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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 194 में से

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पृष्ठ 118
९६श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अन्वय- (हे) अम्भोदवर! त्वम् एव चातकाधारः असि इति, केषाम् गोचरः न (अस्ति)। (पुनरपि) अस्माकम् कार्पण्योक्तिम् किम् प्रतीक्षसे।

अनुवाद- (हे) श्रेष्ठ मेघ! तुम ही चातक के आधार हो, यह किसको ज्ञात नहीं (है)। (फिर भी) हमारे दीन वचनों की प्रतीक्षा क्यों करते हो।

व्याख्या- बादल को सम्बोधित करके कवि कहता है कि हे श्रेष्ठ बादल! तुम जो जल प्रदान करते हो, उसी को पीकर चातक अपना जीवन धारण करता है। अतः तुम ही वस्तुतः उसके जीवन के आधार हो तब यह जानते हुए भी तुम स्वयं ही उसे, उसकी आवश्यकता को समझते हुए तथा अपने महत्त्व को स्वीकार करते हुए, उसके उपयोग के योग्य जल प्रदान क्यों नहीं करते हो। तुम यह प्रतीक्षा क्यों करते हो कि पहले यह मेरे सामने अत्यन्त दीनहीन होकर याचना करे तब ही मैं इसे जल की कुछ बूँदें प्रदान करूँगा। वस्तुतः तुम्हारा बड़प्पन तो इसी में है कि तुम इसकी आवश्यकता एवं अपनी उदारता प्रदर्शित करते हुए स्वयं ही इसे जल प्रदान करो।

विशेष- १. यहाँ बादल धनवान् का तथा चातक निर्धन का प्रतीक है।
२. वस्तुतः यह संदेश कवि का धनवान् को अन्योक्ति के माध्यम से दिया गया है। अतः अन्योक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
३. दीन व्यक्ति को उसकी आवश्यकता समझकर बिना मांगे ही देना, धनवानों का पुनीत कर्तव्य है।
४. अनुष्टुप् छन्द प्रयुक्त हुआ है। लक्षण पूर्ववत् ।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. अम्भः ददाति इति अम्भोदः, अम्भस् + √दा + क
२. अम्भोदेषु वरः इति (सप्तमी तत्पुरुष) अम्भोदवरः
३. चातकस्य आधारः, चातकाधारः (षष्ठी तत्पुरुष)
४. कृपणस्य भावः कार्पण्यम् (षष्ठी तत्पुरुष) कृपण + ष्यञ्=कार्पण्य
५. गावः चरन्ति अस्मिन् इति गोचरः
६. √वच् + क्तिन् = उक्तिः

परोपकारपद्धतिः

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै-
र्नवाम्बुभिर्भूरिभि³ विलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषा 'समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्।।७४।।


३. भूरिविलम्बितः (अत्यधिक झुके हुए)

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