नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ९७
अन्वय- तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति, घनाः नवाम्बुभिः भूमिविलम्बिनः (भवन्ति) सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः भवन्ति। एषः परोपकारिणाम् स्वभावः एव भवति।
अनुवाद- पेड़ फलों के आने से विनम्र हो जाते हैं, बादल नये जलों से और अधिक पृथ्वी पर झुक (जाते हैं), सज्जन सम्पन्नता से अहंकार रहित (हो जाते हैं)। (वस्तुतः) यह परोपकारियों का स्वभाव ही होता है।
व्याख्या- परोपकारी लोगों का यह स्वभाव है कि वे समृद्धि आने पर अपेक्षाकृत और अधिक विनम्र हो जाते हैं। इसी सम्बन्ध में कवि वृक्षों बादलों और सज्जनों का उदाहरण देते हुए कहता है कि- वृक्षों पर फल आने से वे मानों नम्रतावश झुक जाते हैं।
इसी प्रकार वर्षा ऋतु में नये नये जलों से भरे हुए बादल पृथ्वी की ओर उसे सिञ्चित करने के लिए मानो विनम्र होकर पृथ्वी के निकट आ जाते हैं। यह भी समृद्धि होने पर उनके नम्र स्वभाव का ही परिणाम है।
ठीक इसी प्रकार सज्जन स्वभाव के लोग यदि उनके पास धन-धान्य, ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ आदि आती हैं तो उनका व्यवहार अपने सेवकों, मित्रों आदि के प्रति और अधिक नम्र हो जाता है।
विशेष- १. यद्यपि वृक्ष फलों के बोझ से, बादल जलों के बोझ से नीचे झुकते हैं, किन्तु कवि इसमें कल्पना करता है कि वे वस्तुतः समृद्धि आने पर झुक जाते हैं। २. प्रकृति का मानवीकरण करने का प्रयास किया है। ३. प्रस्तुत श्लोक में परोपकारियों के स्वभाव का विश्लेषण किया गया है। ४. वंशस्थ छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।
५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. फलानाम् उद्गमः फलोद्गमः तैः, फलोद्गमैः (षष्ठी तत्पुरुष) २. उत् + √गम् + घञ् = उद्गमः ३. √नम् + र (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) नम्राः ४. न उद्धताः इति (नञ् समास) अनुद्धताः ५. उत् + √हन् + क्त = उद्धतः ६. परेषां उपकारः, परोपकारः (षष्ठी तत्पुरुष) ७. परोपकार + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) परोपकारिणाम् ८. नवानि अम्बूने नवाम्बूनि तैः (कर्मधारय समास) नवाम्बुभिः ९. सम् + √ऋध् (वृद्धौ) + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, बहुवचन) समृद्धिभिः