नहीं करना चाहिए अर्थात् आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिए। ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे हम यश के भागी बने, दुःखियों पर सदैव दया करनी चाहिए, इस प्रकार का आचरण करने से ही व्यक्ति सज्जन कहलाता है।

विशेष- १. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
२. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √हा + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
२. √मन् + ण्यत् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) मान्यान्
३. वि + √द्विष् + क्विप् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) विद्विषः
४. प्र + √छद् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रच्छादय


१. छिन्दि
२. प्राख्यापय (प्रकट करो)