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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 194 में से

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पृष्ठ 115

नीतिशतकम् ९३

अपने अभिप्रायों का सम्पादनं करते हुए, क्षमा से ही निन्दा के कारण रूखे अक्षरों से वाचाल मुख वाले दुर्जनों को दूषित करते हुए, आश्चर्ययुक्त आचरण वाले, अनेकों द्वारा सम्मानित सज्जन (लोग) संसार में किसके लिए पूजनीय नहीं है ?

व्याख्या- सज्जन विनम्रतापूर्वक व्यवहार के द्वारा जीवन में उन्नति करते हुए प्रशंसा के पात्र होते हैं, वे सदैव दूसरों के गुणों का कथन करके परप्रशंसा रूप अपने गुणों को प्रकट करते हैं। उनके जितने भी कार्य होते हैं, वे सब प्रायः परोपकार के लिए ही मुख्य रूप से होते हैं, उन्हीं को प्रमुखता प्रदान करते हुए गौण रूप में अपने प्रयोजनों को भी सिद्ध कर लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इनकी जो भी दिनचर्या होती है, वह प्रमुख रूप से दूसरों की भलाई के लिए होती है, किन्तु उन्हें करते हुए यदि उनका अपना भी कोई कार्य सम्पादन हो रहा हो तो वे कर लेते हैं। स्वार्थ के लिए ही उनकी क्रियाएँ प्रारम्भ नहीं होतीं।

जब दुर्जन उनके ऊपर अनेक प्रकार से दोषारोपण करते हैं, ऐसे रूखे अक्षरों से मुखरित उनके मुखों को ये सज्जन एकमात्र क्षमा रूपी हथियार से बन्द कर देते हैं अर्थात् उन्हें क्षमारूपी अस्त्र के द्वारा निष्प्रभ कर देते हैं। इस प्रकार के आश्चर्यचकित कर देने वाले व्यवहार वाले परमादरणीय सज्जनों की कौन पूजा नहीं करता अर्थात् इस प्रकार के गुणों के युक्त सज्जन सभी के द्वारा समादरणीय होते हैं।

विशेष- १. सज्जनों के गुणों का उल्लेख करते हुए, उनके व्यवहार को आश्चर्यजनक बताया है।

२. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
म्रभ्रैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

३. उदात्त और समुच्चय अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. उत् + √नम् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उन्नमन्तः
२. परेषां गुणानां कथनम् – परगुणकथनम् तैः , परगुणकथनैः
३. वि + √तन् + क्त = वितत। आ + √रभ् + घञ् = आरम्भः
४. पृथु + तरप् = पृथुतर
५. √क्षम् + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, एकवचन) क्षान्त्या
६. आक्षेपेण रूक्षाक्षरैः मुखराणि मुखानि येषां तान्, आक्षेपरूक्षाक्षरमुखान्
७. दुष्टानि मुखानि येषाम् ते दुर्मुखाः, तान् दुर्मुखान् (बहुव्रीहि)
८. √चर् + यत् + टाप् = चर्या
९. अभि + √अर्च + अनीयर् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) अभ्यर्चनीयाः
१०. नम्रत्वेन + उन्नमन्तः (गुण, आद् गुणः) (अ + उ = ओ)
११. स्व + अर्थान् (अ + अ = आ)