नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०० | श्रीभर्तृहरिविरचितम् |
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२. पद्मानाम् आकरम्, पद्माकरम् (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कैरवाणाम् चक्रवालम् (षष्ठी तत्पुरुष) कैरवचक्रवालम्
४. वि + √कास् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकासयति
५. जलं धरति इति, जलधरः (द्वितीया तत्पुरुष)
६. अभि + √अर्थ् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अभ्यर्थितः
७. कृतः अभियोगः यैः, ते (बहुव्रीहि) कृताभियोगः
८. अभि + √युज् + घञ् = अभियोगः
९. न + अभ्यर्थितः + जलधरः + अपि
| दीर्घ संधि | विसर्ग संधि | विसर्ग संधि |
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| (अकः सवर्णे दीर्घः) | (हशि च) | (अतोरोरप्लुतादप्लुते) |
| ( अ + अ = आ) | (: – उ – ओ) | ( : – उ – ओ) |
१०. वि + √धा + क्त = विहितः
११. विकच + च्वि + √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकचीकरोति
एके¹ सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये,
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,
ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥७७॥
अन्वय- एके सत्पुरुषाः ये स्वार्थम् परित्यज्य परार्थघटकाः (भवन्ति) ये स्वार्थाविरोधेन परार्थम् उद्यमभृतः, ते तु सामान्याः (भवन्ति), ये स्वार्थाय परहितम् निघ्नन्ति, अमी ते मानुषराक्षसाः (भवन्ति), (किन्तु) ये निरर्थकम् (एव) परहितम् निघ्नन्ति, ते के न जानीमहे।
अनुवाद- एक (तो) सज्जन हैं, जो स्वार्थ को छोड़कर दूसरों का प्रयोजन सिद्ध करने वाले (होते हैं), जो स्वार्थ के साथ विरोध न होने पर दूसरों के कार्य के लिए परिश्रम करने वाले हैं, वे तो सामान्य (होते हैं), जो स्वार्थ के लिए दूसरों के हित का हनन करते हैं, ये वे मनुष्य रूपी राक्षस (होते हैं), (किन्तु) जो निरर्थक (ही) परहित का हनन करते हैं, वे कौन (हैं), (यह हम) नहीं जानते हैं।
व्याख्या- सज्जन लोग स्वार्थ का परित्याग करके दूसरों के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते हैं, उनकी प्रत्येक क्रिया परोपकार के लिए होती है स्वार्थ के लिए नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपना कोई नुकसान न हो अथवा अपना कार्य भी हो जाए तो उस
१. एते