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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 194 में से

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नीतिशतकम् ९९

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति,
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्।
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति,
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥७६॥

अन्वय- दिनकरः पद्माकरम् विकचीकरोति, चन्द्रः कैरवचक्रवालम् विकासयति, जलधरः अपि न अभ्यर्थितः जलम् ददाति, सन्तः स्वयम् परहितेषु कृताभियोगाः (भवन्ति)।

अनुवाद- सूर्य कमल समूह को विकसित करता है, चन्द्रमा कुमुदों के समूह को खिलाता है, बादल भी बिना मांगे (ही) जल देता है। (वस्तुतः) सज्जन लोग स्वयं दूसरों के हित साधन में प्रयास करने वाले (होते हैं)।

व्याख्या- सज्जन बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही दूसरों का हित करने वाले कार्यों के लिए परिश्रमशील होते हैं, इस बात को तीन उदाहरण देकर पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि—

सत्पुरुषों का यह स्वभाव ही होता है कि वे दूसरे के लिए स्वयं ही कार्य करते हैं जैसे- सूर्य को कोई भी कमलवन को प्रफुल्लित करने, खिलाने के लिए नहीं कहता है, अपितु वह तो प्रतिदिन स्वयं ही उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है।

इसी प्रकार चन्द्रमा भी बिना किसी की प्रेरणा के कुमुदों के वन को विकसित करता है, क्योंकि परोपकार चन्द्रमा का स्वभाव है। ठीक इसी प्रकार बादल भी बिना मांगे ही इस सम्पूर्ण संसार को स्वतः ही जल प्रदान करते हैं।

विशेष- १. सज्जनों को दूसरे के हित का कार्य करने की प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती, अपितु यह तो वे स्वतः प्रेरित होकर करते हैं।
२. कुमुदों की विशेषता है कि वे चन्द्र-दर्शन से खिलते हैं और कमल सूर्य-दर्शन से विकसित होते हैं।
३. सज्जनों के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
४. अन्तिम चरण की सामान्य बात का प्रथम तीन चरणों में कहीं गई बातों से समर्थन के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार— लक्षण इस प्रकार है—

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्र सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा॥

५. वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिनं करोति इति दिनकरः (द्वितीया तत्पुरुष)