नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्
श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन,
दानेन पाणि र्न तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारै र्न तु चन्दनेन॥७५॥
अन्वय- श्रोत्रम् श्रुतेन एव (विभाति) कुण्डलेन न पाणिः दानेन (विभाति) तु कङ्कणेन न, करुणापराणाम् कायः परोपकारैः विभाति, चन्दनेन न।
अनुवाद- कान शास्त्र-श्रवण से ही (शोभा पाता है), कुण्डल से नहीं, हाथ दान से (सुशोभित होता है), किन्तु कङ्कन से नहीं, दयावान् लोगों का शरीर परोपकार (के कार्यों) से सुशोभित होता है, चन्दन से नहीं।
व्याख्या- सामान्यतः व्यक्ति कानों की शोभा बढ़ाने के लिए कुण्डल आदि धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कानों के लिए शास्त्रों के श्रवण को ही सबसे सुन्दर और महत्त्वपूर्ण आभूषण माना है।
इसी प्रकार मनुष्य हाथों की सुन्दरता में वृद्धि के लिए सोने-चाँदी कंगन आदि के आभूषण धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे भी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हाथों की सुन्दरता में बढ़ोतरी के लिए मनुष्य को अधिक से अधिक दान देना चाहिए।
पुनः कवि कहता है कि लोग अपने शरीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए चन्दन आदि का लेप करते हैं जो उचित नहीं है, क्योंकि सुगन्धित चन्दन आदि के लेप करने से शरीर की शोभा नहीं बढ़ती, अपितु शरीर की सुन्दरता परोपकारपूर्ण कार्य करने से ही होती है। अतः व्यक्ति को अपने शरीर से सदैव परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।
विशेष-
१. मनुष्य को सदैव कानों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए शास्त्रों का श्रवण, हाथों की सुन्दरता के लिए अधिकाधिक दान तथा शरीर की सुन्दरता के लिए, परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।
२. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण पूर्ववत् है।
३. क्रियादीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √श्रु + ष्ट्रन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) श्रोत्रम्
२. करुणा + परा (श्रेष्ठा) येषाम् ते करुणापराः, तेषाम् करुणापराणाम्
३. वि + √भा (दीप्तौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विभाति
४. श्रुतेन + एव (वृद्धि– वृद्धिरेचि– अ + ए = ऐ)
५. पाणिः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
६. परोपकारैः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
७. पर + उप + √कृ + घञ् (परोपकारः) तैः ,परोपकारैः