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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 194 में से

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पृष्ठ 123

नीतिशतकम् १०१

स्थिति में दूसरों का हित साधन करने के लिए तत्पर रहते हैं, इस प्रकार के लोगों को कवि ने सामान्य व्यक्ति कहा है, क्योंकि उनकी दृष्टि में स्वार्थ प्रमुख रहता है और संसार में ऐसे लोग संख्या में अधिक भी होते हैं।

किन्तु इसके साथ-साथ इस संसार में कुछ लोग अपने हित साधन के लिए दूसरों के हितों की हानि करने से भी नहीं चूकते हैं, ऐसे लोगों को कवि मनुष्य रूपी राक्षस कहता है, अर्थात् केवल स्वार्थमयी वृत्ति वाले लोग मनुष्यों के रूप में राक्षस ही हैं।

इस तीन प्रकार के लोगों— सज्जन, सामान्य और मनुष्यरूपी राक्षसों का कथन करने के बाद एक चौथे प्रकार की श्रेणी का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि इन सबके विपरीत इस संसार में कुछ लोग इस प्रकार के भी होते हैं जो व्यर्थ ही परहित का हनन करते रहते हैं, अर्थात् दूसरों का काम बिगाड़ने, उनका नुकसान करने में उन्हें आनन्द आता है, यद्यपि उनके नुकसान से उनका अपना कोई लाभ नहीं होता है। अन्त में कवि कहता है कि इस प्रकार की प्रवृत्ति वाले लोगों को हम क्या नाम दें, यह तो हमारी समझ में भी नहीं आता है, अर्थात् इस प्रकार की वृत्ति वाले लोगों के लिए कोई निकृष्टतम नाम भी हमारे पास नहीं है।

विशेष— १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने मनुष्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है— सज्जन, सामान्य, मानुष-राक्षस, सर्वाधिक निकृष्ट। २. आजकल हमें संसार में चतुर्थ श्रेणी के लोग अधिक देखने को मिलते हैं। ३. उक्त चारों श्रेणियों का आधार स्वार्थ और परार्थ ही है। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. मानुषराक्षसाः में रूपक अलंकार मनुष्यरूपी राक्षस, लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. परि + √त्यज् + ल्यप् = परित्यज्य २. √घट् + णिच् + ण्वुल् = घटकः ते घटकाः (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) ३. स्वार्थस्य अविरोधः स्वार्थाविरोधः तेन स्वार्थाविरोधेन ४. उद्यमम् बिभ्रति इति (द्वितीया तत्पुरुष) उद्यमभृतः ५. उद्यम + √भृ + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उद्यमभृतः ६. नि + √हन् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निघ्नन्ति ७. मानुषेषु राक्षसाः (सप्तमी तत्पुरुष) मानुषराक्षसाः ८. उत् + √यम् + अप् = उद्यमः ९. निर्गतः अर्थः यस्मात्, तत् निरर्थकम् १०. सामान्याः + तु (विसर्ग - विसर्जनीयस्य सः)