नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)
Niti Shataka of Bhartrihari Hindi
महाराज भर्तृहरि द्वारा
स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 194 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीतिशतकम् ७९
२. आरम्भे गुर्वी (सप्तमी तत्पुरुष)
३. गुरु + ङीप् (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
४. √क्षि + अच् = क्षय, क्षय + इनि = क्षयिन् + ङीप् = क्षयिणी (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
५. लघु + ङीप्, लघ्वी (प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. √वृध् + क्तिन् = वृद्धि, वृद्धि + मतुप् = वृद्धिमत् + ङीप् = वृद्धिमती
७. छाया + इव (गुण - आद् गुण: - आ + इ = ए)
मृगमीनसज्जनानां तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम्।
लुब्धकधीवरपिशुना निष्कारणवैरिणो जगति॥६०॥
अन्वय- जगति तृणजलसन्तोषविहितवृत्तीनाम्, मृगमीनसज्जनानाम् लुब्धकधीवरपिशुना, निष्कारणे एव वैरिणः (भवन्ति)।
अनुवाद- संसार में, तिनके, जल, सन्तोष से (ही) जीविका चलाने वाले, हिरण, मछली और सज्जनों के (क्रमशः) व्याध, मछुआरे, (और) चुगलखोर बिना कारण ही शत्रु (होते हैं)।
व्याख्या- इस संसार में हिरण, मछली और सज्जन ये तीनों क्रमशः घास, जल और सन्तोष मात्र से ही अपना जीवनयापन कर लेते हैं अर्थात् अपनी आजीविका के लिए किसी को कष्ट नहीं देते और न ही सताते हैं, किन्तु फिर भी इन तीनों के क्रमशः शिकारी, मछली पकड़ने वाले मछुआरे तथा चुगलखोर बिना किसी कारण के ही शत्रु होते हैं।
शिकारी मात्र घास के तिनकों पर जीवनयापन करने वाले हिरण को अपने स्वार्थ के लिए मार डालता है। इसी प्रकार मछली पकड़ने वाला जल मात्र से जीवित रहने वाली मछली को पकड़कर खा लेता है और इसी प्रकार सज्जन मात्र सन्तोष से ही अपना जीवनयापन करते हैं, किसी को कष्ट नहीं देते, किन्तु फिर भी चुगलखोर उनकी झूठी चुगली करके उन्हें हानि पहुँचाते रहते हैं।
विशेष- १. प्रस्तुत श्लोक में मृगादि का तिनके आदि के साथ एक क्रम वर्णित किया गया है। अतः यथा- संख्य अलंकार है, लक्षण—
उद्दिष्टानां पदार्थानां पूर्वपश्चात् यथाक्रमम्।
अनुद्देशो भवेद्यत्र तद्यथासंख्यमुच्यते॥
२. दुष्ट प्रकृति के लोगों की शत्रुता के लिए कोई कारण नहीं होता, वे बिना किसी कारण ही शत्रुभाव रखते हैं।
३. आर्या छन्द प्रयुक्त हुआ है, लक्षण पूर्ववत् है।