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नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

नीति शतक (भर्तृहरि - डॉ. राकेश शास्त्री हिन्दी व्याख्या सहित)

Niti Shataka of Bhartrihari Hindi

महाराज भर्तृहरि द्वारा

स्रोत: Neeti Shataka with Sanskrit Shlokas, Anvaya & Hindi Commentary by Dr. Rakesh Shastri (उद्गम)

DevanagariHindipublished194 पृष्ठ

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७८ श्रीभर्तृहरिविरचितम्

७. √आस् + णिच् + त (आत्मने, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
८. वि + √भू + अच् = विभवः
९. गोचरं गतः, गोचरगतः तैः गोचरगतैः

आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण,
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥५९॥

अन्वय- खल-सज्जनानाम् मैत्री दिनस्य पूर्वार्द्ध-परार्ध भिन्ना छाया इव आरम्भगुर्वी, क्रमेण क्षयिणी, पुरा लघ्वी, पश्चात् च वृद्धिमती (भवति)।

अनुवाद- दुष्ट और सज्जनों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध में भिन्न (स्वरूप वाली) छाया के समान (दुष्टों की) आरम्भ में बड़ी, (किन्तु) क्रमशः छोटी होने वाली, (सज्जनों की) पहले छोटी और बाद में (क्रमशः) वृद्धि वाली (होती है)।

व्याख्या- दुष्टों की मित्रता दिन के पूर्वार्द्ध की छाया के समान आरम्भ में बड़ी तथा क्रमशः छोटी होने वाली तथा सज्जनों की मित्रता दिन के उत्तरार्द्ध की छाया के समान पहले छोटी और बाद में क्रमशः बड़ी होने वाली होती है।

कहने का तात्पर्य है कि दुष्ट व्यक्ति किसी प्रयोजनवश मित्रता करता है और वह उसके निकट अत्यधिक उत्सुकता के साथ शीघ्रतापूर्वक जाता है, जिससे मित्रता करनी होती है, किन्तु जब उसका प्रयोजन हल हो जाता है तो वह मित्रता उतनी ही शीघ्रता से क्रमशः कम होती हुई, अन्त में समाप्त हो जाती है—जैसे प्रातःकालीन किसी भी वस्तु की छाया, यों तो आरम्भ में बड़ी होती है, किन्तु बाद में दोपहर होते होते छोटी होती हुई, अन्त में समाप्त हो जाती है।

किन्तु इसके ठीक विपरीत सज्जनों की मित्रता दोपहर के बाद की किसी वस्तु की छाया के समान आरम्भ में छोटी होती है, क्योंकि सज्जन व्यक्ति की मित्रता किसी स्वार्थ के कारण नहीं होती, अपितु निःस्वार्थ भाव से होती है। अतः उस वह अच्छी प्रकार परखने के बाद ही मित्रता करता है और यह मित्रता धीरे-धीरे दोपहर के बाद की छाया के समान बढ़ती चली जाती है।

विशेष- १. दुर्जन और सज्जन की मित्रता को अत्यन्त सुन्दर ढंग से उदाहरण द्वारा समझाया गया है।
२. उपजाति छन्द का प्रयोग हुआ है, लक्षण पूर्व में दिया हुआ है।
३. यथासंख्या अलंकार का प्रयोग हुआ है।

व्याकरणात्मक टिप्पणी-
१. खलानाम् सज्जनानाम् च (द्वन्द्व समास)