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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

नीतिशतकम् ९७

अन्वय- तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति, घनाः नवाम्बुभिः भूमिविलम्बिनः (भवन्ति) सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः भवन्ति। एषः परोपकारिणाम् स्वभावः एव भवति।

अनुवाद- पेड़ फलों के आने से विनम्र हो जाते हैं, बादल नये जलों से और अधिक पृथ्वी पर झुक (जाते हैं), सज्जन सम्पन्नता से अहंकार रहित (हो जाते हैं)। (वस्तुतः) यह परोपकारियों का स्वभाव ही होता है।

व्याख्या- परोपकारी लोगों का यह स्वभाव है कि वे समृद्धि आने पर अपेक्षाकृत और अधिक विनम्र हो जाते हैं। इसी सम्बन्ध में कवि वृक्षों बादलों और सज्जनों का उदाहरण देते हुए कहता है कि- वृक्षों पर फल आने से वे मानों नम्रतावश झुक जाते हैं।

इसी प्रकार वर्षा ऋतु में नये नये जलों से भरे हुए बादल पृथ्वी की ओर उसे सिञ्चित करने के लिए मानो विनम्र होकर पृथ्वी के निकट आ जाते हैं। यह भी समृद्धि होने पर उनके नम्र स्वभाव का ही परिणाम है।

ठीक इसी प्रकार सज्जन स्वभाव के लोग यदि उनके पास धन-धान्य, ऐश्वर्य, सम्पत्तियाँ आदि आती हैं तो उनका व्यवहार अपने सेवकों, मित्रों आदि के प्रति और अधिक नम्र हो जाता है।

विशेष- १. यद्यपि वृक्ष फलों के बोझ से, बादल जलों के बोझ से नीचे झुकते हैं, किन्तु कवि इसमें कल्पना करता है कि वे वस्तुतः समृद्धि आने पर झुक जाते हैं। २. प्रकृति का मानवीकरण करने का प्रयास किया है। ३. प्रस्तुत श्लोक में परोपकारियों के स्वभाव का विश्लेषण किया गया है। ४. वंशस्थ छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

५. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. फलानाम् उद्गमः फलोद्गमः तैः, फलोद्गमैः (षष्ठी तत्पुरुष) २. उत् + √गम् + घञ् = उद्गमः ३. √नम् + र (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) नम्राः ४. न उद्धताः इति (नञ् समास) अनुद्धताः ५. उत् + √हन् + क्त = उद्धतः ६. परेषां उपकारः, परोपकारः (षष्ठी तत्पुरुष) ७. परोपकार + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) परोपकारिणाम् ८. नवानि अम्बूने नवाम्बूनि तैः (कर्मधारय समास) नवाम्बुभिः ९. सम् + √ऋध् (वृद्धौ) + क्तिन् (स्त्रीलिंग, तृतीया विभक्ति, बहुवचन) समृद्धिभिः

९८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन,
दानेन पाणि र्न तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां,
परोपकारै र्न तु चन्दनेन॥७५॥

अन्वय- श्रोत्रम् श्रुतेन एव (विभाति) कुण्डलेन न पाणिः दानेन (विभाति) तु कङ्कणेन न, करुणापराणाम् कायः परोपकारैः विभाति, चन्दनेन न।

अनुवाद- कान शास्त्र-श्रवण से ही (शोभा पाता है), कुण्डल से नहीं, हाथ दान से (सुशोभित होता है), किन्तु कङ्कन से नहीं, दयावान् लोगों का शरीर परोपकार (के कार्यों) से सुशोभित होता है, चन्दन से नहीं।

व्याख्या- सामान्यतः व्यक्ति कानों की शोभा बढ़ाने के लिए कुण्डल आदि धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे असहमति व्यक्त करते हुए कानों के लिए शास्त्रों के श्रवण को ही सबसे सुन्दर और महत्त्वपूर्ण आभूषण माना है।

इसी प्रकार मनुष्य हाथों की सुन्दरता में वृद्धि के लिए सोने-चाँदी कंगन आदि के आभूषण धारण करता है, किन्तु कवि ने इससे भी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि हाथों की सुन्दरता में बढ़ोतरी के लिए मनुष्य को अधिक से अधिक दान देना चाहिए।

पुनः कवि कहता है कि लोग अपने शरीर की सुन्दरता बढ़ाने के लिए चन्दन आदि का लेप करते हैं जो उचित नहीं है, क्योंकि सुगन्धित चन्दन आदि के लेप करने से शरीर की शोभा नहीं बढ़ती, अपितु शरीर की सुन्दरता परोपकारपूर्ण कार्य करने से ही होती है। अतः व्यक्ति को अपने शरीर से सदैव परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।

विशेष- १. मनुष्य को सदैव कानों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए शास्त्रों का श्रवण, हाथों की सुन्दरता के लिए अधिकाधिक दान तथा शरीर की सुन्दरता के लिए, परोपकारपूर्ण कार्य करने चाहिएँ।
२. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है— लक्षण पूर्ववत् है।
३. क्रियादीपक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. √श्रु + ष्ट्रन् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) श्रोत्रम्
२. करुणा + परा (श्रेष्ठा) येषाम् ते करुणापराः, तेषाम् करुणापराणाम्
३. वि + √भा (दीप्तौ) + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विभाति
४. श्रुतेन + एव (वृद्धि– वृद्धिरेचि– अ + ए = ऐ)
५. पाणिः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
६. परोपकारैः + न (विसर्ग संधि – ससजुषो रुः) :- र्
७. पर + उप + √कृ + घञ् (परोपकारः) तैः ,परोपकारैः

नीतिशतकम् ९९

पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति,
चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्।
नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति,
सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥७६॥

अन्वय- दिनकरः पद्माकरम् विकचीकरोति, चन्द्रः कैरवचक्रवालम् विकासयति, जलधरः अपि न अभ्यर्थितः जलम् ददाति, सन्तः स्वयम् परहितेषु कृताभियोगाः (भवन्ति)।

अनुवाद- सूर्य कमल समूह को विकसित करता है, चन्द्रमा कुमुदों के समूह को खिलाता है, बादल भी बिना मांगे (ही) जल देता है। (वस्तुतः) सज्जन लोग स्वयं दूसरों के हित साधन में प्रयास करने वाले (होते हैं)।

व्याख्या- सज्जन बिना किसी की प्रेरणा के स्वयं ही दूसरों का हित करने वाले कार्यों के लिए परिश्रमशील होते हैं, इस बात को तीन उदाहरण देकर पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि—

सत्पुरुषों का यह स्वभाव ही होता है कि वे दूसरे के लिए स्वयं ही कार्य करते हैं जैसे- सूर्य को कोई भी कमलवन को प्रफुल्लित करने, खिलाने के लिए नहीं कहता है, अपितु वह तो प्रतिदिन स्वयं ही उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है।

इसी प्रकार चन्द्रमा भी बिना किसी की प्रेरणा के कुमुदों के वन को विकसित करता है, क्योंकि परोपकार चन्द्रमा का स्वभाव है। ठीक इसी प्रकार बादल भी बिना मांगे ही इस सम्पूर्ण संसार को स्वतः ही जल प्रदान करते हैं।

विशेष- १. सज्जनों को दूसरे के हित का कार्य करने की प्रेरणा की आवश्यकता नहीं होती, अपितु यह तो वे स्वतः प्रेरित होकर करते हैं।
२. कुमुदों की विशेषता है कि वे चन्द्र-दर्शन से खिलते हैं और कमल सूर्य-दर्शन से विकसित होते हैं।
३. सज्जनों के स्वभाव का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
४. अन्तिम चरण की सामान्य बात का प्रथम तीन चरणों में कहीं गई बातों से समर्थन के कारण अर्थान्तरन्यास अलंकार— लक्षण इस प्रकार है—

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्र सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा॥

५. वसन्ततिलका छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. दिनं करोति इति दिनकरः (द्वितीया तत्पुरुष)

१००श्रीभर्तृहरिविरचितम्

२. पद्मानाम् आकरम्, पद्माकरम् (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कैरवाणाम् चक्रवालम् (षष्ठी तत्पुरुष) कैरवचक्रवालम्
४. वि + √कास् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकासयति
५. जलं धरति इति, जलधरः (द्वितीया तत्पुरुष)
६. अभि + √अर्थ् + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) अभ्यर्थितः
७. कृतः अभियोगः यैः, ते (बहुव्रीहि) कृताभियोगः
८. अभि + √युज् + घञ् = अभियोगः
९. न + अभ्यर्थितः + जलधरः + अपि

दीर्घ संधिविसर्ग संधिविसर्ग संधि
(अकः सवर्णे दीर्घः)(हशि च)(अतोरोरप्लुतादप्लुते)
( अ + अ = आ)(: – उ – ओ)( : – उ – ओ)

१०. वि + √धा + क्त = विहितः
११. विकच + च्वि + √कृ + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) विकचीकरोति

एके¹ सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये,
सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,
ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे॥७७॥

अन्वय- एके सत्पुरुषाः ये स्वार्थम् परित्यज्य परार्थघटकाः (भवन्ति) ये स्वार्थाविरोधेन परार्थम् उद्यमभृतः, ते तु सामान्याः (भवन्ति), ये स्वार्थाय परहितम् निघ्नन्ति, अमी ते मानुषराक्षसाः (भवन्ति), (किन्तु) ये निरर्थकम् (एव) परहितम् निघ्नन्ति, ते के न जानीमहे।

अनुवाद- एक (तो) सज्जन हैं, जो स्वार्थ को छोड़कर दूसरों का प्रयोजन सिद्ध करने वाले (होते हैं), जो स्वार्थ के साथ विरोध न होने पर दूसरों के कार्य के लिए परिश्रम करने वाले हैं, वे तो सामान्य (होते हैं), जो स्वार्थ के लिए दूसरों के हित का हनन करते हैं, ये वे मनुष्य रूपी राक्षस (होते हैं), (किन्तु) जो निरर्थक (ही) परहित का हनन करते हैं, वे कौन (हैं), (यह हम) नहीं जानते हैं।

व्याख्या- सज्जन लोग स्वार्थ का परित्याग करके दूसरों के लिए निरन्तर प्रयासरत रहते हैं, उनकी प्रत्येक क्रिया परोपकार के लिए होती है स्वार्थ के लिए नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपना कोई नुकसान न हो अथवा अपना कार्य भी हो जाए तो उस


१. एते

नीतिशतकम् १०१

स्थिति में दूसरों का हित साधन करने के लिए तत्पर रहते हैं, इस प्रकार के लोगों को कवि ने सामान्य व्यक्ति कहा है, क्योंकि उनकी दृष्टि में स्वार्थ प्रमुख रहता है और संसार में ऐसे लोग संख्या में अधिक भी होते हैं।

किन्तु इसके साथ-साथ इस संसार में कुछ लोग अपने हित साधन के लिए दूसरों के हितों की हानि करने से भी नहीं चूकते हैं, ऐसे लोगों को कवि मनुष्य रूपी राक्षस कहता है, अर्थात् केवल स्वार्थमयी वृत्ति वाले लोग मनुष्यों के रूप में राक्षस ही हैं।

इस तीन प्रकार के लोगों— सज्जन, सामान्य और मनुष्यरूपी राक्षसों का कथन करने के बाद एक चौथे प्रकार की श्रेणी का उल्लेख करते हुए कवि कहता है कि इन सबके विपरीत इस संसार में कुछ लोग इस प्रकार के भी होते हैं जो व्यर्थ ही परहित का हनन करते रहते हैं, अर्थात् दूसरों का काम बिगाड़ने, उनका नुकसान करने में उन्हें आनन्द आता है, यद्यपि उनके नुकसान से उनका अपना कोई लाभ नहीं होता है। अन्त में कवि कहता है कि इस प्रकार की प्रवृत्ति वाले लोगों को हम क्या नाम दें, यह तो हमारी समझ में भी नहीं आता है, अर्थात् इस प्रकार की वृत्ति वाले लोगों के लिए कोई निकृष्टतम नाम भी हमारे पास नहीं है।

विशेष— १. प्रस्तुत श्लोक में कवि ने मनुष्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है— सज्जन, सामान्य, मानुष-राक्षस, सर्वाधिक निकृष्ट। २. आजकल हमें संसार में चतुर्थ श्रेणी के लोग अधिक देखने को मिलते हैं। ३. उक्त चारों श्रेणियों का आधार स्वार्थ और परार्थ ही है। ४. शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण— सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। ५. मानुषराक्षसाः में रूपक अलंकार मनुष्यरूपी राक्षस, लक्षण— तद् रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

व्याकरणात्मक टिप्पणी— १. परि + √त्यज् + ल्यप् = परित्यज्य २. √घट् + णिच् + ण्वुल् = घटकः ते घटकाः (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) ३. स्वार्थस्य अविरोधः स्वार्थाविरोधः तेन स्वार्थाविरोधेन ४. उद्यमम् बिभ्रति इति (द्वितीया तत्पुरुष) उद्यमभृतः ५. उद्यम + √भृ + क्त (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) उद्यमभृतः ६. नि + √हन् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) निघ्नन्ति ७. मानुषेषु राक्षसाः (सप्तमी तत्पुरुष) मानुषराक्षसाः ८. उत् + √यम् + अप् = उद्यमः ९. निर्गतः अर्थः यस्मात्, तत् निरर्थकम् १०. सामान्याः + तु (विसर्ग - विसर्जनीयस्य सः)

१०२ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

११. स्वार्थ + अविरोधेन (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः)
१२. न विरोधेन इति अविरोधेन (नञ् समास)

पापान्निवारयति योजयते हिताय,
गुह्यं च निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले,
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः॥७८॥

अन्वय- (सन्मित्रम्) पापात् निवारयति, हिताय योजयते, गुह्यम् च गूहति, गुणान् प्रकटीकरोति, आपद्गतम् च जहाति न, काले ददाति, सन्तः इदम् सन्मित्रलक्षणम् प्रवदन्ति।

अनुवाद- (श्रेष्ठ मित्र) पाप से रोकता है, हित के लिए लगाता है और गोपनीय को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्ति में पड़ने पर छोड़ता नहीं है, समय पड़ने पर (साथ) देता है। सज्जन लोग अच्छे मित्र के यह लक्षण कहते हैं।

व्याख्या- इस संसार में श्रेष्ठ मित्र का अत्यन्त महत्त्व है, किन्तु उसे पहचानने में लोग प्रायः भूल कर जाते हैं। इसीलिए यहाँ कवि ने श्रेष्ठ मित्र के लक्षणों का उल्लेख किया है—

अच्छा मित्र सदैव अपने मित्र को पापपूर्ण अनुचित कार्यों को करने से रोकता है तथा जो उसके हित के लिए हों, ऐसे कार्यों के प्रति उसे सदैव प्रेरित करता है। मित्र की जो बातें छिपाने योग्य होती हैं उन्हें कहीं भी नहीं कहता, अपितु छिपाकर अपने पास ही रखता है। इसके विपरीत अपने मित्र के गुणों को, अच्छी-अच्छी बातों, को सार्वजनिक रूप से बताता है।

मित्र के आपत्ति में पड़ने पर उसका साथ नहीं छोड़ता है, अपितु उस समय उसका पूरा-पूरा साथ देता है, कठिन परिस्थितियों में यदि मित्र को आर्थिक सहयोग की आवश्यकता होती है तो पीछे नहीं हटता, अपितु पूरा-पूरा सहयोग करता है।

सज्जनों ने श्रेष्ठ मित्र के ये ही संक्षेप में लक्षण बताए हैं।

विशेष- १. सामान्यतः मित्रता स्वार्थवश अधिक होती है, इसलिए मित्रता में प्रायः लोगों को धोखा हो जाता है। प्रस्तुत श्लोक में कवि ने श्रेष्ठ मित्र की पहचान का सहज उपाय बताया है।
२. यहाँ "ददाति काले" का अर्थ, समय पर साथ देना भी किया जा सकता है और समय पड़ने पर आर्थिक मदद देना भी किया जा सकता है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।
४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

नीतिशतकम् १०३

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. नि + √वृ + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निवारयति
२. नि + √गुह् + क्यप् (गुह्यम्)
३. नि + √गुह् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) निगूहति
४. प्रकट + च्वि + √कृ + ति (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) प्रकटी करोति
५. प्रापात् + निवारयति (व्यञ्जन— वा पदान्तस्य)
६. प्र + √वद् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रवदन्ति

क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः,
क्षीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशानौ हुतः।
गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदं,
युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी॥७९॥

अन्वय- पुरा क्षीरेण ते अखिलाः गुणाः आत्मगतोदकाय हि दत्ताः, (पुनः) तेन पयसा क्षीरे तापम् अवेक्ष्य स्वात्मा कृशानौ हुतः। तत् तु मित्रापदम् दृष्ट्वा पावकम् गन्तुम् उन्मनः अभवत् पुनः तेन जलेन युक्तम् शाम्यति। सताम् मैत्री ईदृशी (एव) (भवति)

अनुवाद- पहले दूध के द्वारा वे सभी गुण अपने में गिरे हुए जल को ही दे दिए, (पुनः) उस जल द्वारा दूध में ताप को देखकर स्वयं को अग्नि में डाल दिया और वह (दूध) मित्र की आपत्ति को देखकर अग्नि में जाने के लिए बेचैन हो गया (और) फिर उस जल से युक्त हुआ (ही) शान्त हो सका। सज्जनों की मित्रता ऐसी (ही होती है)।

व्याख्या- सज्जनों की मित्रता को समझाने के लिए दूध और पानी का उदाहरण दिया गया है। पहले तो जब दूध में पानी मिलाया गया तो दूध ने अपने सारे गुण उस पानी को दे दिये। इसी प्रकार अच्छे मित्र अपने अच्छे गुण सहज ही मित्र को प्रदान कर देते हैं।

पुनः जब जल ने दूध को उबलते हुए संतप्त अवस्था में देखा तो उसे आपत्ति से बचाने के लिए उसने अग्नि (बुझाने के लिए) स्वयं को अग्नि में डाल दिया और अपने प्राणों की बलि देकर मित्र की रक्षा की, किन्तु जब दूध ने पानी को अग्नि में गिरते हुए आपद्ग्रस्त जाना तो वह भी उबाल के रूप में अग्नि में जाने को व्याकुल हो गया।

इसी प्रकार अच्छा मित्र अपने मित्र को आपत्ति में फंसा हुआ देखकर उसे बचाने के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करता और अपने मित्र से मिलकर ही उसकी व्याकुलता शान्त होती है।

ठीक इसी प्रकार जल भी अपने मित्र दूध से मिलकर शान्त हुआ। वास्तव में सज्जनों की मित्रता ऐसी ही होती है।

१०४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

विशेष- १. दूध में उबाल कम करने के लिए, अग्नि बुझाने हेतु उसपर पानी डाला जाता है। (यह आधुनिक– गैस के युग की बात नहीं है)।
२. फिर भी यदि दूध का उबाल नहीं रुकता तो दूध में ही पानी के छींटे डाले जाते हैं।
३. दूध और जल की स्वाभाविक क्रिया में प्राणाहूत की सम्भावना के कारण उत्प्रेक्षालंकार, लक्षण इस प्रकार है–

सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।

४. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण इस प्रकार है–

सूर्याश्वैर्मसजास्ततः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–
१. अव + √ईक्ष् + ल्यप् = अवेक्ष्य
२. गम् + तुमुन् = गन्तुम्
३. आत्मानम् गतम् आत्मगतम्, तादृशम् उदकम् तस्मै आत्मगतोदकाय
४. क्षीर + उत् + √तप् + घञ् = क्षीरोत्तापः, तम् = क्षीरोत्तापम्
५. √हु + क्त = हुतः
६. √पू + ण्वुल् = पावकः तम्, पावकम्
७. √युज् + क्त = युक्तः तम्, युक्तम्
८. मित्र + अण् + ङीप् = मैत्री
९. √शम् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) शाम्यति
१०. मित्रस्य आपदम् मित्रापदम् (षष्ठी तत्पुरुष)
११. क्षीरेण + आत्मगत + उदकाय (दीर्घ - अकः सवर्णे दीर्घः, गुण - आद् गुणः अ + उ = ओ)
१२. पुनः + तु + ईदृशी (विसर्जनीयस्य सः, इकोयणचि)
१३. ते + अखिलाः (एङः पदान्तादति)

इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीय द्विषां,
इतश्च शरणार्थिनां शिखरिणां गणाः शेरते।
इतश्च वडवानलः सह समस्तसंवर्तकैः,
अहो विततमूर्जितं भरसहं च सिन्धोर्वपुः॥८०॥

अन्वय- इतः केशवः स्वपिति, इतः तदीय द्विषाम् कुलम् (स्वपिति), इतः च शरणार्थिनाम् शिखरिणाम् गणाः शेरते। इतः च समस्त संवर्तकैः सह वडवानलः (स्वपिति), अहो सिन्धो वपुः (कीदृशम्) विततम्, ऊर्जितम् भरसहम् च अस्ति।

नीतिशतकम् १०५

अनुवाद- इधर विष्णु सो रहे हैं, इधर उनके शत्रुओं का समूह (सो रहा है) और इधर शरणार्थी पर्वतों के समूह सो रहे हैं, और इधर सभी (प्रलयकालीन बादल) संवर्तकादि के साथ वडवानल (सो रहा है), आश्चर्य है, समुद्र का शरीर (कितना) विस्तृत, शक्तिशाली और भार को सहन करने वाला है।

व्याख्या- महापुरुषों की सामर्थ्य की कोई सीमा नहीं होती, इस बात का कथन समुद्र का उदाहरण देकर बताया गया है कि इसमें एक कोने में समस्त संसार के पालक भगवान् विष्णु शयन कर रहे हैं और इसी में दूसरी ओर देवों के शत्रु राक्षस, वह भी एक दो नहीं, अपितु पूरा समूह ही शयन कर रहा है, इतना ही नहीं, इसी में एक ओर इन्द्र के वज्र से बचने के लिए भाग कर शरण में आए हुए मैनाक आदि पर्वतों का समूह शयन कर रहा है।

इतना ही नहीं इसी विशाल सामर्थ्य वाले समुद्र में प्रलयकाल में भयंकर विनाश करने वाले, शक्तिशाली, संवर्तक आदि बादलों के साथ समुद्र की आग वडवानल भी विराजमान है।

इस सबको देखकर अत्यन्त आश्चर्य होता हैं कि इस समुद्र की शक्ति, सामर्थ्य और विशालता अत्यन्त अद्भुत एवं वाङ्मनस् अगोचर है।

विशेष-

१. महापुरुषों की सामर्थ्य को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है, वे निस्सीम होती हैं।

२. यहाँ समुद्र महापुरुष का प्रतीक है, अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है।

३. प्रस्तुत श्लोक में राक्षसादि सभी के शयन की बात कही गयी है, इससे भी समुद्र की विशालता का अतिरेक अभिव्यञ्जित हो रहा है, क्योंकि ये सभी समुद्र में कष्ट से एक दूसरे के ऊपर पड़े हुए नहीं है, अपितु आराम से शयन कर रहे हैं।

४. समुद्र की शरणागतवत्सलता की भी अभिव्यक्ति हो रही है।

५. अग्नि तीन प्रकार की होती है— वन की आग–दावानल, पेट की आग–जठरानल और समुद्र की आग–वडवानल। इस वडवानल के ही कारण समुद्र में बादल बनते हैं।

६. अग्नि से उत्पन्न बादलों का समूह संवर्तक नाम से जाना जाता है, यह प्रलयकाल में अत्यन्त विध्वंस करता है।

७. पुराणों में कथा आती है कि जब इन्द्र पर्वतों के पंख काट रहा था तो कुछ मैनाकादि पर्वत स्वयं को बचाने के लिए समुद्र में जाकर छिप गए थे।

८. पृथ्वी छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—
जसौ जसयला वसुग्रहयतिश्च पृथ्वी गुरुः।

९. ‘सहयुक्तेऽप्रधाने’ सूत्र से ‘संवर्तकैः’ में तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

१०. अहो यहाँ आश्चर्यातिरेक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।

१०६ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. इदम् + तसिल् = इतः २. शिखर + इनि (पुल्लिंग, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) शिखरिणाम् ३. समस्तैः संवर्तकैः (अव्ययीभाव) समस्तसंवर्तकैः ४. वि + √तन् + क्त (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) विततम् ५. ऊर्जा + इतच् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन) ऊर्जितम् ६. भरं सहते इति, भरसहम् ७. द्विष् + आम् (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) द्विषाम् ८. शरण + अर्थ + णिनि = शरणार्थिन् तेषाम्, शरणार्थिनाम् ९. बलं वाति इति, बल + वा + क + टाप् = वडवा (डलयोरैक्यात् लस्य डत्वम्) वडवायाः अनलः = वडवानलः।

जातः कूर्म स एकः पृथुभुवनभरायार्पितं येन पृष्ठं, श्लाघ्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमति नियमितं यत्र तेजस्विचक्रम्। संजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणे नोपरिष्टान्न चाधो, ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवदपरे जन्तवो जातनष्टाः॥८१॥

अन्वय- सः एकः कूर्मः जातः, येन पृथुभुवनभराय पृष्ठम् अर्पितम्, ध्रुवस्य जन्म (अपि) श्लाघ्यम्, यत्र तेजस्विचक्रम् नियमितम् (भूत्वा) भ्रमति। परहितकरणे संजातव्यर्थपक्षाः अपरेजन्तवः न उपरिष्टात् न च अधः (किमपि कुर्वन्ति), (अपितु) ब्रह्माण्डोदुम्बरान्तर्मशकवत् जातनष्टाः (भवन्ति)।

अनुवाद- वह अकेला कछुआ पैदा हुआ, जिसने विशाल भुवनों के भार के लिए (अपनी) पीठ को अर्पित कर दिया। ध्रुव का जन्म (भी) प्रशंसनीय है, जहाँ तेजस्वी चक्र नियमित रूप से भ्रमण करता है। परोपकार में जिनके पक्ष व्यर्थ ही उत्पन्न हुए हैं (ऐसे) अन्य प्राणी न ऊपर और न ही नीचे (कुछ करते हैं, अपितु) ब्रह्माण्ड रूपी गूलर के भीतर मच्छरों के समान उत्पन्न होकर नष्ट (होते रहते हैं)।

व्याख्या- परोपकार करने से ही मनुष्य के जीवन की सार्थकता है, इस बात को एक पाताल में स्थित कच्छपराज का और दूसरा अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का उदाहरण देकर समझाते हुए कवि कहता है कि—

उस कछुवे का जन्म सार्थक है भले ही वह पाताल में स्थित क्यों न हो, क्योंकि उसने सम्पूर्ण भुवनों के गुरुतर भार को वहन करने के लिए स्वेच्छा से अपनी पीठ को समर्पित कर दिया। साथ ही अन्तरिक्ष में स्थित ध्रुव का जन्म भी प्रशंसनीय है, क्योंकि सम्पूर्ण अन्तरिक्षमण्डल में स्थित तेजस्वी ग्रह उसी को केन्द्र बनाकर नियमित रूप से

नीतिशतकम् १०७

भ्रमण कर पाते हैं अर्थात् एक मात्र ध्रुव के आधार पर ही तेजस्वी ग्रहों का समूह जीवित है, अस्तित्व बनाए हुए है।

इसके विपरीत परोपकार पूर्ण कार्यों में जिनकी लेशमात्र भी रुचि (पक्ष) नहीं है, ऐसे दूसरे अनेक प्राणी न तो उच्च पदों पर स्थित होकर ही कुछ कर पाते हैं और न ही किसी नीचे पद पर आसीन होकर ही कुछ करते हैं।

इस प्रकार के प्राणी वस्तुतः गूलर नामक फल के अन्दर स्थित उन मच्छरों के समान होते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में पैदा होकर निरर्थक ही आते हैं और चले जाते हैं। वास्तव में उनका जीवन निरर्थक होता है।

विशेष- १. परोपकार पूर्ण कार्यों से ही जीवन की सार्थकता है, इसका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन उदाहरण सहित किया गया है।

२. ब्रह्माण्ड रूपी गूलर में अभेद की स्थापना की गई है, अतः रूपक अलंकार, लक्षण इस प्रकार है— तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।

३. अन्तरिक्षमण्डल में स्थित ध्रुव को सम्पूर्ण तारामण्डल का केन्द्र माना गया है, उसी के चारों ओर सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं।

४. पुराणों के अनुसार सम्पूर्ण भुवनों के भार को कच्छपावतार अपनी पीठ पर धारण किए हुए हैं।

५. स्रग्धरा छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है— म्रभ्नैर्यानां त्रयेण, त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितियम्।

६. उदुम्बर गूलर को कहते हैं, पकने पर उसमें बहुत से छोटे-छोटे मच्छर हो जाते हैं। स्वाद मीठा होता है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √जन् + क्त = जातः
२. √श्लाघ् + ण्यत् = श्लाघ्यम्
३. सम् + √जन् + क्त = संजातः
४. परेषां हितं परहितं तेषां, करणे, परहितकरणे
५. पृथुभुवनं तस्य भरः तस्मै= पृथुभुवनभराय
६. ब्रह्मणः अण्डं ब्रह्माण्डम्, ब्रह्माण्डम् एव उदरं तस्य, अन्तः तत्र मशकाः ब्रह्माण्डोडुम्बराान्तमशकाः तद्वत्।
७. √भ्रम् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) = भ्रमति
८. न + उपरिष्टात् + न (गुण - आद् गुणः, व्यञ्जन)
९. नि + √यम् + णिच् + क्त = नियमितम् (नपुं., प्रथमा विभक्ति, एकवचन)

१०८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

तृष्णां छिन्धि¹ भज क्षमां जहि मदं पापे रतिं मा कृथाः,
सत्यं ब्रूह्यनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्वज्जनम्।
मान्यान् मानय विद्विषोऽप्यनुनय प्रच्छादय² स्वान्गुणान्,
कीर्तिं पालय दुःखिते कुरु दयामेतत् सतां लक्षणम्॥८२॥

अन्वय- तृष्णाम् छिन्धि, क्षमाम् भज, मदम् जहि, पापे रतिम् मा कृथाः, सत्यम् ब्रूहि, साधु-पदवीम् अनुयाहि, विद्वज्जनम्, सेवस्व, मान्यान् मानय, विद्विषः अपि अनुनय, स्वान् गुणान् प्रच्छादय, कीर्तिम् पालय, दुःखिते दयाम् कुरु, सताम् एतत् लक्षणम्।

अनुवाद- लोभ का नाश करो, क्षमा का पालन करो, अहंकार का त्याग करो, पाप में प्रेम मत करो, सत्य बोलो, सज्जनों के मार्ग का अनुसरण करो, विद्वज्जनों की सेवा करो, सम्माननीय (लोगों) का सम्मान करो, शत्रुओं को भी प्रसन्न करो, अपने गुणों को छिपाओ, यश का पालन करो, दुःखी पर दया करो, सज्जनों के यह लक्षण हैं।

व्याख्या- सज्जन बनने के लिए हमें किस प्रकार का आचरण करना चाहिए, इसी बात का प्रतिपादन प्रस्तुत श्लोक में किया गया है— हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए, सदैव क्षमा का पालन करना चाहिए, कभी भी किसी भी बात का अहंकार नहीं करना चाहिए, पापपूर्ण कार्यों मे कभी भी अनुराग नहीं करना चाहिए, सदैव सत्यभाषण करना चाहिए, सज्जनों द्वारा बताए गए मार्ग पर ही सदैव चलना चाहिए, विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जो सम्मान एवं आदर के पात्र हैं, ऐसे लोगों का सदैव सम्मान करना चाहिए, अपने शत्रुओं को भी सदैव प्रसन्न करने के प्रयास करने चाहिएँ, स्वयं के गुणों का प्रख्यापन नहीं करना चाहिए अर्थात् आत्मप्रशंसा नहीं करनी चाहिए। ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे हम यश के भागी बने, दुःखियों पर सदैव दया करनी चाहिए, इस प्रकार का आचरण करने से ही व्यक्ति सज्जन कहलाता है।

विशेष- १. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है।
२. शार्दूलविक्रीडित छन्द, लक्षण—
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. √हा + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
२. √मन् + ण्यत् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) मान्यान्
३. वि + √द्विष् + क्विप् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) विद्विषः
४. प्र + √छद् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रच्छादय


१. छिन्दि
२. प्राख्यापय (प्रकट करो)

नीतिशतकम् १०९

५. √पाल् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) पालय
६. दुःख + इतच् (पुंल्लिंग, सप्तमी विभक्ति, एकवचन) दुःखिते
७. √हन् + सिप् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) जहि
८. √मान् + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) मानय
९. प्र + √श्रि + अच् = प्रश्रयः, तम् प्रश्रयम्
१०. प्र + √ख्या + णिच् (लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन) प्रख्यापय
११. ब्रूहि + अनुयाहि (यण् – इ– य् – इकोयणचि)
१२. विद्विषः + अपि + अनुनय (अतो रोरप्लुतादप्लुते :— उ— ओ (इकोयणचि इ— य्)

मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा-
स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं,
निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः॥८३॥

अन्वय- मनसि वचसि काये पुण्य-पीयूष-पूर्णाः, उपकार-श्रेणिभिः त्रिभुवनम् प्रीणयन्तः, पर-गुण-परमाणून् पर्वतीकृत्य निज हृदि नित्यम् विकसन्तः, सन्तः कियन्तः सन्ति।

अनुवाद- मन, वाणी और शरीर में पुण्य रूपी अमृत से परिपूर्ण, उपकार परम्परा से तीनों लोकों को प्रसन्न करते हुए, दूसरों के परमाणु के समान (छोटे) गुणों को पर्वत के समान बनाकर, अपने में ही सदैव आनन्दित होते हुए सज्जन लोग (इस संसार में) कितने हैं।

व्याख्या- जो लोग सदैव मन, वाणी और कर्म के द्वारा पुण्यशाली कार्य ही करते हैं अर्थात् मनसा, वाचा, कर्मणा जिनकी भूल से भी पापपूर्ण कार्यों में गति नहीं रहती, सदैव ही परोपकारपूर्ण कार्यों के द्वारा तीनों लोकों को प्रसन्न करते रहते हैं अर्थात् जिनकी परोपकारपूर्ण कार्यों में ही रुचि रहती है, स्वार्थपूर्ण कार्यों में नहीं। यदि कोई अन्य व्यक्ति अत्यन्त छोटा-सा भी उपकार उनके ऊपर कर देता है अथवा उसमें यदि छोटे से छोटा भी कोई गुण होता है तो उसे सदा ही अत्यन्त बढ़ा चढ़ा कर सम्मानपूर्वक दूसरों के सामने उसका कथन करते हैं तथा आत्मानन्द में सदैव लीन रहते हैं अथवा आत्मालोचन में ही सदा संलग्न रहते हैं, परनिन्दा आदि नहीं करते। इस प्रकार के सज्जन लोग इस संसार में कितने से है अर्थात् इस प्रकार की विशेषता वाले सज्जन यहाँ केवल अंगुलिगण्य ही हैं। उनकी संख्या अधिक नहीं है।

विशेष- १. सज्जनों की संख्या इस संसार में अत्यल्प ही होती है।
२. सज्जनों के गुणों का अत्यन्त संक्षेप में मनोहर शैली में कथन किया गया है!

११० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

३. मालिनी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
४. अर्थापत्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. पुण्यं एव पीयूषं पुण्यपीयूषम्, तेन पूर्णाः पुण्यपीयूषपूर्णा
२. उपकाराणां श्रेणिभिः = उपकारश्रेणिभिः (षष्ठी तत्पुरुष)
३. त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम् (द्विगु समास)
४. √प्रीञ् + णिच् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रीणयन्तः
५. पर्वत + च्वि +√ कृ + ल्यप् = पर्वतीकृत्य (अपर्वतान् पर्वतान् कृत्य)
६. निजस्य हृदि (षष्ठी तत्पुरुष) निजहृदि
७. वि + √कस् + शतृ (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) विकसन्तः
८. √पृ + क्त (पूर्णः)

किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा,
यत्राश्रिता हि तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण,
कङ्कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः॥८४॥

अन्वय- तेन हेम-गिरिणा रजताद्रिणा वा किम्, यत्र आश्रिताः हि ते तरवः, तरवः एव। (वयम् तु) मलयम् एव मन्यामहे, यत् आश्रयेण कङ्कोल-निम्ब-कुटजाः अपि चन्दनाः (स्युः)।

अनुवाद- उस स्वर्ण पर्वत अथवा चाँदी के पर्वत से क्या (लाभ) जिस पर आश्रित वे वृक्ष, वृक्ष ही (हैं)। (हम तो) मलय (पर्वत) को ही (श्रेष्ठ) मानते हैं, जिसके आश्रय से कङ्कोल, नीम और कुटज (के वृक्ष) भी चन्दन (हो जाते हैं)।

व्याख्या- स्वर्ण पर्वत एवं चाँदी के पर्वत की अपेक्षा मलयपर्वत को कवि श्रेष्ठ बताता हुआ कहता है कि सोने के पर्वत पर तथा चाँदी के पर्वत पर जो वृक्ष उगते हैं। उनमें न तो सोने की पत्तियाँ आती न चाँदी के फल अर्थात् वृक्षों में उनकी संगति का कोई असर दिखाई नहीं देता, वे ज्यों के त्यों बने रहते हैं।

इसके विपरीत मलयाचल पर जो भी वृक्ष चाहे वे कङ्कोल के हों या नीम के अथवा फिर कुटज जैसे तुच्छ ही क्यों न हो, ये सभी चन्दन के सान्निध्य में रहने से चंदन के समान ही सुगन्धि वाले हो जाते हैं। अतः वस्तुतः मलयाचल ही प्रशंसनीय है। स्वर्ण अथवा रजत पर्वत नहीं।

विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में स्वर्ण पर्वत एवं रजत पर्वत की अपेक्षा मलयाचल को अधिक श्रेष्ठ बताया है।

नीतिशतकम् १११

२. यहाँ मलयाचल सज्जन व्यक्ति का प्रतीक है जो अपने गुण दूसरों में संक्रमित कर देता है।

३. उपमान स्वर्ण एवं रजत पर्वत की अपेक्षा उपमेय मलय पर्वत की प्रशंसा करने तथा उसे श्रेष्ठ बताने के कारण व्यतिरेक अलंकार— लक्षण—

उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।

४. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—

उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।

५. किम् अव्यय यहाँ ‘क्या लाभ’ इस अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—

१. हेम्नः गिरिः, हेमगिरिः तेन, हेमगिरिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
२. रजतस्य अद्रिः रजताद्रिः, तेन रजताद्रिणा (षष्ठी तत्पुरुष)
३. कङ्कोलाश्च निम्बाश्च कुटजाश्च (द्वन्द्व समास) कङ्कोलनिम्बकुटजाः
४. यत्र + आश्रिताः (अ + आ = आ, अकः सवर्णे दीर्घः)
५. यत् + आश्रयेण (त्— द्, झलां जशोऽन्ते)
६. तरवः + तरवः + ते + एव (विसर्जनीयस्य सः :— स्)
७. √मन् + महिङ् (आत्मने पद, लट् लकार, उत्तम पुरुष, बहुवचन) मन्यामहे

धैर्य-पद्धतिः

रत्नैर्महार्हैः¹ स्तुतुषुर्न देवाः,
न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्।
सुधां विना न प्रययुर्विरामं,
न निश्चिताथार्द्विरमन्ति धीराः॥८५॥

अन्वय— देवाः महार्हैः रत्नैः न तुतुषुः, भीमविषेण भीतिम् भेजिरे न, सुधाम् विना विरामम् न प्रययुः, धीराः निश्चितार्थात् न विरमन्ति।

अनुवाद— देवता अत्यधिक मूल्यवान् रत्नों से (भी) संतुष्ट नहीं हुए, भयानक विष से (भी) भय को प्राप्त नहीं हुए, अमृत के बिना विराम को प्राप्त नहीं हुए, धैर्यशाली निश्चित विषय से रुकते नहीं हैं।

व्याख्या— देवताओं ने समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया, आरम्भ में उन्हें समुद्र से बहुमूल्य रत्नों की प्राप्ति हुई, किन्तु उन्हें प्राप्त करके संतुष्ट नहीं हुए और अमृत प्राप्ति की लिए प्रयासरत रहे।


१. महार्घैः

११२ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

इसी क्रम में भयानक हलाहल विष भी निकला, किन्तु उससे भी वे विचलित नहीं हुए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करते रहे और अन्त में उन्होंने अमृत प्राप्त करके ही विराम लिया।

इसी प्रकार जो धैर्यवान् लोग होते हैं वे एक बार निश्चय किए गए अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना संतुष्ट नहीं होते हैं और अपने प्रयासों को रोकते नहीं हैं।

विशेष– १. धैर्यशाली लोगों के स्वभाव का उल्लेख किया है।

२. पौराणिक कथा है कि देवों और दैत्यों ने मिलकर अमृत-प्राप्ति के लिए मन्दराचल को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बना कर समुद्र मंथन किया था। जिससे उन्हें १४ रत्नों की प्राप्ति हुई थी।

३. इसी क्रम में भयानक हलाहल भी प्राप्त हुआ, जिसे बाद में भगवान् शिव ने अपने कण्ठ में धारण किया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाए।

४. अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

५. 'विना' के योग में 'सुधाम्' में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है।

६. उपसर्ग का प्रयोग होने से आत्मनेपदी 'रम्' धातु परस्मैपद के रूप में प्रयुक्त हुई है।

७. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है।

८. लिट् लकार का प्रयोग ऐतिहासिक तथ्य का कथन करने के लिए किया जाता है। इसीलिए तुतुषुः, भेजिरे, प्रययुः में लिट् लकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी–

१. महान्ति अर्हाणि महार्हाणि तैः, महार्हैः (कर्मधारय)

२. √तुष् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) तुतुषुः

३. √भी + क्तिन् (स्त्रीलिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) भीतिम्

४. √भज् + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) भेजिरे

५. वि + √रम् + घञ् (पुल्लिंग, द्वितीया विभक्ति, एकवचन) विरामम्

६. प्र + √या + झि (लिट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) प्रययुः

७. निश्चितात् अर्थात् निश्चितार्थात् (अव्ययीभाव)

८. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति

९. भीमं विषम् भीमविषम्, तेन (कर्मधारय) भीमविषेण

१०. रत्नैः + महा + अर्हैः + तुतुषुः + न + देवाः + न (ससजुषो रुः, अकः सवर्णे दीर्घः, ससजुषो रुः)

११. √दिव् + अच् = देवः (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) देवाः

नीतिशतकम् ११३

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,
प्रारभ्य चोत्तमजना¹ न परित्यजन्ति॥८६॥

अन्वय- नीचैः विघ्नभयेन खलु (कार्यम्) न प्रारभ्यते। मध्याः (कार्यम्) प्रारभ्य विघ्नविहताः विरमन्ति, उत्तमजनाः च (कार्यम्) प्रारभ्य, विघ्नैः पुनः पुनः प्रतिहन्यमानाः अपि न परित्यजन्ति।

अनुवाद- निम्न (श्रेणी के व्यक्ति) विघ्नों के भय से निश्चय ही (कार्य को) प्रारम्भ नहीं करते हैं। मध्यम (स्वभाव वाले) (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से आहत होने पर रुक जाते हैं और उत्तम लोग (कार्य) प्रारम्भ करके विघ्नों से बार-बार आहत होते हुए भी नहीं छोड़ते हैं।

व्याख्या- प्रस्तुत श्लोक के अनुसार इस संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं, 'उत्तम, मध्यम और अधम। इनमें अधम अर्थात् निम्न श्रेणी के लोग किसी काम को केवल विघ्नों से डरकर शुरु ही नहीं करते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ मध्यम श्रेणी के लोग काम को उत्साहवश प्रारम्भ तो कर देते हैं, किन्तु विघ्नों के आने पर घबराकर उनका धैर्य जवाब दे देता है और वे कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं।

इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों के विपरीत उत्तम श्रेणी के लोग जब किसी कार्य को हाथ में लेते हैं तो चाहे उनके मार्ग में कितनी ही विघ्नबाधाएँ क्यों न आएँ, वे तनिक भी विचलित नहीं होते और अपने द्वारा प्रारम्भ किए कार्य को समाप्त करके ही छोड़ते हैं।

विशेष- १. वास्तव में प्रथम दो प्रकार के लोगों की अपेक्षा उत्तम श्रेणी के लोग ही प्रशंसनीय होते हैं।
२. सम्पूर्ण जन समूह को उक्त दृष्टि से तीन श्रेणियों में अत्यन्त सुन्दर ढंग से विभाजित किया गया है।
३. वसन्ततिलका छन्द का प्रयोग हुआ है। लक्षण इस प्रकार है—

‘‘उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः।’’
४. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. प्र + आ + √रभ् + ल्यप् = प्रारभ्य
२. विघ्नैः विहताः , विघ्नविहताः (तृतीया तत्पुरुष)
३. वि + √हन् + क = विघ्न। वि + √हन् + क्त = विहतः


१. प्रारब्धं उत्तमजनाः।(आरम्भ को उत्तम लोग)

११४श्रीभर्तृहरिविरचितम्

४. वि + √रम् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) विरमन्ति
५. प्रति + √हन् + शानच् (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) प्रतिहन्यमानाः
६. परि + √त्यज् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) परित्यजन्ति
७. च + उत्तमजनाः (गुण, आद् गुणः)
८. प्र + आ + √रभ् + क्त (नपुं., द्वितीया विभक्ति, एकवचन) प्रारब्धम्
९. विघ्नानां भयेन विघ्नभयेन (षष्ठी तत्पुरुष)
१०. √भी + अच् = भयम्
११. उत्तमाः जनाः उत्तमजनाः (कर्मधारय समास)
१२. प्र + आ + √रभ् + त (आत्मने, प्रथम पुरुष, एकवचनं)
१३. मुहुः + अपि = मुहुरपि (विसर्ग)

कान्ताकटाक्षविशिखाः न लुनन्ति² यस्य,
चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः।
कर्षन्ति भूरि विषयाश्च न लोभपाशैः,
लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः॥८७॥

अन्वय- यस्य चित्तम् कान्ता-कटाक्ष-विशिखाः न लुनन्ति, कोपकृशानुतापः न निर्दहति, भूरिविषयाः लोभ-पाशैः च न कर्षन्ति, सः धीरः इदम् कृत्स्नम् लोकत्रयम् जयति।

अनुवाद- जिसके मन को स्त्रियों के कटाक्ष रूपी बाण छेदते नहीं हैं, क्रोध रूपी अग्नि का संताप जलाता नहीं है और अनेक विषय रूपी लोभ के पाश (अपनी ओर) खींचते नहीं हैं। वह धीर (पुरुष) इन सम्पूर्ण तीनों लोकों को जीत लेता है।

व्याख्या- धीर गम्भीर व्यक्ति ही तीनों लोकों को जीतने में समर्थ होते हैं, किन्तु उसके लिए कवि कहता है कि जिनके मन के ऊपर सुन्दर स्त्रियों की दृष्टि प्रभावशाली नहीं होती अर्थात् जो कामदेव द्वारा प्रभावित नहीं होते, जिन्हें कभी क्रोध रूपी अग्नि संतप्त नहीं करता, जो कभी क्रोध के वशीभूत नहीं होते, तथा जिन्हें इन्द्रियों के विषय-भोग प्रभावित नहीं करते अर्थात् जो जितेन्द्रिय होते हैं, वे ही मनस्वी और धैर्यशाली लोग तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं।

विशेष- १. तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से पूर्णतया मुक्त हो जाए।
२. कटाक्ष रूपी बाण, विषय भोग रूपी पाश, कोप रूपी अग्नि स्थलों पर उपमान और उपमेय में अभेद का आरोप करने से रूपक अलंकार— लक्षण—


२. दहन्ति

नीतिशतकम् ११५

'तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः'।
३. वसन्ततिलका छन्द प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है—
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः।
४. प्रथम चरण में दहन्ति पाठ भी मिलता है, जो अर्थ की दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता।

व्याकरणात्मक टिप्पणी—
१. √दह् + झि (लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) = दहन्ति
२. √कुप् + घञ् = कोपः। √तप् + घञ् = तापः। √लुभ् + घञ् = लोभः
३. लोकानाम् त्रयम् लोकत्रयम् (षष्ठी तत्पुरुष)

क्वचित् भूमौ शय्या१, क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनः१,
क्वचिच्छाकाहारी२ क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥८८॥

अन्वय— कार्यार्थी मनस्वी क्वचित् भूमौ शय्या, क्वचित् अपि च पर्यङ्कशयनः क्वचित् शाकाहारी, क्वचित्, अपि च शाल्योदन रुचिः, क्वचित् कन्थाधारी, क्वचित् अपि च दिव्याम्बरधरः, न दुःखम्, न च सुखम् गणयति।

अनुवाद— कार्य करने का इच्छुक मनस्वी (व्यक्ति) कहीं भूमि पर शय्या वाला और कहीं पलंग पर भी सोने वाला, कहीं शाक खाने वाला और कहीं (उत्तम) शाली भात को भी (खाने की) रुचि वाला, कहीं गूदड़ी धारण करने वाला और कहीं सुन्दर वस्त्रों को भी धारण करने वाला, न (तो) दुःख को और न सुख को (ही) गिनता है।

व्याख्या— जो स्वाभिमानी, मनस्वी लोग कार्य करने को ही महत्त्व प्रदान करते हैं, उन्हें भले ही कहीं भूमि पर ही सोना पड़े अथवा कहीं संयोगवश सोने के लिए आरामदायक पलंग मिल जाए, कहीं पत्ते खाकर ही अपनी उदरपूर्ति करनी पड़े, या फिर भाग्यवश कहीं शाली नामक उत्तम धान निर्मित स्वादिष्ट भात भी मिल जाए, कहीं जीर्णशीर्ण वस्त्रों को सीं कर बनाई गई गूदड़ी से ही अपने शरीर को ढकना पड़े या फिर दिव्य वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा करने वाले सुन्दर वस्त्र ही कहीं पहनने को क्यों न मिल जाए।

कार्य की सम्पन्नता के क्रम में उनके लिए इन वस्तुओं से प्राप्त होने वाले सुख


१. पृथिवी शय्यः (पृथ्वी पर शय्या)
१. शाकहरः (शाक खाने वाला)
२. पर्यङ्कशयनम् (पलंग पर सोना)

११६ | श्रीभर्तृहरिविरचितम्

अथवा दुःख का महत्त्व नहीं होता, क्योंकि उनका पूरा ध्यान कार्य की पूर्णता पर रहता है। शरीर के सुख अथवा कष्ट उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखते हैं।

विशेष- १. कार्यसिद्धि मनस्वी लोगों का प्रमुख लक्ष्य होता है। उस क्रम में आने वाले सुख, दुःखों की वे परवाह नहीं करते हैं।

२. व्यक्ति का कर्तव्य है कि चिड़िया की आँख पर स्थित अर्जुन के लक्ष्य के समान, अपने लक्ष्य पर ही अपनी ध्यान पूर्णतया एकाग्र करके कार्य करे, तभी उसे सिद्धि प्राप्त होती है।

३. शिखरिणी छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण इस प्रकार है— रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमन सभलागः शिखरिणी।

४. समुच्चय अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-

१. √शीङ् + क्यप् + टाप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन) शय्या २. पर्यङ्कं शयनं यस्य सः (बहुव्रीहि) पर्यंकशयनः ३. पर्यङ्के शयनम् (सप्तमी तत्पुरुष) पर्यंकशयनम् ४. √शीङ् + ल्युट् = शयनम्। आ + √हृ + घञ् = आहारः ५. शाकस्य आहारः = शाकाहरः। शाल्याः ओदनः शाल्योदनः (षष्ठी तत्पुरुष) ६. शाल्योदने रुचिः यस्य सः (बहुव्रीहि) शाल्योदनरुचिः ७. कन्था + √धृ + णिनि (पुंल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) कन्थाधारी ८. कन्थम् धारयति इति = कन्थाधारी ९. दिव्यम् अम्बरम् दिव्याम्बरं, तं धरति इति दिव्याम्बरधरः १०. √धृ + अच् = धरः। कार्य + अर्थ + इनि = कार्यार्थिन् ११. कार्यस्य अर्थी, कार्यार्थी (षष्ठी तत्पुरुष) १२. मनस् + विनि = मनस्विन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन) मनस्वी १३. √गण् + णिच् + तिप् (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) गणयति १४. शाक + आ + √हृ + णिनि = शाकाहारिन् (प्रथम विभक्ति, एकवचन) शाकाहारी

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥८९॥