नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् १०३
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. नि + √वृ + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निवारयति
२. नि + √गुह् + क्यप् (गुह्यम्)
३. नि + √गुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निगूहति
४. प्रकट + च्वि + √कृ + ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रकटी करोति
५. प्रापात् + निवारयति (व्यञ्जन— वा पदान्तस्य)
६. प्र + √वद् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रवदन्ति
क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः,
क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशानौ हुतः।
गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं,
युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी॥७९॥
अन्वय- पुरा क्षीरेण ते अखिलाः गुणाः आत्मगतोदकाय हि दत्ताः, (पुनः) तेन पयसा क्षीरे तापम् अवेक्ष्य स्वात्मा कृशानौ हुतः। तत् तु मित्रापदम् दृष्ट्वा पावकम् गन्तुम् उन्मनः अभवत् पुनः तेन जलेन युक्तम् शाम्यति। सताम् मैत्री ईदृशी (एव) (भवति)
अनुवाद- पहले दूध के द्वारा वे सभी गुण अपने में गिरे हुए जल को ही दे दिए, (पुनः) उस जल द्वारा दूध में ताप को देखकर स्वयं को अग्नि में डाल दिया और वह (दूध) मित्र की आपत्ति को देखकर अग्नि में जाने के लिए बेचैन हो गया (और) फिर उस जल से युक्त हुआ (ही) शान्त हो सका। सज्जनों की मित्रता ऐसी (ही होती है)।
व्याख्या- सज्जनों की मित्रता को समझाने के लिए दूध और पानी का उदाहरण दिया गया है। पहले तो जब दूध में पानी मिलाया गया तो दूध ने अपने सारे गुण उस पानी को दे दिये। इसी प्रकार अच्छे मित्र अपने अच्छे गुण सहज ही मित्र को प्रदान कर देते हैं।
पुनः जब जल ने दूध को उबलते हुए संतप्त अवस्था में देखा तो उसे आपत्ति से बचाने के लिए उसने अग्नि (बुझाने के लिए) स्वयं को अग्नि में डाल दिया और अपने प्राणों की बलि देकर मित्र की रक्षा की, किन्तु जब दूध ने पानी को अग्नि में गिरते हुए आपद्ग्रस्त जाना तो वह भी उबाल के रूप में अग्नि में जाने को व्याकुल हो गया।
इसी प्रकार अच्छा मित्र अपने मित्र को आपत्ति में फंसा हुआ देखकर उसे बचाने के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता और अपने मित्र से मिलकर ही उसकी व्याकुलता शान्त होती है।
ठीक इसी प्रकार जल भी अपने मित्र दूध से मिलकर शान्त हुआ। वास्तव में सज्जनों की मित्रता ऐसी ही होती है।