भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

९४ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

१२. पर + अर्थे (दीर्घ – अकः सवर्णे दीर्घः) (अ + अ = आ) ११३. न + अभ्यर्चनीयाः (अ + अ = आ) १४. √ख्या + णिच् + शतृ (पुक् आगम) = ख्यापयन्तः १५. सम् + √पद् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) सम्पादयन्तः

अप्रियवचनदरिद्रैः प्रियवचनाढ्यैः स्वदारपरितुष्टैः,
परपरिवादनिवृत्तैः क्वचित्क्वचिन्मण्डिता वसुधा॥७१॥

अन्वय- अप्रियवचनदरिद्रैः, प्रियवचनाढ्यैः, स्वदारपरितुष्टैः परपरिवादनिवृत्तैः (मानवैः) वसुधा क्वचित् क्वचित् मण्डिता।

अनुवाद- प्रिय न लगने वाले वचनों से दरिद्र, प्रिय वचनों से धनवान्, अपनी पत्नी से (पूर्णतया) संतुष्ट, दूसरों की निन्दा से विमुख (लोगों से) पृथिवी कहीं-कहीं पर ही सुशोभित होती है।

व्याख्या- इस संसार में इस प्रकार के लोग अँगुलिगण्य ही है जो इस प्रकार की वाणी बोलते हैं जो दूसरों को कटु न लगे। ठीक इसी प्रकार प्रिय वाणी बोलने वाले भी इस संसार में बहुत कम हैं।

इसी प्रकार संसार में ऐसे लोगों की संख्या भी अत्यल्प ही है जो एकमात्र अपनी पत्नी से ही संतुष्ट रहते हैं, साथ ही ऐसे लोग भी इस संसार में अधिक नहीं है जो दूसरों की निन्दा में आनन्द का अनुभव नहीं करते हैं और यदि अत्यल्प हैं भी, तो वे लोग वस्तुतः पृथिवी के अलंकार स्वरूप ही हैं।

विशेष- १. सामान्यतया लोग कठोर वाणी का प्रयोग करने वाले, दूसरों की स्त्रियों पर कुदृष्टि रखने वाले तथा दूसरों की निन्दा में रुचि रखने वाले होते हैं।
२. मानव स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
३. आर्या छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या॥

४. प्रस्तुत श्लोक नीतिशतकम् की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. न प्रियः इति अप्रियः (नञ् समास) अप्रियैः वचनैः दरिद्राः अप्रियवचनदरिद्राः तैः, अप्रियवचनदरिद्रैः
२. परि + √तुष् + क्त = परितुष्टः, तैः परितुष्टैः
३. परि + √वद् + घञ् = परिवादः
४. नि + √वृत् + क्त = निवृत्तः, तैः निवृत्तैः