भारतकोश
नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 194 में से

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८० श्रीभर्तृहरिविरचितम्

व्याकरणात्मक टिप्पणी- १. सम् + √तुष् + घञ् = सन्तोषः २. वि + √धा + क्त = विहितः ३. √वृत् + क्तिन् = वृत्तिः ४. √लुभ् + क्त = लुब्ध + कन् = लुब्धक ५. वैर + इनि = वैरिन् (पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन)
६. तृणं च जलं च सन्तोषश्च = तृणजलसंतोषः , तैः विहिताः वृत्तयः येषां ते (बहुव्रीहि)
७. मृगश्च मीनश्च सज्जनश्च तेषां मृगमीनसज्जनानाम्।

सज्जनपद्धतिः

वाञ्छा सज्जनसङ्गमे¹ परगुणे प्रीतिर्गुरौ नम्रता,
विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद् भयम्।
भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले,
एते येषु वसन्ति² निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः॥६१॥

अन्वय- सज्जनसंगमे वाञ्छा, पर गुणे प्रीतिः, गुरौ नम्रता, विद्यायाम् व्यसनम्, स्वयोषिति रतिः, लोकापवादात् भयम्, शूलिनि भक्तिः, आत्मदमने शक्तिः, खले संसर्गमुक्तिः, येषु एते निर्मलगुणाः वसन्ति तेभ्यः नरेभ्यः नमः।

अनुवाद- सज्जनों की संगति की इच्छा, दूसरों के गुणों में प्रेम, बड़ों के प्रति नम्रता, विद्या में आसक्ति, अपनी पत्नी में प्रेम, लोक-निन्दा से भय, (भगवान्) शिव के प्रति भक्ति, आत्मसंयम में सामर्थ्य, दुर्जनों के संसर्ग का त्याग, जिनमें ये निर्मल गुण रहते हैं, उन लोगों को नमस्कार है।

व्याख्या- श्रेष्ठ लोगों के गुणों का कथन करते हुए कवि कहता है कि ये लोग सज्जनों की संगति की सदा इच्छा करते रहते हैं, क्योंकि सज्जनों के साथ रहने मात्र से व्यक्ति का उद्धार हो जाता है। इनकी विशेषता है कि ये दूसरों के गुणों के प्रति ईर्ष्याभाव नहीं रखते, अपितु उनकी प्रशंसा करते हुए प्रेम करते हैं, बड़ों अर्थात् अग्रजों के साथ नम्रतापूर्वक व्यवहार करते हैं, इनकी रुचि विद्या अध्ययन में रहती हैं, क्योंकि विद्या से ही व्यक्ति को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है, एक पत्नी व्रत का पालन करते हुए, परस्त्री के साथ सम्पर्क को अनुचित मानते हैं, लोगों की निन्दा से डरते हैं अर्थात् ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिससे उन्हें निन्दा का पात्र होना पड़े, एकमात्र भगवान् शिव के प्रति उनकी एकनिष्ठ भक्ति रहती है तथा इन्द्रियों को उनके विषयों की ओर ले जाने से


१. सज्जनसंगतौ।
२. येष्वेते निवसन्ति (जिनमें ये (गुण) निवास करते हैं।