नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ९५
५. √मण्ड् + क्त + टाप् = मण्डिता (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. स्वदारैः परितुष्टाः स्वदारपरितुष्टाः तैः स्वदारपरितुष्टैः
एको देवः केशवो वा शिवो वा,
एकं¹ मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा।
एको वासः पत्तने वा वने वा,
एका² नारी सुन्दरी वा दरी वा॥७२॥
अन्वय- एकः देवः केशवः वा शिवः वा, एकम् मित्रम् भूपतिः वा यतिः वा, एकः वासः पत्तने वा वने वा, एका नारी सुन्दरी वा दरी वा।
अनुवाद- एक (ही) देवता (हो) केशव (हो) या शिव (हो), एक (ही) मित्र (हो) (चाहे वह) राजा (हो) या सन्यासी (हो) एक (ही) निवास (हो) (चाहे वह) नगर में (हो) या वन में (हो) एक (ही) नारी (हो), सुन्दरी हो या कुरूप (हो)।
व्याख्या- व्यक्ति के लिए स्थिर चित्त होना आवश्यक है, इसी का कथन करते हुए कवि कहता है, व्यक्ति को एक ही देवता में ध्यान लगाना चाहिए चाहे वह शिव हो या फिर विष्णु, इसी प्रकार व्यक्ति को एक ही व्यक्ति से मित्रता करनी चाहिए चाहे वह ऐश्वर्य सम्पन्न व्यक्ति से करे अथवा सन्यासी से, किन्तु वह मित्रता स्थायी होनी चाहिए, ठीक इसी प्रकार व्यक्ति को एक स्थान पर रहने का निश्चय करना चाहिए चाहे वह निवास नगर में हो या फिर वन में, एक ही नारी से व्यक्ति को प्रेम करना चाहिए चाहे वह सुन्दर हो अथवा कुरूप एकाधिक स्त्रियों से सम्पर्क उचित नहीं है।
विशेष-
१. व्यक्ति की उन्नति एवं शुद्ध छवि के लिए स्थिर चित्त होना आवश्यक है।
२. प्रस्तुत श्लोक से कवि का शैव अथवा वैष्णव होना प्रतीत होता है।
३. शिखरिणी छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण-
रसैःरुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।
४. भाषा अत्यन्त सरल एवं भावबोधगम्य प्रयुक्त हुई है।
५. अनुप्रास अलंकार दर्शनीय है।
६. प्रत्येक चरण में एक वा पद का प्रयोग पाद पूर्ति के लिए है।
७. कुछ विद्वान् टीकाकारों ने दरी का अर्थ गुफा किया है, जो उचित प्रतीत नहीं होता।
त्वमेव चातकाधारोऽसीति केषां न गोचरः।
किमम्भोदवरास्माकं कार्पण्योक्तिं प्रतीक्षसे॥७३॥
१. ह्येकम्
२. ह्येका