नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें१०२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्
११. स्वार्थ + अविरोधेन (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. न विरोधेन इति अविरोधेन (नञ् समास)
पापान्निवारयति योजयते हिताय,
गुह्यं च निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले,
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥७८॥
अन्वय- (सन्मित्रम्) पापात् निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यम् च गूहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतम् च जहाति न, काले ददाति, सन्तः इदम् सन्मित्रलक्षणम् प्रवदन्ति।
अनुवाद- (श्रेष्ठ मित्र) पाप से रोकता है, हित के लिए लगाता है और गोपनीय को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति में पड़ने पर छोड़ता नहीं है, समय पड़ने पर (साथ) देता है। सज्जन लोग अच्छे मित्र के यह लक्षण कहते हैं।
व्याख्या- इस संसार में श्रेष्ठ मित्र का अत्यन्त महत्त्व है, किन्तु उसे पहचानने में लोग प्रायः भूल कर जाते हैं। इसीलिए यहाँ कवि ने श्रेष्ठ मित्र के लक्षणों का उल्लेख किया है—
अच्छा मित्र सदैव अपने मित्र को पापपूर्ण अनुचित कार्यों को करने से रोकता है तथा जो उसके हित के लिए हों, ऐसे कार्यों के प्रति उसे सदैव प्रेरित करता है। मित्र की जो बातें छिपाने योग्य होती हैं उन्हें कहीं भी नहीं कहता, अपितु छिपाकर अपने पास ही रखता है। इसके विपरीत अपने मित्र के गुणों को, अच्छी-अच्छी बातों, को सार्वजनिक रूप से बताता है।
मित्र के आपत्ति में पड़ने पर उसका साथ नहीं छोड़ता है, अपितु उस समय उसका पूरा-पूरा साथ देता है, कठिन परिस्थितियों में यदि मित्र को आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है तो पीछे नहीं हटता, अपितु पूरा-पूरा सहयोग करता है।
सज्जनों ने श्रेष्ठ मित्र के ये ही संक्षेप में लक्षण बताए हैं।
विशेष-
१. सामान्यतः मित्रता स्वार्थवश अधिक होती है, इसलिए मित्रता में प्रायः लोगों को धोखा हो जाता है। प्रस्तुत श्लोक में कवि ने श्रेष्ठ मित्र की पहचान का सहज उपाय बताया है।
२. यहाँ "ददाति काले" का अर्थ, समय पर साथ देना भी किया जा सकता है और समय पड़ने पर आर्थिक मदद देना भी किया जा सकता है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।